और वहां पहले पेज पर जूते ही जूते

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पत्रकारिता का व्यवसायीकरण मीडिया हाउसेस के लिए तो ज़ाहिर है लाभदायक है लेकिन समाज का इससे नुकसान ही है मीडिया पैसा कमाने नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण ,वर्गों और समूहों को एक क़ौम बनाने , देशवासियों और समाज को आपस में जोड़ने और अपने इर्द गिर्द के हालात से जनता को अवगत कराने तथा सूचनाओं के पहुँचाने के लिए होना चाहिए , जबकि मीडिया में सब कुछ इसके पलट होरहा है ,

लेकिन चापलूस और बिकाऊ मीडिया के समुन्द्र में एक दो ऐसे भी चैनल और अखबार हैं जो टापू की तरह जमे खड़े हैं और` शायद उन्ही की वजह से देश आफात्काल से बचा हुआ है , क्योंकि जिस देश या समाज में बुराई को रोकने और अच्छाई को फैलाने का काम नहीं होता तो उसका मुक़द्दर सिर्फ तबाही बन जाता है ,जो आज देखने को मिल भी रहा है ऐसे में जो भी जमातें या संस्थाएं या मीडिया हाउसेस बुराई का मुक़ाबला कररहे हैं और सच्चाई व् इन्साफ के लिए अपने जान और माल को दाव पे लगा रहे हैं वो प्रशंसा और दुआओं के पात्र हैं.

आज मीडिया किस प्रकार से वर्गों और समुदायों के ऐतबाअर से ख़बर बनाते हैं हम आपको एक ही मीडिया हाउस के 3 अलग अलग भाषाओं के समाचार पत्रों की हैडिंग से समझाते हैं , आइये नज़र डालते  हैं जागरण के उर्दू एडिशन 28 जनवरी के इंक़लाब मुख पेज पर लिखते हैं “फ़िरक़ा परस्तों का वतन परस्त मुसलमानो पर हमला “.मुख पेज पर ही दूसरी खबर थी “खुदकुश हमले से दहल उठा काबुल , 100 से ज़्यादा हलाक ” याद रहे उर्दू अखबार सिर्फ मुसलमान पढ़ते हैं इसके अलावा कुछ एजेंसियों और खोजी पत्रकारों को भी उर्दू अख़बारों पर नज़र मारनी ज़रूरी होती है ,

अब आइये हिंदी एडिशन जागरण पर ,इसके मुख पेज पर दिखाई दिए जूते ही जूते ,एकबार तो लगा जैसे कासगंज में गोली नहीं जूता चला हो , पता चला ये जूते का ऐड है और अख़बार ने नोट छापने के लिए अपने मुख पेज पर जूते छापे हैं , दुसरे पेज पर गए तो पता चला कासगंज दंगों की खबर पर एक हैडिंग है “पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाना ग़लत : हैदर ” .

अब हमारे पाठक इस से सहज ही अंदाज़ा लगा सकते हैं की किस प्रकार खबर की हैडिंग पाठक के मज़हब और विचार के हिसाब से बदल दी जाती है .जबकि खबर वो है जो सच भी हो औ`र संवेदनशील भी न हो . खबर , खबर है ..हाँ यह ज़रूर है की खबर से पाठक आहत न हो , खबर से समाज वर्गों में न बनते , यह कोशिश होनी  चाहिए हमारे मीडिया हाउसेस की .

28 जनवरी के उर्दू इंक़लाब के “फ़िरक़ा परस्तों का वतन परस्त मुसलमानो पर हमला ” की सब हैडिंग में लिखा है  “कासगंज में शहीद अब्दुल `हमीद तिराहे पर मुसलमानो की जानिब से यौम ए जम्हूरिया की तक़रीब में ABVP और VHP के गुंडों की तोड़फोड़ ”  अब अगर वास्तव में ही जागरण के उर्दू एडिशन` इंक़लाब की मंशा ABVP और VHP के दंगाइयों को गुंडा और असामाजिक बताना ही था तो हिंदी एडिशन में यह हैडिंग क्यों नहीं बनाई गयी , इसका मतलब हिंदी और उ`र्दू पाठक को ग्रुप में बांटने का काम कररहे हैं मीडिया हाउसेस यह दयनीय है .

हमारा मतलब यहाँ यह सब बताने का यह है की सांप्रदायिक घटना देश के किसी भी हिस्से` की हो मीडिया को इस सम्बन्ध में अपना रोले बहुत ही समझदारी और ईमानदारी से निभाना चाहिए , देश की जनता वर्गों , समुदायों , गुटों  में न बात जाए एक क़ौम` बनकर रहे इसका पूरा प्रयत्न करना चाहिए .

यह सब बताने का यहाँ हमारा मतलब यह है की सांप्रदायिक घटना देश के किसी भी हिस्से की हो ,नुकसान जिसका भी हो ,मीडिया को इस सम्बन्ध में अपना रोल बहुत ही समझदारी और ईमानदारी से निभाना चाहिए , और इसके लिए सिर्फ प्रशासन और सर्कार को ही जवाबदेह बनाना चाहिए , देश की जनता को वर्गों , समुदायों , गुटों  में न बांटकर एक क़ौम की तरह बनाने का पूरा प्रयत्न करना चाहिए .

मगर बहुत अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की आज सारे मीडिया हाउस दो चार को छोड़कर सरकारी चापलूस और पार्टियों के प्रवक्ता बन गए हैं, इस तरह सरकारें मीडिया को अपना ग़ुलाम बनाये रखना चाहती हैं और मनमाने ढंग से देश को चलाने लगती हैं जो लोकतंत्र और संविधान दोनों के लिए बड़ा खतरा है .

हालिया कासगंज की घटना में जिस प्रकार से अलीगढ , बरेली और हरयाणा के आला अधिकारीयों की टिप्पणी और पोस्ट सामने आये हैं वो काफी होंसला देने वाले हैं ,साथ ही देश के सेक्युलर और इन्साफ पसंद हिन्दू भाइयों ने जिस प्रकार कासगंज घटना में सच्चाई को सामने लाते हुए ABVP और विहिप को बेनक़ाब किया है वो अत्यंत सराहनीय है और उम्मीद अफ़ज़ा भी ,

जिसमें कहा गया है की मुस्लिम की बस्तियों से भगवा लेकर तिरंगा यात्रा निकालना ,और वहां आपत्तिजनक भाषा का स्तेमाल करना तथा क़ाबिल ए ऐतराज़ नारे बाज़ी करना दुसरे गरोह को दंगे के लिए उकसाना है , उसके बाद किसी भी अनहोनी की ज़िम्मेदारी उकसाने वाले गरोह पर आ जानी चाहिए मगर सितम यह कि अक्सर पीड़ित वर्ग को पुलिस के ज़ुल्म का सामना भी करना पड़ता है, और एक वर्ग विशेष के नौजवानो की गिरफ्तारियां शुरू होजाती हैं जो देश के संवैधानिक और लोकतांत्रिक ढाँचे को पंगु बना देती है ..Editor’s Desk

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