
क्या मिडिल ईस्ट फिर बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है? क्या इजराइल अमेरिका मिलकर मिडिल ईस्ट को de establise करना चाहते हैं ?
क्या ईरान ट्रम्प को क़त्ल करना चाहता है ? क्या ईरान अपने सुप्रीम लीडर की शहादत का बदला लेना चाहता है ?
मिडिल ईस्ट एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा है।हवाई हमले, मिसाइलों की धमकी, strait Of होर्मुज़ पर बढ़ता दबाव और दुनिया भर के तेल बाज़ार की बेचैनी इस बात का संकेत हैं कि हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ़ चेतावनी दी है कि अगर ईरान की ओर से उनके खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई हुई तो अमेरिका का जवाब बेहद विनाशकारी होगा। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी मिसाइलें तैयार हैं और ज़रूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी। हालांकि अमेरिका और ख़ास तौर से ट्रम्प इस तरह की धमकियों के लिए दुनिया में बदनाम हैं.
उधर ईरान भी पीछे हटने के मूड में नहीं है, तेहरान का कहना है कि अमेरिका ने युद्धविराम की भावना का सम्मान नहीं किया और अगर अमेरिकी दबाव या हमले जारी रहे तो उसका जवाब भी उसी अंदाज़ से दिया जाएगा, या उससे भी ज़्यादा भयानक !
इस पूरे टकराव का सबसे संवेदनशील केंद्र बना हुआ है स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़—वह समुद्री रास्ता, जहाँ से दुनिया के ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अमेरिका चाहता है कि ईरान सार्वजनिक रूप से भरोसा दिलाये कि होर्मुज से गुजरने वाले जहाज़ सुरक्षित रहेंगे। लेकिन अब तक ऐसा स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज संकट अमेरिका और इजराइल ने पैदा किया है. ईरान पर लगातार अमेरिका – इजराइल संयुक्त हमलों के बाद ही होर्मुज संकट पैदा हुआ इससे पहले सब नार्मल चल रहा था.
इजराइल और अमेरिका की इस फ़िरोनी चाल को दुनिया समझ रही है लेकिन घटिया Diplomacy और कहीं इस्लाम दुश्मनी में सब खामोश हैं. रफ्ता रफ्ता ताक़तवर कमज़ोर को खाये जा रहा है, अगर सारे कमज़ोर इकठ्ठा हो जाएँ तो ताक़तवरों की औक़ात दिखा सकते हैं.
उधर ईरानी रहनुमा अली खामनोई के जनाज़े में दुनिया भर के लीडरों की शिरकत ने यह साबित कर दिया कि लोग आज भी ज़ालिम और मज़लूम के बीच के फ़र्क़ को अच्छी तरह समझते हैं. मगर इस सबके बीच कूटनीति , strategy और vested interest एक बड़ी रुकावट हैं|
यही वजह है कि दुनिया की निगाहें सिर्फ़ वॉशिंगटन और तेहरान पर नहीं, बल्कि तेल बाज़ार और तेल उत्पाद देशों के ख़ात्मे पर भी टिकी हैं। यदि होर्मुज़ में तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल के साथ मिडिल ईस्ट के देशों पर बड़ा संकट आ सकता है, जिसका असर भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा इसके बाद पूरी दुनिया पर संकट के घने बादल छा जाएंगे |
हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक और संवाद के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। बातचीत की संभावना अभी भी बनी हुई है, लेकिन हालिया सैन्य कार्रवाइयों के बाद यह स्पष्ट नहीं है कि वार्ता कब और किन शर्तों पर दोबारा शुरू होगी।
इसी बीच जुलाई 2026 में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने अलर्ट जारी करते हुए अमेरिका को इनपुट दिया है कि ईरान ने ट्रंप की हत्या के लिए एक नया प्लान तैयार किया है। यह रिपोर्ट सबसे पहले अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित हुई थी।
आईआरजीसी का डेथ स्क्वाड: रिपोर्टों के अनुसार, ईरान की ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) ने एक विशेष डेथ स्क्वाड का गठन किया है, जिसे ‘मुख्तार यूनिट’ कोडनेम दिया गया है। इसका मुख्य काम ट्रंप की हत्या की साजिश को अंजाम देना है।
ईरान की ‘किल लिस्ट’: ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर साझा किया कि उन्हें हाल ही में खुफिया सूत्रों से पता चला है कि वे ईरान की ‘हिट लिस्ट’ (किल लिस्ट) में नंबर एक पर हैं।
विवाद के मुख्य कारण कासिम सुलेमानी की मौत:
साल 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के टॉप जनरल कासिम सुलेमानी की मौत हुई थी, जिसके बाद से ही ईरान ट्रंप से बदला लेने की बात कहता रहा है।
अली खामेनेई की मौत का बदला:
फरवरी 2026 में एक साझा अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियान के दौरान ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी। ईरान के वर्तमान नेतृत्व और सेना ने उनकी मौत का बदला लेने के लिए ट्रंप को निशाना बनाने की कसम खाई है।
अब सवाल यही हैं, क्या अमेरिका और ईरान फिर से पूर्ण युद्ध की ओर बढ़ सकते हैं? या आख़िरी समय पर कूटनीति इस संकट को रोक लेगी? या फिर इसको तीसरी आलमी जंग का पेशख़ेमा या पूर्वाभास यानी Harbinger माना जा सकता है ?
फिलहाल पूरी दुनिया की नज़र इसी टकराव पर टिकी हुई है, क्योंकि इसकी गूंज केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि तेल, व्यापार, महंगाई और वैश्विक सुरक्षा के साथ विश्व शान्ति पर भी गहरा असर डाल सकती है। जिसके बाद इंसानी जानों का भारी नुकसान होगा, जो सहयोनि शैतानी शक्तियों के Agenda 21 , Depopulisation और New World Order के सपने को पूरा करने में सहायक होगा |
दुनिया ने देखा अमेरिका और ईरान के बीच जैसे ही तनाव कम हुआ, Strait of Hormuz से गुजरने वाले जहाजों की संख्या बढ़कर औसतन 40 प्रतिदिन तक पहुंच गई है। जबकि तनाव के दौरान कई हफ्तों तक मार्ग ठप्प रहने के कारण फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में सैकड़ों जहाज फंस गए थे, तनाव कम होते ही कई जहाजों को अब मार्ग पार करने की अनुमति मिल गई है ।
इस मार्ग के बाधित होने से भारत की तेल, गैस और उर्वरक आपूर्ति प्रभावित हुई थी, लोगोंमें भारी बेचैनी दिखने लगी थी लेकिन अब भारत आने वाले कई व्यापारिक जहाज सुरक्षित रूप से देश में प्रवेश कर चुके हैं।
ईरान पर लगातार दबाव से इजराइल अमेरिका का लाभ :
होर्मुज़ का मुद्दा जितना चर्चा में रहेगा, उतना ही ईरान पर कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बनाए रखना आसान होगा।
इससे अमेरिका अपने सहयोगी देशों को भी यह संदेश देता है कि ईरान अभी भी क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती है। जबकि अब दुनिया जान चुकी है सिर्फ क्षेत्र नहीं बल्कि दुनिया की शान्ति और विकास के लिए सबसे बड़ा खतरा खुद इजराइल और अमेरिका ही है.
ईरान के साथ कई देशों का मानना है कि अमेरिका सुरक्षा के नाम पर क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी और राजनीतिक प्रभाव बनाए रखना चाहता है। इसीलिए तेहरान कहता है कि जब तक उस पर सैन्य और आर्थिक दबाव रहेगा, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति संभव नहीं है।
दुनिया के हर आज़ाद मुल्क का प्रभुत्व, आज़ादी और sovereignty सुरक्षित होनी चाहिए, और देश के हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए तभी देश और विश्व शांति की उम्मीद की जा सकती है.