मोहम्मद जावेद खान
कल भी कंधों पर थे ।
आज भी कंधों पर ।।
आज जब आरिफ़ अक़ील शेरे भोपाल का जनाज़ा लोगों के कंधों पर जा रहा था, ऐसा लग रहा था,जैसे इंसानों का सैलाब सड़कों पर उमड़ पड़ा हो । मेरे सामने वह चित्र याद आ गया, जब आरिफ़ अक़ील 1989 में पहले चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीते थे उस दिन भी आरिफ़ अक़ील अपने चाहने वालों के कंधो पर सवार होकर सराय में प्रवेश कर रहे थे .
Arif aqeel nahin raheआज तस्वीर उल्टी थी,आज आरिफ़ अक़ील लोगों के कंधों पर सराय से बाहर अपने आखिरी सफर के लिए निकल रहे थे, उस दिन भी कंधों पर थे,आज भी चाहने वालों के कंधों पर, उस दिन भी लोगों के आंखों में आंसू थे और आज भी लोगों के आंखों में आंसू फर्क सिर्फ इतना है,उस दिन खुशी के आंसू थे और आज ग़म के आंसू .
उस दिन समर्थकों का प्यार देखकर आरिफ़ अक़ील साहब की आंखों में आंसू थे, आज माजीद,आतिफ,आबिद और चाहने वालों के आंखों से आंसुओं के सैलाब बहे रहे थे,पिता से बिछड़ने का दर्द उनके पुत्र छुपा नहीं पा रहे थे।
जाने चले जाते हैं कहाँ ,
दुनिया से जाने वाले,
कैसे ढूंढे कोई उनको, नहीं कदमों के भी निशां ।
आए जब जब उनकी यादें,
आये होठों पर फरियादें,
जा के फिर ना आने वाले,
जाने चले जाते हैं कहां ।
मेरा मन बहुत विचलित हो रहा था, बार-बार मुझको पुरानी यादों के झोंके घेरे जा रहे थे, ऐसा लग रहा था कल ही की तो बात है जब आरिफ़ अक़ील पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान पर उतरे थे .
भोपाल की उत्तर विधानसभा क्षेत्र में यह नारा गुंजा करता था,प्यारा प्यारा,सबका दुलारा, आरिफ़ अक़ील,यह नारे 1989 से शुरू हुए आज तक कायम है,और हो सकता है,आने वाले समय में यह नारे उनके सुपुत्र आतिफ अक़ील के लिए लगाए जाए।
मुझे वह मंजर याद है,जब आरिफ़ अक़ील ने अपनी राजनीति की पारी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में शुरू की थी। जब भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों ने सोचा होगा एक और निर्दलीय प्रत्याशी,पर यह निर्दलीय प्रत्याशी भोपाल की राजनीति में अंगद के रूप में प्रकट हुआ.
अंगद में इतनी शक्ति थी,उनका पैर हटाना तो दूर हिला भी नहीं पाए, वैसे ही आरिफ़ अक़ील ने भोपाल उत्तर विधानसभा सीट पर अपनी छाप अंगद के रूप में पेश की,जो एक बार पैर जमा लिया,आखरी समय तक उनको कोई हिला नहीं पाया .
आरिफ़ अक़ील को उनकी सेहत ने धोखा दे दिया, उनको लगने लगा था, अब वह ज्यादा दिन जी नहीं पाएंगे,इसलिए उन्होंने अपने पुत्र आतिफ अक़ील को राजनीति में लाने का फैसला किया, जिसको लेकर परिवार में विरोध के स्वर उठने लगे.
जो अपने थे, वह भी बेगाने हो गए,इन बेगानों की वजह से आरिफ़ अक़ील को अंदर से तोड़ दिया था,चेहरे पर मुस्कान पर दिल उदास, उनकी नज़रें अपनों को ढूंढती थी,वह सोचते थे शायद यह बुरा सपना है,जैसे ही वह नींद से जागेंगे सब बेगाने अपने हो जाएंगे, पर अफ़सोस ऐसा ना हुआ ।
आज जब मेने आरिफ़ अक़ील साहब का जनाज़े के समय चेहरा देखा तो ऐसा लग रहा था, मानो बहुत थक गए हैं, सुकून की नींद सो रहे हैं ।
लेखक भोपाल मेट्रो न्यूज के संपादक हैं और सियासी विश्लेषक भी हैं
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