कौन कहता है पूंजीवाद ,सामंतवाद व साम्राजयवाद का हिमायती हूँ मैं ?

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By Ali Aadil Khan

साल  का ग्यारवां महीना यानी नवम्बर पूंजीवादी ताक़तों या सामंतवादी शक्तियों  के लिए कितना अच्छा है या कितना बुरा इसका अंदाज़ा 9 /11 ,26 /11 ,8 /11 जैसी तारीखों से लगाया जासकता है ,9 /11 को ट्विन्स टावर ज़मींदोज़ होरहे थे मगर 4500 से ज़्यादा यहूदी उस दिन छुट्टी पर थे ,इसी को बहन बनाकर अफगनिस्तान और इराक को तबाह करदिया गया ,इराक की पेट्रोल की दौलत को लूट लिया गया .26 /11 को मुम्बई ATS Chief हेमंत करकरे और उनके 4  साथियों को मौत के घाट उतार दिया गया , हमारे पाठक जानते हैं हेमंत करकरे का क़ुसूर क्या था ?और वो हिंदुस्तान के किस आतंकी जाल की परतों को खोल रहे रहे थे ,उसी दौरान एक छलावा पैदा हुआ था जिसका नाम अजमल क़साब था ,इसी हादसे में मुम्बई की यहूदी बस्ती का ज़िक्र भी पाठकों ने सुना होगा ,ऐसी ही एक और 8 /11 की  तारिख 2016 में आई जिसने दौड़ते भारत को अचानक ब्रेक लगा दिया ।जिसको नोटबंदी के नाम से भारत का बच्चा बच्चा जानता है ।

 

अपने पाठकों को बता दें की नक़दी परिचलन का 86 प्रतिशत हिस्सा 500 और 1000 रुपये के नोटों के रूप में ही था। ग़ौरतलब है कि लेन-देन का 90 प्रतिशत नक़दी के रूप में ही किया जाता है और 85 प्रतिशत से ज़्यादा कामगारों को तनख्व़ाहों का भुगतान भी नक़दी के रूप में ही किया जाता है। फ़ाइनेंनशि‍यल इनक्लायूशन इनसाइटस प्रोग्राम के एक सर्वे के अनुसार लगभग 53 प्रतिशत आबादी के पास कोई बैंक खाता नहीं हैं। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेण्ट प्रोग्राम(UNDP) की एक रिपोर्ट के अनुसार 80 प्रतिशत महिलाओं के पास कोई बैंक खाता नहीं है। ऐसे में सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि नोटबन्दी का प्रभाव किस वर्ग पर पड़ रहा होगा।

 

आपको बताते चलें नोटबन्दी के बाद नक़दी और काम दोनों में ही आयी कमी के कारण मोदी जी के घर गुजरात के  सूरत के डायमण्ड कटिंग और पॉलिशिंग उद्योग में लगे क़रीब 20 लाख मज़दूरों में से तक़रीबन 10 लाख मज़दूर अपने गाँवों की ओर वापस रुख़ कर रहे हैं (बिज़नेस स्टेण्डर्ड, 10 दिसम्बर)। कमोबेश यही स्थिति राजकोट के ज्वेलरी उद्योग, अलंग में जहाज़ तोड़ने के काम में लगे मज़दूरों की है। इसी तरह पूर्वी बंगाल के तराई इलाक़े के एक चाय बागान की बन्दी के बाद क़रीब 2,500 मज़दूरों की रोज़़ी-रोटी का स्रोत पूरी तरह ख़त्म होता है ( इण्ड‍ियन एक्सप्रेस, 11 दिसम्बर)।

 

 

नोटबन्दी से नक़ली नोटों के ख़ात्मे के दावे की जांच पर एक नज़र डालते हैं । नेशनल इन्वेस्टीगेटिव एजेंसी (एनआइए) और इण्ड‍ियन स्टैटिि‍स्ट‍कल इंस्टीट्यूट के 2015 के एक संयुक्त अध्ययन के अनुसार अर्थव्यवस्था में हमेशा ही 400 करोड़ की नक़ली मुद्रा मौजूद रहती है। मज़ेदार सच देखिए, फाइनेंशियल एक्सप्रेस की 15 नवम्बर की एक ख़बर के अनुसार नयी नोटों की केवल छपाई का ही ख़र्च 11,000 करोड़ रुपये है। अब ज़रा सोचिए कि 400 करोड़ के नक़ली नोटों के ख़ात्मे के लिए 11,000 करोड़ का ख़र्च करके नये नोट छापना कहाँ की समझदारी है!

 

 

हम नहीं कहते जनता कह रही है कि मोदी सरकार पूंजीवादियों कि सरकार है सम्राज्येवादियों कि सरकार है , आपको शायद याद हो कि अगस्त 2015 में वित्त मन्त्री अरुण जेटली का बयान आया था कि तरलता की कमी से निपटने के लिए बैंको में 70,000 करोड़ रुपये डालने की आवश्यकता है।शोध संस्थान क्रेडिट स्यूसी रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि भारत में जिन कॉरपोरेट घरानों पर सबसे ज़्यादा क़र्ज़ लदा है उसमें नामी-गिरामी कम्पनियाँ वेदान्ता, एस्सार, अडानी, अनिल अम्बानी और मुकेश अम्बानी की कम्पनियाँ शामिल हैं। कुल मिलाकर, बैंक अपनी साख़ बचाने के लिए तरह-तरह की तकनीकी शब्दावलियाँ गढ़कर जनता की नज़र से असलियत छिपाने की घिनौनी कोशिशें करते हुए पूँजीपतियों की तन-मन-धन से सेवा करते हैं। यह स्पष्ट है कि बैंकों पर इन बुरे क़र्ज़ों के दबाव से अर्थव्यवस्था में तरलता की कमी का आना निश्चित था। नोटबन्दी का ऐलान करके जनता को नक़दी जमा करने के लिए मजबूर करके इस तरलता की कमी से निपटने का आसान तरीक़ा खोजा गया।मगर जनता को बताया गया की आतंकवाद ,काले धन ,दाऊद और पाक को कमज़ोर करने के लिए यह स्ट्राइक किया गया है जबकि असलियत रफ्ता रफ्ता जनता के सामने आने को है ।

 

ग़ौरतलब है कि अभी कुछ महीने पहले 29 सरकारी बैंकों ने पूँजीपतियों द्वारा लिये गये 1.54 लाख करोड़ के बुरे क़र्ज़ को पूरी तरह माफ़ कर दिया है। 9000 करोड़ रुपये डकारकर विजय माल्या विदेश भाग गया यह किसी से छिपा नहीं है। हालाँकि विजय माल्या तो केवल एक नाम है जो चर्चा में आया, दरअसल इस हमाम के कई नंगे धड़ल्ले से सरकार की मदद से जनता की आँखों में धूल झोंक रहे हैं।

 

सवासो करोड़ जनता के सहयोग की झूटी सांत्वना से मोदी जी खुद को तो फिलहाल मुत्मइन करसकते हैं किन्तु देश को तसल्ली देने के लिए बेरोज़गारी दूर करके नौकरियों के अवसर दिलाने होंगे देश के मज़दूर ,किसान तथा छोटे कारोबारी को मुख्य धरा में लाना होगा , अल्पसंख्यक ,दलित व पिछड़े को सामाजिक सुरक्षा कि गारंटी देनी होगी जो पिछली सरकारें भी नहीं दे पाई हैं  जिसके लिए जनता से झूट बोलने व 100 और 50 दिन की मोहलत लेने से काम नहीं चलने वाला बल्कि सच्चाई ,ईमानदारी और इन्साफ से काम करना होगा जिसके लिए रोज़ देर होरही है ।editor’s desk

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