गुजरात के कई मुसलमानों को हाई कोर्ट से मिली राहत

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सूरत के नासिरनगर में घर टूटने के बाद बेघर परिवारों को हाईकोर्ट से राहत, पुनर्वास के दिए निर्देश

गुजरात के सूरत जिले के नासिरनगर क्षेत्र में मई के अंतिम सप्ताह में हुई बुलडोजर कार्रवाई के दौरान 100 से अधिक कच्चे मकानों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस कार्रवाई के बाद मामला गुजरात हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने 2 जुलाई को सुनवाई के दौरान सूरत नगर निगम (एसएमसी) की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराज़गी जताई।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जिन परिवारों के मकान तोड़े गए हैं और जो बेघर हो चुके हैं, उनके रहने की व्यवस्था करना नगर निगम की जिम्मेदारी है। अदालत ने निर्देश दिया कि प्रभावित लोगों को या तो उसी स्थान पर अथवा किसी उपयुक्त वैकल्पिक स्थान पर आवास उपलब्ध कराया जाए।

अदालत के इस आदेश से नासिरनगर के प्रभावित परिवारों में राहत और पुनर्वास की नई उम्मीद जगी है। 30 मई को जब मकान गिराए गए थे, उस समय भीषण गर्मी थी, जबकि अब लगातार हो रही बारिश ने बेघर परिवारों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

फिलहाल कुछ परिवार अपने टूटे हुए घरों के पास अस्थायी तंबू लगाकर रह रहे हैं, जबकि अधिकांश लोगों ने किराए के मकानों का सहारा लिया है या फिर नगर निगम द्वारा उपलब्ध कराए गए सामुदायिक हॉल में शरण ली है।

नासिरनगर निवासी मोहम्मद इरफान ने बताया कि वह पिछले 45 वर्षों से इस इलाके में रह रहे थे। उनके अनुसार, मकान टूटने के बाद परिवार बेघर हो गया, रोज़गार भी छिन गया और बच्चों की पढ़ाई बाधित हो गई। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश से कुछ उम्मीद ज़रूर जगी है, लेकिन स्थायी समाधान तभी होगा जब उन्हें उसी स्थान पर दोबारा घर मिल सके।

इसी इलाके के निवासी सहीम अहमद शेख़ ने भी अदालत के निर्देश का स्वागत किया, लेकिन कहा कि परिवार के नौ सदस्य अलग-अलग स्थानों पर रहने को मजबूर हैं। उन्होंने बताया कि विस्थापन के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है और रोज़गार भी ठप पड़ गया है, जिससे परिवार को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।

प्रभावित महिला शबनम बानू ने बताया कि मकान टूटने के बाद उनका परिवार करीब 27 दिनों तक खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर रहा। अदालत के आदेश के बाद उन्हें सामुदायिक हॉल में जगह तो मिली, लेकिन वहां भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।

उन्होंने कहा कि कई सामाजिक संस्थाएं समय-समय पर भोजन उपलब्ध कराती हैं, जबकि अन्य दिनों में परिवार को अपने सीमित संसाधनों से भोजन का इंतज़ाम करना पड़ता है। शबनम बानू ने बताया कि बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है और उनकी सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि सरकार जल्द से जल्द उन्हें उसी स्थान पर स्थायी आवास उपलब्ध कराए, जहां पहले उनका घर था।

नासिरनगर के निवासी मोहसिन पठान ने बताया कि फिलहाल प्रभावित परिवारों को एक सामुदायिक हॉल में ठहराया गया है, लेकिन वहां भोजन, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाओं का पर्याप्त इंतज़ाम नहीं है।

उन्होंने कहा कि बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है क्योंकि वे नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। उनके मुताबिक, हाईकोर्ट के निर्देश से राहत की उम्मीद तो जगी है, लेकिन यह अभी स्पष्ट नहीं है कि स्थायी आवास कब मिलेगा। उन्होंने कहा कि परिवार पहले से आर्थिक तंगी झेल रहा था और मकान टूटने के बाद हालात और अधिक कठिन हो गए हैं।

सुनवाई के दौरान 2 जुलाई को सूरत के तत्कालीन पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत की ओर से एडवोकेट जनरल कमल त्रिवेदी ने अदालत में हलफनामा प्रस्तुत किया। वहीं, गुजरात की प्रमुख निजी बिजली वितरण कंपनी टोरेंट पावर के एक अधिकारी की ओर से भी शपथपत्र दाखिल किया गया।

मामले में यह भी सामने आया कि कथित तौर पर नगर आयुक्त की पूर्व जानकारी या अनुमति के बिना ही मकानों पर बुलडोजर कार्रवाई कर दी गई थी, जिसके बाद विवाद गहरा गया। इस कार्रवाई के विरोध में प्रभावित परिवारों ने घटनास्थल पर धरना प्रदर्शन भी किया।

विवाद बढ़ने के बाद नगर निगम ने एक उप नगर आयुक्त की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की। समिति ने 30 जून को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके आधार पर सूरत नगर निगम ने पांच अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।

नगर आयुक्त के हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेते हुए जस्टिस निखिल करियल ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि प्रारंभिक दृष्टि से यह कार्रवाई अवैध प्रतीत होती है। अदालत ने कहा कि यदि लोगों को गैरकानूनी ढंग से बेघर किया गया है तो उनके पुनर्वास की जिम्मेदारी नगर निगम की है।

इसलिए प्रभावित परिवारों को या तो उसी स्थान पर आवास उपलब्ध कराया जाए या फिर किसी उपयुक्त वैकल्पिक स्थान पर बसाया जाए। हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगली सुनवाई से पहले नगर आयुक्त प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की विस्तृत योजना या प्रस्ताव अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।

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