अब यदि कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करना है तो, राहुल गांधी के बब्बर शेरों को पिंजरे से निकलकर दहाड़ना होगा | महाराष्ट्र हरियाणा और दिल्ली के चुनाव में मिली हार के बाद कांग्रेस को अब गंभीरता से सबसे पहले दो काम करने होंगे |
पहला काम अपने घरों में बैठे कुंठित और निराश कार्यकर्ताओं को बाहर निकालना होगा | दूसरा काम मतदाता सूचियो पर गंभीरता से ध्यान देना होगा |
कांग्रेस ने नेता तो बहुत बनाए मगर कार्यकर्ता और मतदाता बनाने में कांग्रेस पीछे रह गई इसकी वजह कांग्रेस ने जो नेता बनाए वह नेता बनकर ठसक में रह गए |
नेता बनने के बाद ठसक भी अपने विपक्षियों को दिखाने की जगह अपने ही कार्यकर्ताओं को दिखाना शुरू किया | इस कारण कांग्रेस का वफादार और ईमानदार कार्यकर्ता उदास निराश और कुंठित होकर अपने घरों में जाकर बैठ गया |
इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी ने उठाया और भारतीय जनता पार्टी अपने मतदाताओं की संख्या बूथ स्तर से बढ़ाना शुरू की | परिणाम यह निकला की कांग्रेस राज्य दर राज्य लगातार चुनाव हारती रही |
अब कांग्रेस को अपने अग्रिम संगठनों को मजबूत और सक्रिय करना होगा, और इनमें सेवादल, युवक कांग्रेस, एनएसयूआई और महिला कांग्रेस मुख्य हैं | जमीन पर इन चारों संगठनों के नेता तो नजर आते हैं मगर कार्यकर्ता नजर नहीं आते हैं |
इसके लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर मजबूत नेताओं की जरूरत है ! कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जंबो कार्यकारिणी बना रखी है | मगर उस कार्यकारिणी में अधिकांश पदाधिकारी ऐसे हैं जिनका प्रभाव उनके मंडल में भी नहीं है |
उन नेताओं को पार्टी हाई कमान ने राज्यों का सह प्रभारी बना रखा है, राष्ट्रीय प्रभारी का प्रभाव हाल के दिनों में कांग्रेस ने महाराष्ट्र हरियाणा और दिल्ली में देखा है ! कांग्रेस को यदि भाजपा से लड़ना है तो नेताओं की कम कार्यकर्ताओं की अधिक जरूरत है|
सवाल यह उठता है कि कुंठित कार्यकर्ताओं को घरों से निकाले कौन ? क्योंकि भारतीय जनता पार्टी की जीत और कांग्रेस की लगातार हार की वजह से कांग्रेस कार्यकर्ता का मनोबल टूटा है |
वह अपने ही नेताओं की उपेक्षा का बड़ा शिकार हुआ है इसलिए भी मायूस होकर बैठा है |पार्टी हाई कमान ने राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश जिला और ब्लॉक में ऐसे लोगों को संगठन की जिम्मेदारी दी है जिनका कोई वर्चस्व नहीं है और जिनका वर्चस्व है वह किनारा कर दिया गया है |अब उसे घर से निकालने की जरूरत है मनोबल बढ़ाने की ज़रुरत है |
राहुल गांधी बोल बोल कर थक गए की प्रदेश से लेकर ब्लॉक स्तर पर मजबूत और जन आधार वाले कार्यकर्ताओं को संगठन में लिया जाए मगर देशभर के राज्यों के पदाधिकारी की सूची को देखें तो अधिकांश पदाधिकारी परिवार या सिफारिश से बने हैं |
जिनका उद्देश्य केवल अपने पद को बरकरार रखना और मौका आए तब पार्टी का टिकट हासिल करना है | संगठन में राहुल गांधी जातिगत हिस्सेदारी की बात कर रहे हैं रिश्तेदारी तो नजर ही नहीं आ रही है |
बिहार में कांग्रेस के भीतर कार्यकर्ताओं का सबसे बड़ा मुद्दा यही है क्योंकि वहां बराबर की हिस्सेदारी संगठन में नहीं है इसीलिए कांग्रेस बिहार में कमजोर है |इसपर काम करने की तत्काल ज़रुरत है |
राहुल गांधी को भाजपा से लड़ने के लिए अपने बब्बर शेरों को दहाड़ने के लिए पिंजरे से बाहर निकालना होगा,उनको संवैधानिक और अनुशासित अधकारों के साथ आज़ाद करना होगा | यह नहीं कि जब राहुल गांधी की सभा या रेली हो तब उन्हें राहुल गांधी के सामने लाकर यह सुनने के लिए बिठा दिया जाए के कैसे हो बब्बर शेर ????
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