ज़हरीली हवा के बीच सिकुड़ता बचपन!*

Date:

?????

अब्दुल रशीद अगवान

जबकि हम नये साल का जश्न मना रहे हों, बल्कि साल भर कोई न कोई जश्न मनाते ही रहते हों। जबकि हम कई ग़ैर अहम मुद्दों मसलन गाय और तलाक़ पर उलझे रहते हों। और जबकि हम अपने आने वाले कल से ज़्यादा बीते हुए कल के लिए फिक्रमंद रहते हों। हम भूल जाते हैं कि हम किस तरह की तबाहियों से दो चार हैं।

मिसाल के तौर पर हवा में घुलते ज़हर को ही ले लीजिए।

हवा हमें मुफ्त में मिल जाती है इसलिए उसकी कोई क़द्र नहीं है! मगर हम धीरे धीरे ऐसी दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं जहां हमें इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी।

हमारी सरकारें, हमारे अक़लमंद लोग, हमारे हर तरह के लीडर हमें नहीं बताना चाहते हैं कि हम किन ख़तरों की और बढ़ रहे हैं। हवा में घुलता ज़हर हर तरह की हद पार कर रहा है। मगर हम ख़ामोश हैं। एक गाय की मौत पर या किसी सूअर के मस्जिद में फेंक देने पर ख़ून ख़राबा करने वाला समाज अपनी और अपनी आने वाली नस्लों की तिल तिल होती मौत को ख़ामोशी से देख रहा है।

यूनिसेफ ने पहली बार एक बड़े सर्वे के ज़रिये हमें आगाह किया है कि हम कहां खड़े हैं।

इस रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के 1.7 करोड़ बच्चे ज़हरीली हवा का शिकार हुए हैं जिनमें से आधे से ज़्यादा भारत से हैं। हवा में घुले केमीकल्स की वजह से 19.2 करोड़ बच्चे औसत से कम वज़न के पैदा हुए हैं जिनमें 9.7 करोड़ सिर्फ हमारे मुल्क के हैं। हवा की क्वालिटी का सीधा असर निमोनिया जैसी बीमारी पर पड़ता है जिससे भारत में हर साल 18 लाख बच्चों की जान चली जाती है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि *हवा के ज़हरीलेपन की वजह से मां के पेट में पलते बच्चों के दिमाग़ पर बुरा असर पड़ता है। उनमें आईक्यू की सतह पांच पोइंट तक गिर जाती है। बच्चों के फेफड़े सिकुड़ रहे हैं। यह बच्चों को ग़ुस्सैल बना रहा है और उनमें जुर्म करने के रुझान को फरोग़ दे रहा है। उनमें याददाश्त की ताक़त को कम कर रहा है।*

मौसम बदलने के साथ दिल्ली समेत भारत का एक बड़ा हिस्सा धुंध और पोल्यूशन की चपेट में है। और हम अपनी आने वाली तबाही पर जश्न मनाते रहते हैं बल्कि हमारा हर जश्न, उसमें जलते फटाखे, बड़े पैमाने पर जमा कूड़ा, पानी की बर्बादी, नदियों और झीलों फैंके गये जश्न के निशान, वग़ैरह हमें इस बढ़ते अज़ाब में और गहरा धकेल देते हैं।

शायद इस ज़हरीली हवा ने हमारी सोचने समझने की ताक़त भी हम से छीन ली है कि हम अपनी और आने वाली नस्लों की मौत पर कुछ सोच ही नहीं पाते!

अब्दुल रशीद अगवा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related

नफरत की आग कब बुझेगी? अब ‘कारपोरेट जिहाद’

हाल में महाराष्ट्र का नासिक शहर दो बार अखबारों...

SC से खेड़ा को राहत, लेकिन बिस्वा क्यों झपटे सिंघवी पर?

नई दिल्ली। SC में कानूनी दलीलों की लड़ाई भले...

ग्रेट निकोबार: सामरिक और आर्थिक विकास की बड़ी योजना

ग्रेट निकोबार: सामरिक विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन की...

US-Iran War Update: Trump Hints at Fresh Attack as Tensions Rise

Iran war: Regional tensions remain intense as Iran, the...