गैर कांग्रेसी सरकार और ईश्वरीय देन?Part2

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देवेंद्र यादव कोटा राजस्थान

कांग्रेस और गैर कॉन्ग्रेस सरकारों की बात करें तो, देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए कॉन्ग्रेस शासन ने क्या क्या कदम उठाए, श्रीमती इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया पीवी नरसिम्हा राव उदारीकरण की नीति लेकर आए और डॉक्टर मनमोहन सिंह मनरेगा योजना लेकर आए ! इन तीनों योजनाओं ने अपने अपने समय में देश की आर्थिक स्थिति को संभाला और मजबूत किया !


कांग्रेस और गैर कॉन्ग्रेस सरकारों में नीतियों को लेकर फर्क क्या है यह एक बड़ा सवाल है, कांग्रेस प्राथमिकता के आधार पर नीतियां बनाती है और उस पर प्राथमिकता के आधार पर ही धीरे धीरे अमल करती है जल्दबाजी मैं कोई फैसला नहीं लेती है !


जैसे, रोजगार की गारंटी, भूमि का अधिकार , शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, सूचना का अधिकार भोजन का अधिकार , लोकपाल बिल , राम मंदिर धारा 370 ट्रिपल तलाक समान नागरिकता बिल जनसंख्या नियंत्रण, आधार कार्ड , एफ डी आई, जीएसटी और निजी करण यह तमाम मुद्दे कांग्रेस की प्राथमिकता में शुमार थे लेकिन इन मुद्दों पर कांग्रेस प्राथमिकता के आधार पर अमल करती रही उसने जल्दबाजी नहीं की !


अब बात करें अटल बिहारी वाजपेई और नरेंद्र मोदी के युग की, तो पहली बार अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में गैर कांग्रेश सरकार ने पूरे 5 साल तब शासन किया, और अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भा जा पा लगातार दूसरी बार केंद्र की सत्ता में आकर शासन कर रही है लेकिन सवाल यह है कि क्या गैर कांग्रेस सरकारें कांग्रेस के जाल मैं उलझ कर अपनी बनी बनाई सत्ता को गवा देती हैं, श्रीमती इंदिरा गांधी की चवन्नी और कांग्रेसका निजी करण और नरेंद्र मोदी की नोटबंदी और निजी करण इसके उदाहरण है!


कांग्रेस शासन में भारतीय मुद्रा के रूप में चवन्नी को बंद किया था और आईटीडीसी के होटल निजी हाथों में दिए थे, चवन्नी और होटल का देश की अर्थव्यवस्था पर कोई खास असर नहीं पड़ा लेकिन नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी कर 1000 और 500 के नोट बंद किए और निजी करण के नाम पर बड़ी संख्या में सरकारी उपक्रमों का निजी करण किया, नोट बंदी के कारण देश की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई और निजी करण के कारण बेरोजगारी की समस्या बढ़ी.

देश के नौजवानों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कांग्रेस सरकारों में सरकारी उपक्रम खड़े किए इस कारण नौजवानों को सरकारी नौकरियां मिली लेकिन सरकारी उपक्रमों का निजी हाथों में जाने से सरकारी नौकरियों पर संकट मंडराने लगा और देश के नौजवानों का सरकार के प्रति गुस्सा और असंतोष दिखाई देने लगा , यह बात सत्य है की नोटबंदी और जीएसटी के बाद भाजपा केंद्र में पूर्ण बहुमत ही नहीं बल्कि प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई .

लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सत्तासीन नेताओं के लिए उनके द्वारा लिए गए फैसले हमेशा उनके अनुरूप ही होते चले जाएं,वक्त बदलता है और वक्त कब और कैसे बदलेगा इसका पता भी नहीं चलता, इसका एहसास भाजपा को होना चाहिए क्योंकि शाइनिंग इंडिया के नाम पर अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया लेकिन भाजपा को करारी हार मिली !

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