दो साल में 1,50,000 से ज्य़ादा घर ध्वस्त किए गए और 7,38,000 लोग बेघर हुए. दुखद यह रहा इसको बुलडोज़र न्याय का नाम दे दिया गया. जबकि दूसरी राजनितिक पार्टियां इसको सर्कार की दमनकारी नीति बता रही है, जो अंग्रेज़ी दौर में भी नहीं हुआ था.
अपने ही मुल्क में लोग बेगाने हो गए अनजाने बनाये आ रहे हैं, चर्चा में कहा जा रहा है की वर्तमान सरकार अपने ही देशवासियों को ज़बरदस्ती गद्दार बना रही है. जो सरकार इनके घरों को दुकानों और पूजा स्थलों को गिरा रही है क्या उससे इन्साफ़ की उम्मीद की जा सकती थी?
बुलडोज़र न्याय की वजह सरकारी ज़मीन का अतिक्रमण बताया जाता है। अगर यही वजह है तो सरकार कार्रवाई सभी अतिक्रमणकारियों के खिलाफ क्यों नहीं अपना रही? मज़े की बात यह है कि ये सब अतिक्रमण सरकारों की मौजूदगी में हो रहा होता है. फर्क़ इतना है कि सरकारों में बैठी पार्टियों के झंडों के रंग अलग थे और विचारधारा भी I
फर्क़ यह भी था कि पिछली सरकारें कम से कम बहु संख्यकों यानी हिन्दुओं के साथ तो अन्याय नहीं करती थीं . आजकी सरकारे हिन्दू हितेषी के ढोंग करती हैं और उन्हीं को नुक़सान भी पहुंचाती हैं.
बनारस (वाराणसी) में ‘दालमंडी’ इलाके में हिन्दू व्यापारियों सहित अनेकों कारोबारियों को उजाड़ा गया है। भाजपा की डबल इंजन की सरकार में प्रशासन ने इन दुकानों को अवैध अतिक्रमण बताकर गिराया।
जबकि विपक्ष का आरोप है कि यह राजनीतिक द्वेष की कार्रवाई है, और भाजपा सरकार ने विपक्ष को कमज़ोर करने के लिए यह कदम उठाया. उधर व्यापारियों का कहना है कि वे दशकों से वैध तरीके से काम कर रहे थे, जिससे शहर के पारंपरिक ढाँचे और तालमेल पर बुरा असर पड़ा है।
कुल मिलाकर इसका ख़मयाज़ा मुसलमानों और हाशिए पर रहने वाले समूहों के साथ आम नागरिकों को भी भुगतना पड़ा है. मगर यहूदि कम्पनियों को जितना लाभ पिछले 10 वर्षों में भारतीय बाज़ार से हुआ इतना पहले कभी नहीं हुआ.
साथ ही बनारस का बड़ा कारोबार गुजरातियों के हवाले कर दिया गया और बनारस के लोग देखते ही रह गए. हो सकता है किसी सरकार के ज़हन में यही सामंजस्य और रिवायती तालमेल हो कि गुजरात उत्तर प्रदेश के भी कारोबार पर क़ाबिज़ हो. लेकिन क्या बनारस को भी गुजरात के कारोबार और ज़मीनों में हिस्सा दिया जाएगा?
हालिया दिनों में भारत में यहाँ के मूल निवासियों, आदिवासियों, ईसाइयों औऱ मुसलमानों को जिस तरह टार्गेट किया गया उसने मनुवादी लक्ष्य को साफ़ उजागर कर दिया.
किसी भी लोकतांत्रिक देश में न्याय का आधार क़ानूनी प्रक्रिया और अदालत का आदेश होता है न कि त्वरित बुलडोज़र कार्रवाई या प्रशासनिक ताक़त का प्रदर्शन। अगर किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, तो उसका फ़ैसला अदालत में सबूतों और सुनवाई के बाद होना चाहिए, न कि आरोप लगते ही उसका घर गिरा दिया जाए।
बुलडोज़र जस्टिस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें दोष सिद्ध होने से पहले सज़ा दी जाती है, क़ानूनी प्रक्रिया को दरकिनार किया जाता है, और यह संदेश जाता है कि राज्य स्वयं जज, जूरी और जल्लाद बन रहा है.
और लगभग यही सब कुछ अँगरेज़ साम्राजयवाद के दौर में हुआ करता था. जिसके खिलाफ देश की जनता ने असहयोग आंदोलन चलाया और फिर मार भगाया.बुलडोज़र से डर पैदा किया जा सकता है, लेकिन डर से व्यवस्था नहीं चलती।
लोकतंत्र की बुनियाद डर नहीं, क़ानून और संविधान हैं। डर और ख़ौफ़ पैदा करना यह तानाशाही की अलामत है. जबकि आज इस तानाशाही को झूठे राष्ट्रभक्ति के चोले में छुपाया गया है, जो देश के साथ बड़ा धोखा और गद्दारी है.
राजधर्मी का काम सार्वजनिक रूप से धार्मिक या राजनितिक पाखंड नहीं, डमरू, ढोल बजाना और डुबकी लगाना नहीं, बल्कि जनता के साथ इंसाफ़, समानता, सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना ही राजधर्म होता है. सत्तापक्ष अपना राजधर्म नहीं निभाकर जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर करती है, या कहें बाग़ी बनाती है.
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