इस्लाम में कोई भी त्यौहार यानी ईद ऐसी नहीं जिसमें इंसानियत को दिली या ज़ेहनी या जिस्मानी तकलीफ पहुँचती हो. लेकिन ईद म िलादुन्नबी के मौके पर आम रास्तों में घंटों के जुलूस निकाले जाते हैं जो आम लोगों की तकलीफ का माध्यम बनते हैं. और यह इस्लाम के खिलाफ है.
ईद कहते है ख़ुशी को और मिलादुन्नबी कहते नबी की पैदाइश या जन्म को. आज इस्लामिक कैलेंडर माह रबीउल अव्वल की 12 तारीख है. जिस दिन आख़िरुज़्ज़मां , सरवरे कायनात मोहम्मद इ अरबी हज़रात मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पैदा हुए या कहें दुनिया में तशरीफ़ लाये.
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम(सo अo वo ) की पैदाइश की तारिख के बारे में अलग अलग बयान हैं, कहीं 8 रबीउल अव्वल कहीं 9 और कहीं 12 मिलता है. और अगर इसको 12 रबीउल अव्वल ही मान भी लिया जाए तो इस दिन को ईद मनाने के लिए किसी भी फ़िक़ह या हदीस में ज़िक्र नहीं मिलता.
अगर यह ईद का दिन मनाने का हुक्म होता तो इसके सबसे ज़्यादा मुस्तहिक़ नबी (सo अo वo) के सहाबा थे कि वो आजके दिन को ईद के रूप में मनाते. लेकिन किसी भी सहाबी से इसका सुबूत नहीं मिलता कि उन्होंने नबी कि पैदाइश के दिन को ईद के रूप में मनाया हो.
ख़ास बात उनके पैदाइश के दिन की नहीं बल्कि उनकी ज़ात के दुनिया में रौनक अफ़रोज़ होने की है. नबी (सo अo वo) के चाहने वाले उनके जन्म दिन को तो बड़े धूम धाम से मनाते हैं मगर उनके उपदेशों, निर्देशों और पैग़ाम को ना तो अपनी ज़िंदगी में उतारते हैं और न ही उसके प्रचार प्रसार केलिए मेहनत करते हैं.
उसकी वजह यह है कि नबी (सo अo वo) के उपदेशो पर अमल करने में नफ़्स पर चोट पड़ती है अपने मन के खिलाफ अमल करना पड़ता है, इंसानियत से प्रेम,पड़ोसियों के हुक़ूक़, प्रकृति से मोहब्बत , त्याग, तपस्या, इन्साफ और ईसार करना होता है इसलिए नबी से झूठी मोहब्बत करने वाला इसको अपनी ज़िंदगी में नहीं उतारता. जबकि सच्ची मोहब्बत करने वाले ऐसा ही करते हैं जैसा कि आपका फरमान है.
जबकि ढोल ताशे सड़कों पर DJ बजाने में नफ़्स पर कोई ज़ोर नहीं पड़ता इसलिए बस इसी को दीं समझ लेता है और नबी से बग़ावत है.
ईद-ए-मिलादुन्नबी केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि मोहब्बत, रहमत, अमन और इंसानियत के उस पैग़ाम को याद करने का दिन है, जिसकी सबसे खूबसूरत मिसाल हज़रत मुहम्मद ﷺ की ज़िंदगी में मिलती है। उनकी पूरी ज़िंदगी इंसान को इंसान से जोड़ने, नफ़रत को मोहब्बत से बदलने और ज़ुल्म के सामने इंसाफ़ की आवाज़ बुलंद करने का संदेश देती है।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ ने इंसानों के बीच रंग, नस्ल, भाषा और हैसियत के आधार पर भेदभाव के बजाय इंसानियत और तक़वा को महत्व दिया। उन्होंने पड़ोसी के अधिकार, अनाथों और कमज़ोरों की मदद, महिलाओं के सम्मान, गरीबों के प्रति हमदर्दी और जरूरतमंदों की सहायता को समाज की ज़िम्मेदारी बताया। यही कारण है कि उनकी शिक्षाएँ आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक हैं।
आज जब समाज में नफ़रत, हिंसा, धार्मिक तनाव और आपसी अविश्वास की घटनाएँ दिखाई देती हैं, तब ईद-ए-मिलादुन्नबी हमें अपने व्यवहार पर विचार करने का अवसर देती है। अगर हम वास्तव में पैग़म्बर ﷺ की शिक्षाओं को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाना चाहते हैं, तो हमें अपने दिलों से नफ़रत निकालकर मोहब्बत, सहिष्णुता और भाईचारे को जगह देनी होगी।
इस अवसर पर मस्जिदों और घरों में होने वाली महफ़िलों के साथ-साथ समाज में गरीबों की मदद, भूखों को खाना खिलाना, बीमारों और जरूरतमंदों की सहायता करना भी इस पैग़ाम को मजबूत कर सकता है।
ईद-ए-मिलादुन्नबी का सबसे सुंदर संदेश यही है कि इंसान एक-दूसरे के लिए रहमत बने, परेशानी नहीं। आइए, इस मुबारक अवसर पर हम संकल्प (अहद ) लें कि अपने देश और समाज में अमन, इंसाफ़, भाईचारे और इंसानियत को मजबूत करेंगे। पूरी इंसानियत को दुनिया और आख़िरत में जहन्नुम की तकलीफों से बचाने केलिए सीधे रास्ते पर चलने और नेकी की राह अपनाने के लिए संगोष्ठियों का आयोजन करेंगे. यही मिलादे नबी का रास्ता और यही पैग़म्बर ﷺ की सीरत का असली संदेश भी है।