ने शैक्षणिक नैतिकता और अनुसंधान उत्कृष्टता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एक प्रभावी तंत्र विकसित करने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी है। इस के लिए विश्वविद्यालय ने एक समिति का गठन किया है, जो इस संबंध में संरचना, कार्यक्षेत्र और संचालन व्यवस्था का प्रस्ताव सुझाएगी। गुरूवार को यह जानकारी विश्वविद्यालय के जनसम्पर्क अधिकारी ने दी। उन्होंने बताया कि इस समिति को उन मामलो को देखने की ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई है, जिनमें शोध पत्रिकाओं द्वारा शोध-पत्र वापस (रिट्रैक्शन) ले लिये गए थे। विश्वविद्यालय के कुछ संकाय सदस्यों के लिखित अथवा सह-लेखित शोध-पत्रों को वापस लेने के मामलों का संज्ञान लेते हुए बीएचयू ने विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए संकाय सदस्यों से संपर्क स्थापित किया है। समिति ऐसे मामलों से संबंधित तथ्यों का पता लगाएगी और आवश्यकतानुसार उपयुक्त सुझाव भी देगी।
कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी के अनुसार हम ऐसा तंत्र विकसित करना चाहते हैं, जो न केवल अनुसंधान नैतिकता को प्रोत्साहित करे, बल्कि उसे सुदृढ़ आधार भी प्रदान करे। इसके साथ ही हमें एक ऐसे प्रभावी संस्थागत ढाँचे की आवश्यकता है, जो हमारे अनुसंधान कार्यों की गुणवत्ता की निगरानी करे और उन परिस्थितियों की पहचान कर सके, जिन्हें शैक्षणिक समुदाय स्वीकार्य नहीं मानता। हमारा उद्देश्य ऐसी संस्कृति विकसित करना है, जिसमें विभाग स्वयं अपने विद्यार्थियों और शिक्षकों द्वारा प्रकाशित शोध कार्यों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता के संरक्षक बनें।
इस समिति के अध्यक्ष जन्तु विज्ञान विभाग के विशिष्ट आचार्य प्रो. राजीव रमण होंगे। समिति के अन्य सदस्यों में वनस्पति विज्ञान विभाग की पूर्व आचार्य प्रो. मधूलिका अग्रवाल, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की पूर्व आचार्या प्रो. विभा त्रिपाठी तथा चिकित्सा विज्ञान संस्थान के डीन रिसर्च प्रो. मनोज पाण्डेय शामिल हैं। विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चयन प्रकोष्ठ के समन्वयक प्रो. भास्कर भट्टाचार्य समिति के सदस्य सचिव बनाए गए हैं।