उर्दू का अन्य भारतीय भाषाओं से साहित्यिक आदान-प्रदान के साथ गहरा भावात्मक संबंध है – प्रो. शंभुनाथ तिवारी
9 फरवरी, 2026: “भारत की राष्ट्रीय अस्मिता और गौरव की दृष्टि से राम-कृष्ण गंगा और हिमालय हमारी वैश्विक पहचान सुनिश्चित करते हैं। हमारी अस्मिता के ये सारे प्रतीक भारत की सभी भाषाओं के साहित्य में व्यापक रूप में अभिव्यक्त होते हुए दिखाई देते हैं।
चाहे ग़ालिब का ‘चिराग़े -दहर’ हो या इक़बाल की नज़्मों में ‘राम’ और ‘हिमालय’ का खूबसूरत ज़िक्र हो, चाहे नज़ीर अकबराबादी के ‘किसन कन्हैया’ हों, या नज़ीर बनारसी की ‘गंगा’ और ‘उनके राम-कृष्ण’ हों, सभी इन राष्ट्रीय गौरवशाली प्रतीकों से अपनी शायरी को हिंदुस्तान की पहचान के रूप में पेश करते हैं।” ये विचार
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफ़ेसर शंभुनाथ तिवारी ने राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित तीन दिवसीय ‘विश्व उर्दू सम्मेलन’ के एक तकनीकी सत्र में व्यक्त किए।
संस्कृत-हिंदी-उर्दू जैसी भाषाओं के बीच भावों के आपसी आदान प्रदान पर व्यापक रूप से बातचीत करते हुए प्रो. शंभुनाथ तिवारी ने कहा- “ सांस्कृतिक समन्वय और भावों के आपसी आदान-प्रदान के नज़रिए से विभिन्न भाषाओं के साहित्य की अहम भूमिका होती है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यहाँ की बहुभाषायी परंपरा और बहुभाषिक सहअस्तित्व की भावना सामाजिक और सांस्कृतिक समन्वय को आधार देकर उसे मजबूत बनाती है। उर्दू का अन्य भारतीय भाषाओं से साहित्यिक आदान-प्रदान के साथ गहरा भावात्मक संबंध है।
कुछ प्रमुख भारतीय भाषाओं के क्रम में विचार करें, तो भारत की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत और आधुनिक दृष्टि से हिंदी और उर्दू भारतीय उपमहाद्वीप की ऐसी तीन प्रमुख भाषाएँ हैं भाषायी और साहित्यिक संबंध तथा परस्पर आदान-प्रदान की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
इन भाषाओं ने अपने-अपने साहित्य और अभिव्यक्ति के माध्यम से परस्पर संवाद, शब्दों, कथ्य और भावों के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक मूल्यों की साझेदारी द्वारा समन्वयात्मक परिवेश का निर्माण है। संस्कृत, हिन्दी और उर्दू का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पारस्परिक सम्बन्ध यहाँ के सामाजिक तानेबाने को विविधरंगी आकार देने में सहायक है।
उन्होंने कहा- “ अलग-अलग धर्मों , जातियों, समुदायों और समूहों से बना हुआ हिंदुस्तान उस रंगीन चादर की तरह हैं, जिनका ताना-बाना यदि हिंदू-मुसलमान हैं, तो सिख-ईसाई-यहूदी-द्रविड़-आदिवासी आदि अन्य विविध जातियाँ और समुदाय उस चादर के अनेक रंग और बेलबूटे हैं। ऐसी सुंदर चादर का यदि एक भी धागा टूटता है या बदरंग होता है, तो पूरी चादर पर दाग़ या धब्बा लगता है। उस चादर की हिफ़ाज़त करना हिंदुस्तानियित की हिफ़ाज़त करना है।”
हिंदी-उर्दू के हवाले से प्रो. तिवारी ने कहा- “हिंदी-उर्दू दोनों एक ही परिवार की भाषाएँ है, जिनका विकास भारतीय परिवेश-संस्कृति एवं समान जीवनदर्शन के साथ हुआ है।
संस्कृत साहित्य की पूरी क्लासिक परंपरा भारतीय संस्कृति और संस्कारों का संगम है। उस परंपरा में रचना करनेवाले बाल्मीकि, भाष, भवभूति, कालिदास आदि महान संस्कृत कवियों की रचनाएँ भारतीय संवेदना की संवाहक हैं, जिनमें भारतीय समाज और संस्कृति का आधार लोकजीवन-ग्रामीण जनजीवन की आकांक्षाओं को गहराई के साथ स्पंदित होता हुआ देखा जा सकता है।
संस्कृत साहित्यिक एवं सांस्कृतिक धारा का हिन्दी–उर्दू में प्रसार विविध रूपों में देखा जा सकता है। शब्द, व्याकरण और अभिव्यक्ति के स्तर पर संस्कृत–हिन्दी–उर्दू का परस्पर आदान-प्रदान एवं आपसी प्रभाव, साझा रूपक, बिंब और सांस्कृतिक प्रतीकों का साहित्यिक विनिमय व्यापक रूप से द्रष्टव्य है। साहित्य की आद्यभाषा के रूप में संस्कृत ने हिन्दी- उर्दू दोनों को जीवनदायिनी ऊर्जा प्रदान की।
हिन्दी ने लोकधारा और भक्ति आंदोलन के माध्यम से भारतीय समाज को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया। उर्दू ने अपने पूर्ववर्ती संस्कृत-हिंदी साहित्य से भाव एवं कथ्य ग्रहण किए। भारतीयता और भारतीय संस्कृति की समन्वित भावभूमि के साथ उर्दू भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक बनी, जिसने फ़ारसी–अरबी–तुर्की प्रभावों को भारतीय लोक और भावभूमि के साथ जोड़कर एक नई साहित्यिक परंपरा रची।
उर्दू के हवाले से भाषाएँ अनेक-भाव एक, पर बात करते हुए उन्होंने ने कहा, ‘भाषा चाहे कोई हो, पर सांस्कृतिक दृष्टि से भाव सभी भाषाओं में एक ही होता है। भाषाओं के आपसी आदान-प्रदान से भावाभिव्यक्ति का यह सौंदर्य सांस्कृतिक सहअस्तित्व और समन्वयात्मकता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
इस नज़रिए से विचार करें, तो संस्कृत- हिंदी-उर्दू तीनों भाषाओं का संबंध केवल भाषिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि साहित्यिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक स्तर पर भी गहरा है। हिन्दी और उर्दू में संस्कृत के शब्द, मिथक और प्रतीक व्यापक रूप से दिखाई देते हैं, वहीं उर्दू और हिन्दी का साझा साहित्य—ग़ज़ल, गीत, नाटक, उपन्यास—भारतीय संस्कृति की बहुरंगी तस्वीर प्रस्तुत करता है।
भारतीय बहुलतावाद और भाषाई-सांस्कृतिक सहअस्तित्व हमारी सांस्कृतिक एकता की पहचान हैं। सामाजिक, साम्प्रदायिक सौहार्द में भाषाओं के योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस आदान–प्रदान ने भारतीय समाज में बहुलता, सहअस्तित्व और सांप्रदायिक सौहार्द की भावना को सुदृढ़ किया है।
हिंदी-उर्दू के पारस्परिक संबंधों और भावों की समानता की दृष्टि से उत्तर मुग़ल काल ( रीतिकाल) की अवधि में रचा गया हिंदी-उर्दू का साहित्य बहुत उल्लेखनीय है। दोनों में एक सी समान काव्यप्रवृतियाँ दोनों साहित्य के विशाल पाठक वर्ग को जोड़ने में समर्थ हैं।
राष्ट्रीय उर्दू भाषा परिषद् के निदेशक डॉ. शम्स इकबाल के नेतृत्व में आयोजित इस विश्व उर्दू सम्मेलन में भारत के कमोबेश सभी प्रांतों के उर्दू विद्वानों सहित मिस्र, कतर, फ्रांस, मारिशस आदि देशों के विद्वानों ने भाग लिया।
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