इस साल 10 जून को मोदी निरंतर भारत पर शासन करने वाले प्रधानमंत्री बन गए। दावा किया जा रहा है कि उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया। इससे कुछ सप्ताह पहले ही मोदी ने अपने शासन के 12 साल भी पूरे किए थे। इन दोनों मौकों का इस्तेमाल बीजेपी का प्रचार तंत्र मोदी की छवि को और अपने तरीके से और निखारने के लिए कर रहा है। बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तरफ से तो पूरे-पूरे पन्ने के विज्ञापन अखबारों में छपवाकर मोदी की ‘बड़ी’ उपलब्धियों का बखान किया जा रहा है।
इन उपलब्धियों में देश के 81 करोड़ गरीबों को हर महीने राशन, 4 करोड़ पीएम आवास घर, उज्ज्वला एलपीजी कनेक्शन (10.5 करोड़) और 12 करोड़ शौचालय जैसे दावों को प्रमुखता से सामने रखा गया है। इनके अलावा जन धन खाते, मेट्रो नेटवर्क, युवाओं की स्किल ट्रेनिंग, आयुष्मान भारत, मुफ़्त इलाज, डिफेंस एक्सपोर्ट और किसानों और मध्य वर्ग के कल्याण की भी चर्चा की जा रही है।
लेकिन अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर, केदारनाथ धाम और उज्जैन में महाकाल धाम जैसी जगहों के विकास को खास तौर पर उभारा जा रहा है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने तो इस दिशा में सबसे आगे बढ़कर कई कदम उठाए हैं, जैसे हर ज़िले में संस्कृत स्कूल बनाना, दून यूनिवर्सिटी में हिंदू अध्ययन केंद्र शुरू करना, स्कूली पाठ्यक्रम में श्रीमद्भगवद्गीता को शामिल करना और हिंदू व सिख तीर्थस्थलों के लिए पर्यटन को बढ़ावा देना उपलब्धियों की फेहरिस्त में शामिल किया है।
लेकिन हकीकत इसके उलट है। इन 12 सालों के दौरान लोकतंत्र की उन बुनियादों को लगातार कमजोर किया गया है, जिन्हें हमारे आज़ादी के दीवानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर बनाया था, और नेहरू ने उन्हें सींचा था। सिर्फ संदर्भ के लिए बताना जरूरी होगा कि लोकतंत्र के ग्लोबल इंडेक्स में भारत तेज़ी से नीचे गिर रहा है और कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारत को ‘चुनी हुई तानाशाही’ (इलेक्टेड ऑटोक्रसी) कह रही हैं। प्रेस की आज़ादी और धार्मिक आज़ादी भी साथ-साथ कमज़ोर हो रही हैं। इन गिरते पैमानों की ओर बीजेपी के बड़े नेता — जिन्हें अब किनारे कर दिया गया है — लालकृष्ण आडवाणी ने भी ध्यान दिलाया था; उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार के दौर में अघोषित इमरजेंसी जैसे हालात हैं।
ईडी, इनकम टैक्स, सीबीआई जैसी स्वतंत्र संस्थाएं पूरी तरह से सत्ताधारी सरकार के हाथों की कठपुतली बन चुकी है। न्यायपालिका को भी सरकार के फैसलों के आगे झुकने पर मजबूर किया गया लगता है। न्यायपालिका में जजों ने फैसले लेते समय भारतीय संविधान के बजाय मनुस्मृति को अपनाया है।
इसकी हद तब देखने को मिली थी जब एक चीफ जस्टिस ने कहा था कि उन्होंने बाबरी मस्जिद का फैसला तब लिखा जब भगवान उनके सपने में आए और उन्हें एक खास निर्देश दिया।
लोकतंत्र में प्रधानमंत्री कैबिनेट में ‘बराबर वालों में सबसे आगे’ (फर्स्ट अमंग द इकुअल्स) होता है। लेकिन मौजूदा दौर में ज़्यादातर फैसले प्रधानमंत्री की तरफ से आ रहे हैं। उन्होंने खुद को ‘नॉन-बायोलॉजिकल’ बताकर खुद को दैवीय स्तर तक पहुँचा दिया है।
हालांकि उनके कार्यकाल में 2020 की दिल्ली हिंसा को छोड़कर कोई बड़े दंगे नहीं हुए, लेकिन उन्होंने मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलने और उनके नागरिक अधिकारों को कमज़ोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हर तरफ़ हिंदुत्व की राजनीति का बोलबाला है। बड़े पैमाने पर होने वाले नरसंहार के बजाय, अब धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले आम बात हो गई है।
कोरोना लॉकडाउन, नोटबंदी और जीएसटी लागू करने जैसे मामलों में उनके ज़्यादातर बड़े फ़ैसलों ने आम लोगों की कमर तोड़ दी है। नोटबंदी, जिसे आतंकवाद और काले धन जैसी समस्याओं को खत्म करने का रामबाण इलाज बताया गया था, उसने हमारे उद्योग के छोटे और मध्यम सेक्टर को बर्बाद कर दिया और लाखों मज़दूरों को बेरोज़गार बना दिया, जबकि 99.3% नकदी वापस सर्कुलेशन में आ चुकी है। बिना वक्त और चेतावनी दिए अचानक लगाए गए कोरोना लॉकडाउन ने समाज के ग़रीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए अनगिनत मुश्किलें खड़ी कर दीं।
