ज़ुल्मत(Darkness) को घटा कहने से बारिश नहीं होती
शोलों को हवाओं से तो ढांपा नहीं जाता
फ़रमान से पेड़ों पे कभी फल नहीं लगते
तलवार से मौसम कोई बदला नहीं जाता
मुज़फ्फर वारसी
क़िस्सा नेपाल के राजशाही दौर के फ़ना या बक़ा का नहीं बल्कि लोकतंत्र की बहाली के नाम पर सरकार के दमनकारी रवैये और Nepotism का है. नेपाल में आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी और मंहगाई के साथ सत्तावर्ग की नज़रअंदाज़ी वहां की नौजवान नस्ल यानी Gen Zee के आक्रोश की बुनियादी वजह बनकर उभरी .
हालांकि Social मीडिया जो किसी हद तक युवाओं के रोज़गार का ज़रिया बना हुआ है उसपर लगे Ban को भी नेपाल के हालात के लिए एक बड़ी वजह माना जा रहा है गया .
मेहनतकश नेपाली युवाओं ने नए नबेली डेमोक्रेसी में यह भांपने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगाया कि एक ही देश के नागरिकों में इतना बड़ा आर्थिक और सामाजिक फ़र्क़ लोकतान्त्रिक system के विरुद्ध है. और उसने यह भी समझ लिया की लोकतंत्र में राजनेता सेवक होता है नाकि मालिक.
मगर सभी लोकतांत्रिक देशों के सेवकों और प्रधान सेवकों की Body Language और भावभंगिमा बिलकुल डिक्टेटर वाली है, और बेलगाम घोड़े की मानिंद सियासी मैदान को रोंदने का काम कर रही है . रहन सहन , खान पान पढ़ाई लिखाई , शादी ब्याह यानी पूरी जीवनशैली का अंतर बिलकुल आक़ा और ग़ुलाम जैसा ही दिखता है .लिहाज़ा Gen -Zee की अंतरात्मा जागी और असली लोकतान्त्रिक प्रणाली को देश में परिभाषित करने का Plan बनाया.
नेपाली युवाओं का पूरा आंदोलन Nepotism यानी भाई भतीजावाद, Corruption, बेरोज़गारी और मंहगाई के खिलाफ था. हालाँकि कई विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन हिन्दू राष्ट्र को वापस लाने की कोशिश का भी एक हिस्सा हो सकता है.नेपाल के हिन्दू राष्ट्र का इतिहास बहुत पुराना नहीं है.
आपको बता दें सबसे पहले 1962 में राजा महेंद्र ने नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया था …नेपाल में राजा को विष्णु का अवतार माना जाता है, और विष्णु का अवतार कोई ब्राह्मण ही हो सकता है . जबकि नेपाल की 70 % Non Brahmin जनता ने एक ख़ास वर्ग की इस चाल को भांप लिया है और उसके खिलाफ उठी क्रान्ति का इस आंदोलन को हिस्सा बना डाला .
ऐसे में यह नेपाल की नई नस्ल का इंक़लाबी movement हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए तो नहीं था बल्कि नेपाल में 300 साल पुरानी दमनकारी व्यवस्था के विरुद्ध वहां की मूल जातियों के जागे ज़मीर की आवाज़ था, जी वही जातियां जिनको आप अपने देश भारत में SC ST और OBC के नाम से जानते हैं.
और जिसके अधिकारों की आवाज़ भारत में भी लगातार उठती रही है. सवाल यह भी खड़ा हुआ कि अगर ये आंदोलनकारी हिन्दू राष्ट्र समर्थक थे तो फिर पशुपति नाथ मंदिर पर हुडदंग मचाने और हमले के लिए क्यों पहुंचे थे?
यहाँ हमको याद रखना होगा कि भारत,,, साउथ एशिया में मुखिया की हैसियत से अपना मक़ाम रखता है पाकिस्तान को छोड़कर लगभग सभी पड़ौसी देशों में भारत बड़ा stakeholder है और नेपाल में तो हमारा बहुत कुछ लगा है.
ऐसे में भारत साउथ एशिया के अपने पडोसी देशों में शान्ति और अमन क़ायम करने में क्यों नाकाम है?? हमारी ख़ुफ़िया Agencies पडोसी देशों में पनपने वाले विद्रोह के लावे के धुएं की दुर्गन्ध को आखिर क्यों नहीं सूंघ पाती.
और हमारे प्रधानमंत्री पड़ोस में अमन की कोशिश को छोड़कर सात समुन्द्र पार के अमन स्थापित करने में दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं ?? अब इसका जवाब विश्लेषक कुछ इस तरह दे रहे हैं ……यहाँ सत्यहिंदी आशुतोष की वीडियो चलेगी …….
अब नेपाल में आइंदा जो भी System Of Governance होगा उसके लिए कई तरह की चुनौतियाँ रहेंगी.
वैसे भी नेपाल चार वर्ण मॉडल पर आधारित है, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र प्रमुख वर्ण हैं.
इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की उपजातियाँ और जातीय समूह हैं, जो देश के बहु-जातीय समाज को दर्शाते हैं. ऐतिहासिक रूप से, इस व्यवस्था ने लोगों के सामाजिक और आर्थिक अवसरों को प्रभावित किया है और इसके तहत भेदभाव का भी सामना करना पड़ा है, खासकर दलितों को.
इस आंदोलन को दलित समर्थक भी बताया जा रहा है इसके लिए प्रमाण तलाशने की कोशिश की तो पता चला कि …..यहाँ दलित नेपाली कि वीडियो चलेगी
नेपाल की यह क्रांति अगले 30 वर्षों तक शासक वर्ग पर लगाम कसके रखेगी. क्योंकि जो सबक़ नेपाली युवाओं ने वर्तमान खोखले लोकतांतिक सिस्टम को पढ़ाया है सत्तावर्ग उसको आसानी से भूल नहीं पायेगा ….सदियों में ऐसा देखने को मिलता है . बांग्लादेश और श्रीलंका की राजनितिक धरती के भूकंप के मुक़ाबले नेपाल का सियासी भूकंप काफी तीव्र था जिसके झटके भारत में भी महसूस किये गए.
आज नेपाल की फ़िज़ा में धुएँ के साथ कुछ उम्मीदों की राख भी उड़ रही है… नेपाल, एक शांतिप्रिय हिमाली राष्ट्र, एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ राजनेताओं की पसंद के लोकतंत्र से ज़्यादा, जनता की मर्ज़ी का लोकतंत्र दिखाई दे रहा है। अगर नेपाल में अब राजशाही भी आती है तो राजा साहिब भी सिंहासन पर कपकपाते हुए ही बैठेंगे .
अब बात भारत की , भारत और नेपाल कभी दो अलग अलग देशों की तरह नहीं रहे, बॉर्डर फ्री देश नेपाल को भारत ने हमेशा अपने बच्चे की तरह देखा.
नेपाली अवाम भारत में ऐसे ही नौकरी के लिए आती है जैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार के लोग दिल्ली में बेधड़क अपनी मर्ज़ी के काम करते हैं. दिल्ली में नेपाली अक्सर चौकीदारी की नौकरी करते हैं इसकी २ वजूहात हैं एक तो यह क़ौम कर्मठ और मेहनती है दुसरे पढ़ी लिखी कम होती है.
३ सितम्बर को ओली सरकार ने एक झटके में 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया था , जिसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप, यूट्यूब, और अन्य प्रमुख ऐप्स शामिल थे। सरकार ने इसे गलत सूचना और अस्थिरता से बचने का उपाय बताया था।
लेकिन ओली सर्कार यह भूल गई की नेपाल का पढ़ा लिखा बेरोज़गार social media पर व्यस्त रहकर अपने परिवार का पालन पोषण भी कर रहा था . जैसे ही इस युवा बर्ग के हाथ से कमाई यह साधन भी छूटा वो सड़क पर आगया. क्योंकि उसको सरकार ने कोई विकल्प ही नहीं दिया था.
अब भारतीय youtubers या दुसरे Online Bussiness करने वाले युवा नेपाल के Social Media Ban से जोड़कर न देखें क्योंकि भारत सरकार उनपर कोई पाबंदी लगाने नहीं जा रही है. और फिर पढ़े लिखे भारतीय युवाओं के पास पकोड़े तलने का विकल्प भी मौजूद है. वैसे भारत सरकार नेपाल जैसी गलतियां करेगी , और न ही करनी चाहिए क्योंकि इज़्ज़त सबको प्यारी होती है. अभी ये लेख लिख ही रहे हैं की 17 सितम्बर PM नरेंद्र मोदी के जन्म दिवस पर जिसको बेरिज़गारी दिवस के नाम से भी जाना जाता है, इसी दिन हिन्दोस्तान के कई नामचीन पत्रकारों को उनके Youtube Channel से वो तमाम videos हटाने का नोटिस भेजा गया है जिनमें किसी भी तरह से अडानी या उनके ग्रुप को Target किया गया है. इसके बाद यह चर्चा भी शुरू हो गई क्या अब नेपाल के बाद भारत में भी सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स को बैन किया जा सकता है ? क्या उसके बाद यहाँ के लोगों में इस बैन के खिलाफ कोई विद्रोह फूट सकता है ??
नेपाली युवाओं का यह आंदोलन सिर्फ सोशल मीडिया Ban की चिंगारी नहीं थी बल्कि Corruption, भारी आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी, सत्तावर्ग की मनमानी , पूंजीवादी व्यवस्था से उपजी पीड़ा और एक ख़ास जाती के 39 प्रधानमंत्रियों और राजाओं का नेपाल के 70 % मूलवासियों पर हुकूमत करने को लेकर एक विस्फोट था।
युवाओं ने इसे ‘नेपो किड’ आंदोलन के नाम से उठाया।” जिसके बारे में शायद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और उनकी कैबिनेट ने सोच भी न होगा।
पूर्व प्रधनमंत्री की पत्नी सहित 34 शहरियों की मौत और 1000 से ज़्यादा जख्मियों की क़ीमत चुकाने के बाद अब जले भुने और टूटे फूटे नेपाल की नई अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की को नियुक्त किया गया है.
बताया जाता है Gen _ Z की वो पहली पसंद थी . सेना प्रमुख और राष्ट्रपति ने सुशीला कार्की के नाम पर सहमति जताई है, नेपाल के आम चुनाव तक वही PM पद संभालेंगी.
आपको बता दें नेपाल में हर ऐसे नेता और संस्था को निशाना बनाया गया जो वर्तमान सरकार के पक्ष में रहा .नेपाल सर्कार के समर्थक और चाटुकार मीडिया कार्यकर्ताओं जैसा बुरा हाल किया अगर चाहें तो दुनिया के गोदी मीडिया कर्मचारी और Anchors Anchorayen भी इससे सबक़ ले सकते हैं.
दो रोज़ पहले दिल्ली में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक बुलाई गई, जिसमें नेपाल के घटनाक्रम पर चर्चा हुई . प्रधनमंत्री मोदी ने नेपाल के हालात पर चिंता जताते हुए कहा था , मुझे दुःख है की नेपाल के नौजवानों ने इस घटना में जान गवाई है. उन्होंने कहा नेपाल की स्थिरता , शन्ति और समृद्धि हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मगर नेपाल , श्रीलंका और बांग्लादेश में फूटे सियासी लावे की साहिब को भनक तक न लगी. और वैसे भी ये सब ज़मीन पर रहकर करने वाले काम थे अब हवाओं में उड़ने वाले प्रधानमंत्री ज़मीन पर कैसे काम कर सकते हैं यह उनकी भी मजबूरी है .
लेकिन देश की जनता तो एहि कह रही है कि
तुम आसमान की बुलंदी से जल्द लौट आना
हमें ज़मीन के मसाइल पे बात करनी है
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