बटला हाउस के खसरा नम्बर 279 के निवासियों को राहत

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DDA ने बटला हाउस के खसरा No 279 पर विध्वंस न करने की HC में Undertaking दी

बटला हाउस के खसरा नम्बर 279 के Demolition कार्रवाई पर लगी रोक ?

डीडीए ने अदालत में याचिकर्ता और बटला हाउस के प्रभावित निवासियों को कोई आश्वासन नहीं दिया

2 अहम् बिंदुओं पर अदालत ने की टिप्पणी जिसको समझना बहुत ज़रूरी

New Delhi : बटला हाउस प्रकरण में सबसे पहले हमको यह बताना है कि यह विध्वंस या demolition बतला हाउस का नहीं बल्कि एक खसरा No. का मामला है | जिसको main stream तथा सोशल मीडिया पर लगातार बटला हाउस विध्वंस के नाम से चलाया जा रहा है. तो किरपा करके इसको खसरा No से ही रेखांकित करें या बोलें अन्यथा यह खबर से भटकाने या एक community के ख़िलाफ़ negative narrative सेट करने के अपराध की श्रेड़ी में आएगा जिसपर संवैधानिक तौर से सज़ा का प्रावधान है . अब बढ़ते हैं असल ख़बर की तरफ़…..

बटला हाउस में कई हफ़्तों से खसरा नम्बर 277/279 डेमोलिशन को लेकर काफी बेचैनी है | DDA और UP सिचाई विभाग खुआबे खरगोश से जागी मगर बटला हाउस के लोगों की नींद हराम कर दी.

अक्सर लोगों का कहना है के हमारे पास इन मकानों के काग़ज़ात हैं इन्ही addresses पर हमारे तमाम सरकारी पहचान पत्र और दस्तावेज़ बने हैं | 4 दशकों से हम लोग यहाँ के निवासी हैं.

हम तो बने बनाये मकानों में आये हैं हमने बनाये नहीं हैं | इस बीच सम्बंधित विभागों , पुलिस और Builders के बीच क्या सौदेबाज़ी हुयी हम नहीं जानते| हुई भी या नहीं यह भी हमको नहीं पता |

इस सबके बावजूद हमको पिछले ३ माह से अपने आशियाने छिन जाने का ख़ौफ़ सोने नहीं दे रहा है . कई लोगों का कहना है के उनको BP और शुगर जैसी बीमारियों ने पकड़ लिया है |

वहां के नेता इस बात को लेकर आश्वस्त हैं की यहाँ कुछ नहीं होगा. और कई का मानना है के यहाँ से पुलिस को करोड़ों रुपया सालाना कि ऊपरी आमदनी होती है. जिसके चलते हर वो काम संभव हो जाता है जो संवैधानिक तौर से illegal होता है |

लेकिन illegal तो illegal ही रहेगा और इस की फ़फ़ूंद कब पनप जाए कहा नहीं जा सकता | जैसे आज 40 वर्ष बाद यह मुद्दा पनपा है जिसको आपदा में अवसर से भी जोड़कर देखा जा रहा है |

कई intellectuals का कहना है कि यह सब आपदाएं इसलिए पैदा की जाती हैं ताकि अपनी मर्ज़ी के काम करने के अवसर निकाले जाएँ. देश वासियों पर साम्राज्य्वादी सोच का डंडा चलाया जाए और बूटों की धमक से नागरिकों को धमकाया जाए |

इसका फायदा सरकारों को यह होता है के जनता का ध्यान नाकामियों से हटा दिया जाता है और लोग अपनी अपनी में पड़ जाते हैं | लेकिन कभी कभी नकारात्मक नतीजे भी आते हैं और जनता सड़कों पर निकल आती है |

फिर यह तो जनता है सरकारों के टैंकों के रुख मोड़ दिया करती है. जनतंत्र है तो इसकी भी आशंका हमेशा बनी रहती है जिसको सरकारें भी नज़र अंदाज़ नहीं कर सकतीं |

सरकारों को जनांदोलन की ताक़त का आभास रहता है इसी लिए वक़्तन फवक्तन वो अपने फैसलों में तब्दीलियां करती हैं . जो यक़ीनन देश के हित में होता है|

हर वो योजना जो जनता के हित की हो वो देश के भले कि होती है. लेकिन कभी कुछ तुग़लकी फ़रमान या तानाशाही फैसले देश के लिए हानिकारक होते हैं और खुद सरकारों और पार्टियों के लिए भी |

अब चाहे वो इन्द्राकाल हो या मोदी काल हालाँकि दोनों में काफ़ी अंतर है|

इस सबके बीच खसरा No. 279 बटला हाउस के निवासियों में Panic है बेचैनी है और यह Panic स्वाभाविक है, फ़ितरी है |

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में DDA को बोला था कि वो अपनी ज़मीन को खाली कराये| इसी को DDA आधार बनाकर Demolition कार्रवाई का होंसला कर बैठा | हालांकि SC ने विध्वंस के आदेश जारी नहीं किये होंगे ऐसा हमारा मानना है क्योंकि हमने Order की तहरीर को नहीं पढ़ा है |

दरअसल दिल्ली में पार्कों के बनाने और उनकी देख रेख के लिए DDA को ज़िम्मेदारी दी गई है .और पार्कों के लिए जगह आवंटित की गई है| जो कभी कभी विभाग के लोकल अधिकारीयों के माध्यम से Builders को कौड़ियों के दाम पर दे दी जाती है |

बटला हाउस

3 अहम् बिंदुओं पर अदालत ने की टिप्पणी

आज 11 जून को दिल्ली HIGH COURT में बटला हाउस मामले को लेकर सुनवाई हुई .जिसमें अहम् बिंदुओं पर अदालत ने टिप्पणी की| सभी बटला हाउस निवासियों की निगाहें आजके फैसले पर टिकी थीं | उधर कल से ही इलाक़े में Force का Deployment होने लगा था | इस वजह से लोगों में ग़ुस्सा भी था और ख़ौफ़ भी |

पहला अहम् बिंदु

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद ने बहस करते हुए एक अहम् बिंदु की तरफ अदालत का ध्यान केंद्रित करते हुए कहा कि याचिका में जिस संपत्ति का उल्लेख है, उसके साथ-साथ अन्य संपत्तियों पर भी बिना उचित डिमार्केशन के नोटिस चिपकाए गए हैं|

सलमान खुर्शीद ने पक्ष रखते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया |

दूसरा अहम् बिंदु

हाई कोर्ट ने कहा कि अगर डिवीजन बेंच इस PIL पर कोई आदेश देती है तो इसका असर सिंगल जज के सामने लंबित अन्य याचिकाओं पर भी पड़ेगा, जिससे कानूनी उलझन पैदा हो सकती है |

सलमान खुर्शीद ने गुज़ारिश की कि उन्हें नई रिट याचिका दाखिल करने के लिए कम से कम सात दिन या तीन वर्किंग डे का समय दिया जाए | कोर्ट ने तीन वर्किंग डे का समय प्रदान किया और याचिका को वापस लेने की अनुमति दी |

दिल्ली हाईकोर्ट में बटला हाउस मामले की सुनवाई के दौरान अमानतुल्लाह खान को बटला हाउस स्थित खसरा NO . 279 विध्वंस के खिलाफ उनकी याचिका वापस लेने को कहा गया |

साथ ही प्रभावित निवासियों (Affected Residents) को अदालत का रुख करने के लिए तीन कार्य दिवस का समय दिया गया।

तीसरा अहम् बिंदु
हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए सख्त लहजे में कहा ,“हमें यह देखना होगा कि अधिकारी सोते क्यों रहते हैं इस बीच लोग निर्माण कर लेते हैं और फिर एक दिन अचानक अधिकारी जागते हैं और विध्वंस का फैसला करते हैं… इस तरह के मामलों में हमें न्याय सुनिश्चित करना होगा।”

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका में कोई सामान्य आदेश पारित करना किसी व्यक्तिगत याचिकाकर्ता के मामले को खतरे में डाल सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अमानतुल्लाह खान की याचिका को जनहित याचिका (PIL) के रूप में नहीं माना जा सकता क्योंकि “अगर यह खंडपीठ नोटिस की वैधता पर कोई भी टिप्पणी करती है, तो इसका प्रभाव किसी ऐसे व्यक्ति के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जो उपयुक्त प्राधिकरण (Concern Authority) के सामने निजी तौर से मामला उठाना चाहता हो।”

बटला हाउस

याचिका वापस लेने का क्या होगा फ़ायदा ?

दिल्ली हाईकोर्ट ने अमानतुल्लाह खान द्वारा दी गई याचिका को “वापस लेने कि अनुमति दे दी | इसका लाभ यह हो सकता है कि प्रभावित लोगों को अपने तौर पर बात रखने और सम्बंधित विभाग से बात करने का भी मौक़ा मिल सकता है |

हाईकोर्ट ने अमानतुल्लाह खान को जन प्रतिनिधि के रूप में वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद की गुज़ारिश पर तीन कार्य दिवस का समय दिया ताकि वे बटला हाउस के खसरा NO . 279 विध्वंस के प्रवासियों को कानूनी अधिकारों की जानकारी दे सकें या उन्हें याचिकाकर्ता के रूप में अदालत में पेश कर सकें।

कोर्ट ने जब DDA से पूछा कि क्या याचिकाकर्ता को कानूनी विकल्प अपनाने तक डिमोलिशन रोका जा सकता है तो डीडीए के वकील ने फिलहाल विध्वंस रोकने को लेकर कोई आधिकारिक आश्वासन देने से इनकार कर दिया।हाईकोर्ट ने साफ किया कि अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना हुई है तो संबंधित पक्ष सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं |

शायद अदालत परोक्ष रूप से यह कहना चाहती है कि सम्बंधित विभागों की लापरवाही बड़े नुकसान की वजह बन जाता है लिहाज़ा विभागों और प्राधिकरणों को चाहिए कि वो समय रहते न्यायसंगत और संवैधानिक फैसले लें तो अदालतों पर बढ़ता लोड भी कम होगा और नागरिकों का समय और पैसा भी बचेगा |

इसका मतलब यह भी हो सकता है कि कोई भी प्रभावित व्यक्ति Authority के साथ सेटलमेंट करके क़ानूनी और संवैधानिक अपना अधिकार ले सकते हैं| जबकि PIL के बाद Individual के पास यह विकल्प नहीं रहता या यह मौक़ा नहीं रहता |

कुल मिलाकर आजकी अदालती सुनवाई में कोई  (Official Stay) नहीं दिया गया है | क्योंकि डीडीए ने अदालत में याचिकर्ता और प्रभावित प्रवासियों को कोई आश्वासन नहीं दिया।

जबकि अब यह पूरी तरह डीडीए पर निर्भर करता है कि विध्वंस कार्य को आगे बढ़ाए या इंतज़ार करे। हालाँकि इन तीन दिनों में प्रभावित लोगों के पास गवर्नर और DDA के आला अधिकारीयों के साथ बैठकर मामले को हल करने और अपनी बेहतर क़ानूनी तैयारी का भी वक़्त मिल गया है |

Times Of Pedia Bureau Report

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