केंद्रीय मत्स्य सचिव ने की पिथौरागढ़ कोल्डवॉटर फिशरीज क्लस्टर की समीक्षा, ट्राउट उत्पादन और निर्यात बढ़ाने पर जोर

पिथौरागढ़/धारचूला, 19 अक्टूबर । भारत सरकार के मत्स्यपालन विभाग, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी की अध्यक्षता में सोमवार को कलेक्ट्रेट पिथौरागढ़ में कोल्डवॉटर फिशरीज क्लस्टर की समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में ट्राउट मत्स्य पालकों के साथ ही उत्तराखंड शासन के मत्स्य विभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान निदेशालय, भीमताल, नाबार्ड, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड, समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण सहित विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भौतिक एवं वर्चुअल माध्यम से प्रतिभाग किया।

बैठक में केंद्रीय सचिव ने पर्वतीय राज्यों में शीतजल मत्स्य पालन की अपार संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियां रेनबो ट्राउट जैसी उच्च मूल्य वाली मछलियों के उत्पादन के लिए अनुकूल हैं। भारत सरकार द्वारा इस क्षेत्र की संभावनाओं का व्यवस्थित विकास करने के उद्देश्य से उत्तराखंड के पिथौरागढ़, हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग तथा लद्दाख के कारगिल में कोल्डवॉटर फिशरीज क्लस्टर अधिसूचित किए गए हैं।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत इन राज्यों में 5,600 से अधिक रेसवे, 54 हैचरी, 293 कोल्ड स्टोरेज तथा 260 फीड मिल स्वीकृत किए गए हैं।

उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में ट्राउट उत्पादन में लगभग छह गुना वृद्धि हुई है और वर्तमान में इसका वार्षिक उत्पादन करीब 5,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है।

बैठक में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत पर्वतीय राज्यों में शीतजल मत्स्य पालन के विकास के लिए किए जा रहे निवेश और परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई। बताया गया कि इन राज्यों में रेसवे, हैचरी, फीड सिस्टम, कोल्ड स्टोरेज तथा फसलोपरांत आधारभूत सुविधाओं के विकास के लिए 2,299 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया गया है। उत्तराखंड में पिछले छह वर्षों के दौरान इस क्षेत्र में 317 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। राज्य में 1,638 रेसवे, 10 हैचरी तथा प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना के साथ मत्स्य उत्पादों के विपणन के लिए भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के साथ बाजार संपर्क विकसित किए गए हैं।

केंद्रीय सचिव ने मत्स्य पालन क्षेत्र की मूल्य शृंखला में मौजूद कमियों की समीक्षा करते हुए मत्स्य बीज, फीड की उपलब्धता, उत्पादन क्षमता और शीत शृंखला संबंधी चुनौतियों पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए।

मत्स्य पालन के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों के समाधान के लिए मिनी हैचरी, फीड मिल, रेफ्रिजरेटेड वैन, कोल्ड स्टोरेज तथा रोग निगरानी प्रयोगशालाओं की स्थापना और तकनीकी सहायता को मजबूत करने पर जोर दिया गया। उन्होंने संबंधित विभागों एवं संस्थानों से उत्पादन क्षमता बढ़ाने, गुणवत्तायुक्त मत्स्य बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने और उत्पादों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए समन्वित प्रयास करने की अपेक्षा की।

बैठक में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-डीसीएफआर, भीमताल की भूमिका की भी सराहना की गई।

संस्थान द्वारा वैज्ञानिक तकनीक, मत्स्य बीज उत्पादन, प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन के माध्यम से मत्स्य पालकों को सहयोग प्रदान किया जा रहा है। मुनस्यारी क्षेत्र में रेनबो ट्राउट पालन को बढ़ावा देने तथा जून 2026 में नेपाल को 5 मीट्रिक टन ट्राउट के निर्यात में संस्थान के योगदान को महत्वपूर्ण बताया गया।

केंद्रीय सचिव ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, मत्स्यपालन एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि तथा राज्य सरकार की ट्राउट प्रोत्साहन योजना जैसी योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, वैज्ञानिक तकनीक के उपयोग और बाजार संपर्क मजबूत होने से शीतजल मत्स्य पालन को एक लाभकारी व्यावसायिक गतिविधि के रूप में विकसित किया जा सकता है।

बैठक के समापन पर सरकारी विभागों, शोध संस्थानों, सहकारी संस्थाओं, वित्तीय संस्थानों और मत्स्य पालकों के बीच समन्वय बढ़ाकर हिमालयी राज्यों में शीतजल मत्स्य पालन की संभावनाओं का अधिकतम उपयोग करने पर जोर दिया गया। कहा गया कि इस क्षेत्र का सुनियोजित विकास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, स्थानीय स्तर पर रोजगार एवं आजीविका के अवसर बढ़ाने तथा भारतीय ट्राउट को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बैठक में जिलाधिकारी आशीष भटगांई, निदेशक मत्स्य भारत सरकार सुभाष चन्द्र, निदेशक मत्स्य उत्तराखंड, सहायक निदेशक मत्स्य पिथौरागढ़ सहित अन्य संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे

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