सामाजिक न्याय हासिल करने की लम्बी यात्रा

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Prof. RAMPUNIANI
-राम पुनियानी

रोहित वेम्यूला और अबेदा सलीम तड़वी की आत्महत्या के मुद्दे को लेकर दायर जनहित याचिकाओं और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में आत्महत्या करने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने एक 16-पृष्ठीय दस्तावेज जारी किया जिसमें वे दिशानिर्देश थे जिन्हें उच्च शैक्षणिक संस्थानों में लागू किया जाना था.

इन दिशानिर्देशों का उद्धेश्य था छात्रों को अपमान या ऐसे नकारात्मक विचारों से बचाना जिनके चलते वे अपनी जान ले लेते हैं.

पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस तरह की त्रासद और भयावह घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है. राज्यसभा को प्रस्तुत की गई रपट ‘‘सिग्नीफिकेंट स्टूडेंट सुइसिडस (2018-2023)” में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में आईआईटी, आईआईएम और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों सहित उच्च शिक्षण संस्थाओं में 98 छात्रों ने आत्महत्या की.

हाशिए पर पड़े समुदायों में स्थिति अधिक चिंताजनक हैः केन्द्रीय संस्थानों में 2014 से 2021 के बीच आत्महत्या करने वाले कुल 122 छात्रों में से अधिकांश अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों के थे. विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों की संख्या में 2019 से 2024 की पांच वर्ष की अवधि के दौरान 118.4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई.

इसके मद्देनजर यूजीसी की अनुशंसाएं एक ताजी हवा के झोंके की तरह हैं. लेकिन उत्तर भारत के कई स्थानों पर इनका विरोध किया गया, अधिकांशतः उच्च जातियों द्वारा जो संभवतः भाजपा की राजनीति के समर्थक थे. वे मामले को सुप्रीम कोर्ट में भी ले गए, जिसने आनन-फानन में यूजीसी के दिशानिर्देशों को लागू करने पर रोक लगा दी.

सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि इस तरह के कदमों से समाज बंटेगा. सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हें अस्पष्ट बताते हुए कहा कि इनका बहुत आसानी से दुरूपयोग किया जा सकता है. हम जानते हैं कि कानूनों के दुरूपयोग की संभावना हमेशा रहती है और जरूरी प्रावधान करके इसे रोका जा सकता है.

तथ्य यह है कि इस तरह की घटनाओं की संख्या में 2019 से 2024 के बीच 118 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. प्रोफेसर सतीश पांडे का तर्क है कि अतीत में जाति प्रथा के माध्यम से प्राप्त होने वाले विशेषाधिकारों का लाभ उठाते हुए पहले तो उच्च जातियों ने समाज में ऊंचा दर्जा हासिल कर लिया और फिर वे जाति-विहीन समाज की बातें करने लगीं.  

प्रोफेसर अजंथ सुब्रमण्यम बताते हैं कि किस तरह जाति-विहीनता को ‘योग्यता को सबसे अधिक तरजीह देने’ से जोड़ा गया और इसका उपयोग ऊंची जातियों  ने तमिलनाडु में जम कर किया क्योंकि वहां का सबाल्टर्न वर्ग अन्याय के खिलाफ उठ खड़ा हुआ. मगर आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्गों को आरक्षण दिए जाने से ऊंची जातियों अब योग्यता की दुहाई देने की स्थिति में भी नहीं हैं.  

भाजपा को केन्द्र में सत्तारूढ़ हुए लगभग 12 साल हो चुके हैं. ऊंची जातियां यह जानती हैं और यह अपेक्षा करती हैं कि यह सरकार ‘उनकी पक्षधर‘ है और वह समाज के वंचित वर्गों के हित में उठाए जाने वाले हर सकारात्मक कदम को निष्प्रभावी करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगी.

इसकी एक मिसाल है उच्च शिक्षण संस्थाएं जहां अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ओबीसी के लिए आरक्षित पद रिक्त हैं जबकि आवश्यकत योग्यता रखने वाले इन समुदायों के शिक्षक पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं.

इसके अलावा हमारा अनुभव यह रहा है कि यह सरकार सामान्यतः उच्च जातियों को संरक्षण देती है और इसके राज में वंचित वर्गों पर होने वाले अत्याचारो की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हो रही है. पिछले कुछ दशकों में इन वर्गों की स्थिति बहुत खराब हुई है. कई आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक सूचकांको से इसकी पुष्टि होती है.

‘‘नेशनल कोएलेशन फॉर स्ट्रेंनथनिंग एससीज एंड एसटीज‘‘ के प्रतिवेदन में दिए गए आंकड़ों से ज्ञात होत है कि अनुसूचित जातियों पर होने वाले अत्याचारों में 2021 में 1.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई. 2021 में ऐसी सबसे अधिक घटनाएं उत्तरप्रदेश में हुईं जो कुल घटनाओं का 25.82 प्रतिशत थीं. इसके बाद राजस्थान और मध्यप्रदेश 14.7 और 14.1 प्रतिशत के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर  रहे.

प्रतिवेदन भारत के सामाजिक-राजनैतिक क्षेत्र में व्याप्त सड़ांध की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है. इसमें हिन्दुत्व शक्तियों की विचारधारा और उनके द्वारा समाज के चिन्हित वर्गों के विरूद्ध की जा रही हिंसा के कारण उसमें हुई बढ़ोत्तरी पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है.दलित ऐसा ही एक वर्ग है जिसे निशाना बनाया जा रहा है.

अनुसूचित जाति/जनजाति/ओबीसी वर्ग की लड़ाई लंबे समय से जारी है. पहला कदम था यह सुनिश्चित करना कि उनके साथ समानतापूर्ण व्यवहार हो और वे उच्च जातियों के प्रतिरोध के बावजूद शिक्षा हासिल कर सकें. जोतिराव फुले का जीवन एवं संघर्ष इसका उदाहरण है कि मनुष्य होने के नाते वे जिन मूलभूत अधिकारों के हकदार थे, उन्हें हासिल करने में भी उच्च जातियों ने कितनी बाधाएं खड़ी कीं.

बाबासाहेब अम्बेडकर ने यह संघर्ष जारी रखा और इसमें मंदिरों में प्रवेश, सार्वजनिक जल स्त्रोतों तक पहुंच और अस्पृश्यता के विरोध जैसे मुद्दों को जोड़ा. राष्ट्रपिता ने अपने जीवन के कई वर्ष अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ते हुए बिताए. एक दिलचस्प तथ्य यह है कि उनकी जान लेने का पहला प्रयास तब किया गया था जब उनका मुख्य संघर्ष अस्पृश्यता के उन्मूलन के खिलाफ चल रहा था और वे दलित उत्थान में जुटे हुए थे.

भारतीय संविधान में अस्पृश्यता के विरूद्ध प्रावधान किए गए. उसमें अनुसूचित जाति/जनजाति वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की कई, हालांकि ओबीसी वर्ग के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया. इस पर अमल आधे-अधूरे मन से किया गया और इन वर्गों के बहुत से लोग आवश्यक योग्यता के बावजूद नौकरियां हासिल करने से वंचित रहे.

आरक्षण लागू होने के बाद सन् 1980 आते-आते उच्च जातियों के एक वर्ग ने आरक्षण का विरोध करना शुरू कर दिया. प्रोपेगेंडा यह चलाया गया कि आरक्षित वर्गों के कम काबिल उम्मीदवारों की वजह से उच्च जातियों के अधिक योग्य उम्मीदवारों को नौकरियां हासिल नहीं हो पा  रही हैं.

आरक्षित वर्ग के लोगों को ‘सरकार का दामाद‘ कहा जाने लगा. ये भ्रांतियां समाज की व्यापक समझ का हिस्सा बन गईं. इन वर्गों के प्रति नफरत के चलते 1980 के दशक में उनके विरूद्ध हिंसा हुई – पहले सन् 1980 में फिर 1985 में. अहमदाबाद और गुजरात के कुछ अन्य भागों में ऐसी घटनाएं अधिक संख्या में हुई और यह हिंसा मुख्यतः आरक्षण के मुद्दे पर ही हुई.

आरक्षण के विरोध के लिए ‘यूथ फॉर इक्यालिटी‘ जैसे समूह गठित हुए जिन्होंने समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के खिलाफ कुलीन वर्गों के तर्कों को प्रचारित करने का काम किया. शिक्षण संस्थानों के परिसरों में भी इन वर्गों के खिलाफ नफरत का  माहौल कायम हो गया जो अब बढ़ती आत्मघात की घटनाओं के रूप में साफ नजर आ रहा है.

यह तर्क बेमानी है कि इन दिशानिर्देशों में उच्च जातियों के संरक्षण के लिए कोई प्रावधान नहीं है क्योंकि आत्महत्या की ज्यादातर घटनाओं का संबंध अनुसूचित जाति / जनजाति / ओबीसी वर्गों के छात्रों से है.

सन् 1990 में वी.पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला उच्च जातियों के लिए एक जबरदस्त झटका था और इसका जबरदस्त विरोध हुआ. भाजपा ने अत्यंत कुटिलतापूर्वक इसका विरोध नहीं किया. उसने जनता का ध्यान इस मुद्दे से हटाने के लिए राम मंदिर निर्माण हेतु रथयात्रा शुरू की. इससे देश दहल गया, रथ यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले बहुत से स्थानों पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई.

यह दिलचस्प है कि जब भी अनुसूचित जाति/जनजाति/ओबीसी के उत्थान के लिए कोई कदम उठाया जाता है, तब भाजपा उसके खिलाफ खुलकर सामने नहीं आती किंतु दबे-छिपे ढंग से उसे निष्प्रभावी बनाने में जुट जाती है.

यूजीसी द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति/ओबीसी वर्गों के छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए जारी दिशानिर्देशों से भाजपा, और उसके साथ आरएसएस का असली चेहरा सामने आ गया है.

उनका संविधान विरोधी रवैया एक बार फिर साफ नजर आ रहा है. (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

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