सियासत की दुकान पर बिकता है ?

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उठो चलो के मिटादो नफरतों का अब,ये चलन !
न जागोगे तो सपनो का ये चमन वीरान होगा !!

 

आप बाजार से चीज़ें इश्तहार देखकर खरीदते हो या तजर्बे के आधार पर …कुछ ने कहा इश्तहार देखकर कुछ ने तजर्बे की बुन्याद पर …अब फायदे में कौन है  , तजर्बे वाले या इश्तहार वाले ? जवाब तजर्बे वाले .. लेकिन क्यों ? क्योंकि इन्होने चीज़ों की क्वालिटी (गुणवत्ता ) परखने के लिए अपना पैसा खर्च किया और परखा ,,जांचा  फिर लाभ उठाया ..किन्तु जिन लोगों ने सिर्फ विज्ञापन या इश्तहार देखकर प्रोडक्ट खरीदा वो पैसा बराबर खर्च करते रहे लेकिन अच्छी चीज़ तक नहीं पहुँच पाते ,,क्योंकि वो इश्तहार की दुनिया में हैं और तजर्बों की दुनिया से दूर….

आज इश्तहार या विज्ञापन का दौर है हर चीज़ विज्ञापन के माध्यम से बिक जा रही है और विज्ञापन की इस दौड़ में अब सियासत भी पीछे नहीं है बल्कि यूँ कहें की आज जितना खर्च सियासत की दुकान पर होरहा है अगर वो खर्च सियासी पार्टियां अपनी अपनी ओर से  विकास पर लगादें तो देश चमक जाएगा देश ,एक शहर या एक गांव नहीं  …

आम खबर थी ,2014 आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 30 हज़ार करोड़ इश्तहार पर खर्च किया जिनमे TV ,अख़बार सब शामिल हैं , मैं अपने पाठकों को बता दूँ कि भारत  में 1  km  , 2 लेन , 600 MM मोटी परत वाली , दोनों साइड फुटपाथ के साथ सड़क बनाने में आने वाला खर्च २ करोड़ रूपये है ,

2014 में सत्ताधारी पार्टी ने खर्च किया 30  हज़ार करोड़ , इस पैसे में देश में 15 , 000 Km लम्बी 2 लेन रोड बनाई जासकती थी अब दूसरी सभी सियासी पार्टियों द्वारा किया गया खर्च जोड़ें तो यह लगभग 50 से 60 हज़ार करोड़ रूपये पर पहुँचता है इस पूरी रक़म में देश के अंदर एक इलेक्शन year में 30 , 000 हज़ार Km हाई क्वालिटी रोड बनाई जासकती है जिससे हर दिन  41 ,59000 bbl /day इस्तेमाल  होने वाले तेल में 10 – 15 % कि बचत की जासकती है .जो लगभग 60 , 000 bbl / day होता है ये बचत एक वर्ष में 365 * 60 , 000 = 21 ,90 ,000 bbl / Annum हो जायेगी और यह बचत देश के GDP रेट को बढ़ाएगी , साथ ही per capita income भी बढ़ेगी यानि हम सक्षम भी होंगे और अमीर भी .per capita income का मतलब होता है देश के हर नागरिक की औसत आमदनी .

अफ़सोस होता है उस वक़्त जब हम अपने नेताओं और अफसरों से बातों बातों मेँ यह जुमला सुनते हैं कि भय्या देश गया तेल लेने पहले अपना और अपने बाल बच्चों का पेट देखना है , और फिर अपने आखरी सांस तक यह अपना और अपने बाल बच्चों का पेट भरने मेँ ही लगा रहता है , और एक रोज़ उसकी इस हवस  कि खोपड़ी को मौत आकर भर देती है .

अब आप ही इन्साफ से बताएं जब हमारे सियासी रहनुमाओं और सुरक्षा अधिकारीयों का मक़सद ही सिर्फ पैसा कमाना होगा तो क्या ख़ाक देश का भला होगा देश तो दुधेरी गैया होगी जितना निकले निकाल लो .सियासी पार्टियों और सियासत कि गलयारों मेँ जब सिर्फ पैसे कि बात होने लगे , नफरत , अलगाव , साम्प्रयिक्ता , और धुर्वीकरण कि बात आम होजाये तो अब आप क्या उम्मीद करेंगे सियासत कि दुकानों से , क्योंकि यहाँ तो बिकती है नफरत , दंगे , स्वार्थ , धोकेबाज़ी , जुमलेबाज़ी , तिकड़मबाज़ी , चारसो बीसी , पुलिसदलाली , नमकहरामी , और यह सब देश से दुश्मनी का रास्ता है . बहुत

जिस नेता कि मुस्कराहट के पीछे साज़िश हो, जिस नेता के आंसुओं के पीछे मक्कारी हो ,जब सियासत लुटेरों का साथ देने लगे और भौकों के पेट पर लात मारने लगे , जब शराफत और सादगी बेवकूफी कहलाने लगे और मक्कारी , चतुरता व् समझदारी कहलाने लगे ,जब ज़ालिमों कि सुरक्षा और मज़लूमों पर लाठी चार्ज होने लगे , जब क़ातिलों का समर्थन और मक़तूलों का बॉयकॉट होने लगे और इस सब पर अवाम खामोश रहे कोई आंदोलन नकिया जाए तो समझो अब देश मेँ केहर आने वाला है आसमान से अज़ाब बरसने वाला है .

आज सियासी ढाँचे को बदलने कि ज़रुरत है , चुनावी कार्यप्रणाली को बदलने कि ज़रुरत है , सियासी दुकानों को बंद करने और सेवा के मकतबों को चलने कि ज़रुरत है , नफरत के माहौल को मिटाकर प्यार और सहयोग के माहौल कि ज़रुरत है .Editor’s desk 

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