शेख हसीना सरकार के तख़्ता पलट के बाद बंगलादेशी हिन्दू नेता का बयान वायरल क्यों ?
हिंदू महाजोत के महासचिव गोविंदा प्रमाणिक ने कहा कि भारतीय मीडिया बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के बारे में फर्जी खबरें फैला रहे हैं। उन्होंने पीएम मोदी की जगह शेख हसीना को लाने की भी मांग की और कहा कि वह मोदी से बेहतर तरीके से राज्यों की रक्षा कर सकती हैं।
हालाँकि बांग्लादेश सत्तारूढ़ पार्टी अवामी लीग के नेताओं की अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर भूमिका सवालों के घेरे में रही है .13 अक्टूबर 2021 को कोमिला में एक दुर्गा पूजा पंडाल में हिंदुओं द्वारा जानबूझकर कुरान का अपमान करने के आरोपों के बाद तोड़फोड़ से शुरू हुई .
बाद में बांग्लादेश के अधिकारियों ने इस आरोप को झूठा पाया, लेकिन पांच छह दिनों में बांग्लादेश के विभिन्न हिस्सों से हिंदू मंदिरों, दुर्गा पूजा पंडालों और हिंदू घरों पर हमलों की घटना सामने आई , जो निंदनीय थी .
उस दौरान आवामी लीग के कुछ कार्यकर्ता हिंसा के दौरान मूकदर्शक बने रहे और कई अन्य इसमें शामिल थे। पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा की अधिकांश घटनाओं में अवामी लीग के नेताओं की भूमिका पाई गई है .
यही कारण है कि प्रशासन ने उन मामलों को नरमी से निपटाया है और अपराधियों को अक्सर बेखौफ अपना काम करने दिया गया। जिअसे हमारे यहाँ अक्सर होता ही रहता है . सरकारी ढील या समर्थन की वजह से ही सांप्रदायिक और कट्टरपंथी तत्व अल्पसंख्यक वर्ग पर हमला करते समय सरकार से नहीं डरते।
बांग्लादेश में शेख हसीना की सत्ता के तख्ता पलट के बाद वहां के हालात जो होने थे वो सवाभाविक हैं मगर भारत में जो वोचारधारा आपदा में अवसर तलाशने वाले Narrative सेट करने की कोशिश कर रही हैं वो घातक है . भारतीय मीडिया और IT cell नफरत की बुझती आग के अलाव को कुरेदने में लगे रहते हैं ताकि कोई चिंगारी बची हो तो उसको आग में तब्दील किया जा सके .
बांग्लादेश में हसीना हे तख़्ता पलट के बाद हिंसा धार्मिक या जातीय नहीं बल्कि सियासी रही है . बांग्लादेश अवामी लीग के खिलाफ जनता का ग़ुस्सा था जो हसीना की पार्टी से जुड़े नेताओं पर निकल रहा था , देश में तख्ता पलट है तो ज़ाहिर है इसके बाद हिंसा स्वाभाविक है .
बांग्लादेश में सत्ता बदली है , प्रशासन बदल रहा है , शासन बदला है , माहौल ,सोच ,नज़रिया बदल रह है . हालात से आम जनता विचलित है , कारोबारी लोग जल्द अपने काम पर आना चाहते हैं .
84 वर्षीय मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के सामने बड़ी चुनौती इस वक़्त law & Order को लेकर है . अवाम की जान माल की सुरक्षा को लेकर है . लोकतंत्र और शान्ति की बहाली को लेकर है और वहां की अवाम में भी फिलहाल यही चर्चा है .
जबकि दुनिया में चर्चा इस बात की भी है की बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरवादी संगठन सक्रिय हैं जो हसीना सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ थे ऐसे में उनका छात्र संगठनों को सहयोग मिल रहा है .
फिलहाल अपनी सुरक्षा को लेकर वहां की पुलिस भी चिंतित है क्योंकि वो छात्रों पर नरसंहार में सरकार के साथ रही है .और वो कई दिन तक अपनी यूनिफार्म में नहीं बल्कि civil कपड़ों में ही duty करते दिखाई दिए .
सड़कों पर ट्रैफिक Control अधिकतर बज़ाहिर मुसलमान दिखने वाले Volunteers कर रहे थे .कुछ दिन पहले तक Para Milatery भी जहाँ तहाँ दिखाई दे रही थी . NGOs से जुड़े लोग शांति , अमन और बहाली के ऐलानात कर रहे थे .
मस्जिदों से अल्पसंख्यकों की जान माल की रक्षा किये जाने और उनको सुरक्षा प्रदान करने के लिए भी ऐलान हो रहे थे .और सैंकड़ों संस्थाओं ने अपने हज़ारों स्वयं सेवियों को हिन्दू धार्मिक स्थलों की हिफाज़त के लिए तैनात कर कर दिए थे . इससे वहां की अल्पसंख्यक समुदाय में बड़ी राहत थी ,उनकी सुरक्षा को लेकर जनता के साथ वहां की अंतरिम सरकार भी पुरज़म थी .
इसके बरक्स भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक के ज़हन में यह सवाल बना हुआ है कि हिंदुस्तान में मुल्क की आज़ादी में बड़ा किरदार अदा करने वाली बल्कि स्वतंत्रता संग्राम शुरू करने वाली मुस्लिम क़ौम के ख़िलाफ़ यहाँ नफरत आखिर किस हद तक जायेगी ?
यहाँ आये दिन खुले आम ज़ुल्म और नफ़रत आम बात है ,, घर जलते हैं , लोग मरते हैं कारोबार लूटे जाते हैं , ज़ुल्म के नाम पर क्या क्या नहीं होता , और ये सब सरकार में शामिल मंत्रियों की निगरानी और पुश्तपनाही में होता है बल्कि वो खुद यहाँ के अल्पसंख्यकों के सामाजिक और कारोबारों के Bycot का आव्हान करते हैं , और गोली मारने के नारे लगाते हैं .
सुनियोजित ढंग से सांप्रदायिक उन्माद फैलाने के लिए मुहीम चलाई जाती है . और वो सब कुछ होता है जो नहीं होना चाहिए धर्मनिरपेक्ष भारत में ,,,,,,क्योंकि इन नफ़रतीयों को सरकारी संरक्षण प्राप्त है , सैयां भयो कोतबाल तो डर काहे का ……
इसलिए आये दिन अल्पसंख्यकों ख़ुसूसन मुसलमानों के खिलाफ ज़ुल्मो जबर की घटनाएं आम बात है , जब उन्माद और आतंक फैलाने और क़ानून को हाथ में लेने का चलन आम हो जाए तो देश में विनाश को कोई रोक नहीं सकता . और याद रखें ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है …..
भारत में मुसलमानों को इसलिए सताया जाए की बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को परेशां किया जा रहा है तो यह बताया जाए कि भारत में मुसलमानों और ईसाईयों पर होने वाले ज़ुल्म के बाद अहतजाज करते हुए कितने मुस्लिम या ईसाई देशों में हिन्दुओं के ख़िलाफ़ बदला लेने की मुहीम चलाई गई ? कितने हिन्दू भाइयों के कारोबार और उनके सामाजिक बहिष्कार का ऐलान हुआ ….कभी नहीं ,, कहीं भी नहीं …
अलबत्ता भारत के अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए SOLIDARITY में शांतिपूर्ण रैलियां ज़रूर होती रही हैं .और ऐसा हर न्यायसंगत समाज में होना ही चाइये .दुनिया में दो क़ौमें रही हैं एक ज़ालिम दूसरी मज़लूम ,,,, हमको ज़ालिम की मुख़ालफ़त और मज़लूम की मदद करना चाहिए एहि मानवता का तक़ाज़ा है .ज़ुल के मामले में धर्म या जाती देखकर सोच नहीं बनानी चाहिए
बांग्लादेश के सियासी Termoil या उथल पुथल को धार्मिक और सांप्रदायिक रुख देकर भारत को सांप्रदायिक आग में झोंकना कितना justified है ?? भारत की 20 % अल्पसंख्यक यानी 56 करोड़ जनता के विरुद्ध नफ़रत और द्वेष तथा सौतेलेपन का नतीजा क्या होगा कभी आपने सोचा >>>>>??????अगर समझ आया हो तो कमेंट ज़रूर दें
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