गुलाम भारत और आज़ाद भारत के राष्ट्रवाद की बदलती परिभाषा
Ali Aadil Khan Editor-in-Chief TOP News Group
अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन के पीछे उस वक़्त के भारत की आज़ादी के समर्थकों की मंशा अँगरेज़ साम्राज्य्वादी हुकूमत के ज़ुल्म और बर्बरियत से छुटकारा दिलाना थी ।और अपने ही म ुल्क में भारत का नागरिक ख़ास तौर से किसान अपनी मर्ज़ी से खेत में फसल नहीं लगा सकता था , किसान को वही खेती करनी होती थी जो अँगरेज़ हुकूमत कहे ।
इसी तरह ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के बाद भी दंड संहिता, कंपनी एक्ट, बैकिंग एक्ट और मोटर एक्ट जैसे सैकड़ों कानून हैं, जो आज भी कई देशों में जारी हैं। समय समय पर इनमें सुधार जरूर किया गया, लेकिन इन कानूनों की नींव वही पुरानी है।
अँगरेज़ के दौर में भारत में विकास की बात भी अक्सर कही जाती है , कई ऐसी बड़ी उपलब्धियां उनके दौर की हैं जिनको फरामोश नहीं किया जा सकता , इसी कड़ी में हल्का सा इशारा मुस्लिम शासन काल की भी करदें तो बेहतर होगा ।
गुलाम वंश , खिलजी वंश , तुगलक वंश, सैयद वंश , लोदी वंश ,मुग़ल , और पठान वंश में जहाँ एक तरफ भारत के छोटे छोटे क़बीलों को जोड़कर एक महा संघ बनाया था ,और भारत की सीमाओं का लगातार विस्तार किया था वहीँ देश में फौजी निज़ाम , आबपाशी निज़ाम , सड़क योजना ,शजरकारी यानी वृक्षारोपण ,डाक का निज़ाम , टैक्स का निज़ाम , शिक्षा का निज़ाम इत्यादि मुख्य हैं । मुस्लिम शासनकाल की उपलब्धियों पर अलग से एक लेख लिखूंगा , अभी चलते वीर सावरकर को भारत रत्न की तरफ ।
आज भारत के बड़े इलाके में किसी से मिलने उनके घर जायें तो पहली चीज चाय ही पूछी जाती है। अंग्रेजों ने भारतीय टी का प्रचार व प्रसार किया। गांव देहातों तक पहुंची टी में दूध पड़ने लगा और देखते ही देखते स्वादिष्ट चाय बन गई।यहाँ तक की वर्तमान प्रधानमंत्री चाय वाले के नाम से ही प्रसिद्द हैं ।
ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने अलग अलग देशों में अपनी भाषा अंग्रेजी का प्रसार किया। शासन, न्याय और उच्च शिक्षा के गलियारों में अंग्रेजी ने अपनी जगह पक्की कर ली। आज भी भारत, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के शासन और सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी है।
ब्रिटिश हुकूमत ने जिन जिन इलाकों पर राज किया, वहां आज भी गंभीर सीमा विवाद बने हुए हैं। एशिया में भारत-पाकिस्तान, भारत-चीन और पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच सीमा विवाद बरकरार है। वहीं कांगो और सेंट्रल अफ्रीका समेत अफ्रीका में कई देश सीमा विवाद में उलझे हैं।फलस्तीन -इजराइल विवाद तो न ख़त्म होने वाला मुद्दा है ।
“फूट करो और राज करो” इस नीति ने लंबे वक्त तक ब्रिटिश हूकूमत की शासन चलाने में मदद की। लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब ज्यादातर देश आजाद हुए तो वहां फैलाया गया जातीय संघर्ष ज्यादा हिंसक हो उठा। एशिया और अफ्रीका के कई देशों में सांप्रदायिक और जातीय संघर्ष आज भी जारी है।
इसी का एक बड़ा शिकार भारत भी है जिसमें जातीय और सांप्रदायिक दंगों के चलते विकास की राह काफी प्रभावित होती है किन्तु यह बांटो राज करो की नीति आज भी हमारे देश में सत्ता में बने रहने का एक बड़ा हथ्यार है , अब मज़े की बात यह है कि देश को आज़ाद कराने वालों के खिलाफ गवाही देने वाले , देश की आज़ादी के बड़े लीडर महात्मा गाँधी के क़त्ल के साज़िशकर्ता , अँगरेज़ से माफ़ी मांगने वाले और स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ अंग्रेज़ों की मदद का वादा करने वालों और स्वतंत्रता संग्रामियों का विरोध करने वालों को आज़ाद भारत के सबसे सम्मानजनक पुरस्कार भारत रत्न से नवाज़े जाने की तैयारी किस ओर इशारा करती है इसको भी आपको समझना होगा । आइये देखते हैं सावरकर का भारत की आज़ादी में रोल :
भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा ने खुले-आम दमनकारी अंग्रेज़ शासकों की मदद की घोषणा की जब पूरा देश देशभक्तों के खून से लहूलुहान था, समस्त देश को एक जेल में बदल दिया गया था, देशभक्त लोग सरकारी संस्थाओं को छोड़कर बाहर आ रहे थे;
इनमें बड़ी संख्या उन नौजवान छात्र-छात्राओं की थी जो कांग्रेस के आह्वान पर सरकारी शिक्षा संस्थानों को त्याग कर यानी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर आंदोलन में शामिल हो गए थे। ऐसे दमन काल में अंग्रेज़ों का साथ देने के लिए सावरकर जो हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे ने एक शर्मनाक पहल की।
कांग्रेस पर अँगरेज़ सरकार दुवारा प्रतिबन्ध का जश्न मानते हुए, हिंदू महासभा के सर्वेसर्वा सावरकर ने 1942 में हिन्दू महासभा के कानपुर अधिवेशन गोरे शासकों के साथ ‘उत्साहपूर्वक अनुकूल सहयोग’ नीति की घोषणा करते हुए कहा:
“सरकारी प्रतिबंध के तहत जैसे ही कांग्रेस एक खुले संगठन के तौर पर राजनीतिक मैदान से हटा दी गयी है तो अब राष्ट्रीय कार्यवाहियों के संचालन के लिए केवल हिंदू महासभा ही मैदान में रह गयी है।।।हिंदू महासभा के मतानुसार व्यावहारिक राजनीति का मुख्य सिद्धांत अंग्रेज सरकार के साथ उत्साहपूर्वक अनुकूल सहयोग की नीति है। जिसके अंतर्गत बिना किसी शर्त के अंग्रेजों के साथ सहयोग जिसमें हथियार बंद प्रतिरोध भी शामिल है।”
आपको याद है ? 7 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने बम्बई में अपनी बैठक में एक क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किया जिसमें अंग्रेज शासकों से तुरंत भारत छोड़ने की मांग की गयी थी।‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के साथ-साथ कांग्रेस ने गांधी जी को इस आंदोलन का सर्वेसर्वा नियुक्त किया और देश के आम लोगों से आह्वान किया कि वे हिंदू-मुसलमान का भेद त्याग कर सिर्फ हिदुस्तानी के तौर पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए एक हो जाएं।
भारत छोड़ो आंदोलन के साथ ग़द्दारी में सावरकर किस हद तक अंग्रेज़ों के दमन का साथ देने का तय करचुके थे इस का अंदाज़ा उन के इन शब्दों से लगाया जा सकता है:
“हिंदू महासभा का मानना है कि उत्साहपूर्वक अनुकूल सहयोग की नीति ही हर तरह की व्यावहारिक राजनीति का प्रमुख सिद्धांत हो सकती है। और इस लिहाज़ से इसका मानना है कि पार्षद, मंत्राी, विधायक, नगरपालिका या किसी सार्वजनिक संस्था के किसी भी पद पर काम करने वाले जो हिंदू संगाठनवादी दूसरों के जायज़ हितों को चोट पहुँचाए बिना हिंदुओं के जायज़ हितों को आगे बढ़ाने के लिए या उनकी सुरक्षा के लिए सरकारी सत्ता के केंद्रों का उपयोग करते हैं, वे देश की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं।
वे जिन सीमाओं में रहते हुए काम करते हैं उसे समझते हुए, महासभा यही उम्मीद करती है कि वे परिस्थितियों के मद्देनजर जो कर सकते हैं, करें और अगर वे ऐसा करने में विफल नहीं होते हैं तो महासभा उन्हें धन्यवाद देगी कि उन्होंने अपने आप को दोष मुक्त ठहराया है। सीमाएँ क़दम-दर-क़दम सिमटती जाएँगी जब तक कि वे पूरी तरह ख़त्म नहीं हो जातीं।
सहानुभूतिपूर्ण सहयोग की नीति, जो बिना शर्त सहयोग से लेकर सशस्त्रा प्रतिरोध तक तमाम तरह की देशभक्ति की गतिविधियों का रूप ले सकती है, हमारे पास उपलब्ध समय और साधन और राष्ट्रहित के तक़ाजों के अनुसार बदलती रह सकती है।
हिन्दू महासभा के नेता नंबर दो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो हद ही कर दी। आरएसएस के प्यारे इस महान हिन्दू राष्ट्रवादी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के मंत्री मंडल में ग्रह-मंत्री और उप-मुख्यमंत्री रहते हुवे अनेक पत्रों दुवारा बंगाल के ज़ालिम अँगरेज़ गवर्नर को दमन के वे तरीक़े सुझाये जिन से बंगाल में भारत छोड़ो आंदोलन को पूरे तौर पर दबाया जा सकता था।
ऐसे में आप ही बताएं की अंग्रेज़ो भारत छोडो और असहयोग आन्दोलनों की भरपूर मुखालफत करने वाले सावरकर जी को भारत रत्न से सम्मानित करना चाहिए या उनके गले में …………………………….
स्वतंत्रता सेनानियों की संस्था के संस्थापक ,आज़ादी के मतवाले , सेक्युलर हाउस के फाउंडर , IGNOU में बहादुर शाह ज़फर चेयर के चेयरमैन और पूर्व सांसद स्वर्गीय शशि भूषण जी कहा करते थे देश की विडंबना यह है कि देश के लिए लड़ने वाले पिट रहे हैं और गुलाम हैं तथा अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगने और उनका सहयोग करने वाले सत्ता में बैठे हैं ।वो कहते थे
राम चन्द्र कह गये सिया से
ऐसा कलियुग आयेगा
हंस चुगेगा दाना दुनका
कौवा मोती खायेगा !!!!
आज कौन कव्वा है और कौन हंस यह हमारे पाठक जानते ही हैं ।अब वीर सावरकर को भारत रत्न भी दे ही दिया जाए , जब ग्रह मंत्रालय शाह को दे दिया है तो , वैसे भी इतिहास के पुनर्लेखन के लिए शाह जी संकल्प ले चुके हैं ।मगर इतिहास भारत में 1022 साल हुकूमत करने वालों का भी बदल दिया गया है यह शाह साहब याद रखें ।
धरती पर घमंड करने वालों के लिए एक नसीहत और चुनौती भी , मंज़र भोपाली की यह नज़्म पेश ए खिदमत है , सत्ता धारी भी सुन लें शायर उनको ललकारता है
ताक़तें तुम्हारी हैं , पर खुदा हमारा है i
अक्स पर न इतराओ , आइना हमारा है
आप की ग़ुलामी का बोझ हम न ढोएंगे
आबरू से मरने का , फ़ैसला हमारा है
कोई भी हमेशा तो , जंग लड़ नहीं सकता
तुम भी टूट जाओगे , तजरूबा हमारा है
डूबने लगे जब हम , तब खुला फ़रेब उसका
हम तो यह समझते थे , नाख़ुदा हमारा है
दोस्ती से रहने में आफ़ियत है दोनों की
कुछ भला तुम्हारा है , कुछ भला हमारा है
ग़ैरत ए जिहाद अपनी , ज़ख्म खा के जागेगी
पहला वार तुम कर लो , दूसरा हमारा है !!!!!!