क्या एक सच्चा पत्रकार अपने कैमरे से सत्ता की चूलें हिला सकता है ?
बीजेपी जब सत्ता से बाहर थी तब उनके उनके रविशंकर प्रसाद और अरुण जेटली जैसे बड़े नेता कहा करते थे के Press Loktantr का पहरेदार है. अब इससे आप अंदाजा लगाएं की सियासत में बोल और जुमले कैसे बदले जाते हैं.
आज सवाल है की क्या देश के करोड़ों लोगों को उनके नागरिक अधिकारों से वंचित होते मूकदर्शक रहा जाए या सरकार की जनविरोधी योजनाओं के खिलाफ और देश के लोकतंत्र तथा संविधान को बचने के लिए मैदान में आया जाए.
स्थिति लगभग अँगरेज़ साम्राज्य के दौर की है. जो उनके मुखपत्र बने हुए थे उनको नवाब और राजा का सिंहासन मिल रहा था . और जो उनके ज़ुल्म और जनविरोधी योजनाओं के ख़िलाफ़ बोल रहे थे आलम बुलंद कर रहे थे उनको फांसी पर लटकाया जा रहा था .
एक आंकड़ा यह है 2014 से 19 तक 200 पत्रकारों पर मुक़दमे दर्ज हो चुके हैं और ये सब वो पत्रकार हैं जो सरकार से सवाल पूछते हैं या जनविरोधी योजनाओं और कालाबाज़ारी के ख़िलाफ़ लिखते या बोलते हैं .
आज सही सच्ची और निडर पत्रकारिता को ये लोग जुर्म बताने में लगे हैं. आज बिहार के मतगणना सूची में धान्द्ली के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई अजीत अंजुम की नहीं बल्कि पत्रकारिता के अस्तित्व और मुल्क के भविष्य की है . सवालों की पत्रकारिता को ख़त्म करने के इस सरकार की लगातार कोशिश है.
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अब हाल तो यह है की देश को वापस ग़ुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ने की तरफ ले जाय जा रहा है . तो ऐसे में आपकी उम्मीद अजीत अंजुम जैसे पत्रकार ही हैं देश और जनता के पैर का काँटा निकाल सकते हैं .
बिहार मताधिकार सूची प्रकरण में अजित अंजुम के द्वारा दिखाए गए सच के खिलाफ यदि सरकार या ECI कोई कमी निकालती है या उसको पत्रकारिता के नियमों का उल्लंघन साबित करती है तो यह माना जाएगा की उनकी ख़बर में कोई ख़ामी है उनके खुलासे में कोई ख़ला है. .
दरसल दर्द यह है की अजित अंजुम की हिम्मत कैसे हुई उस सच्चाई को दिखाने की जिसको छुपाने में इतनी शक्ति लगाईं जा रही हो. हाँ अजित पर FIR होनी चाहिए !!! क्योंकि उसने जुर्म किया है सच को दिखाने का लोकतंत्र को बचाने का.
अब सरकार को डर यही तो है कैसे अजीत रोड़ा बन रहे हैं उस प्रक्रिया में जिसके बाद सत्ता के सिहांसन को हथियाया जाएगा. अजीत अंजुम जैसे सैंकड़ों नामालूम और अज्ञात पत्रकार कैसे रोड़ा बन रहे हैं. इसलिए उन सबके खिलाफ FIR होनी चाहिए. उसके बाद ही तो पत्रकारिता में इंक़लाब आएगा. और ऐसा लगता है इस इंक़लाब की शुरुआत बिहार की क्रांतिकारी धरती से हो गई है .
आज आनंद वर्धन के Youtube Channel पर अजीत अंजुम की सॉलिडेरिटी में एक प्रोग्राम रखा गया जिसमें देश भर के दर्जनों पत्रकारों ने अजीत अंजुम को अपना समर्थन दिया. इस शो में महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश पोहरे ने खुलासा किया की महाराष्ट्र में रोज़ 15 किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन सरकार की सख्त हिदायत है पुलिस को के इसको Accidental मौत लिखो आत्महत्या Record पर नहीं आना चाहिए ….
उन्होंने दूसरा खुलासा किया की सरकार ने 61 lakh करोड़ रूपये का गबन किया ,,,वो इस तरह कि चावल का सरकारी रेट निकाला गया 4450 प्रति क्वांटल जबकि किसान को MSP दिया गया 2000 RS प्रति क्वांटल इसी तरह गहुँ के रेट में भी किसान को घाटा दिया गया .
यानी 21 लाख करोड़ का किसान को गेहूं में नुकसान दिया गया और चावल किसान को 23 लाख करोड़ की चोट पहुंचे गई कुल 44 लाख करोड़ का नुकसान महाराष्ट्र के किसान को हुआ और पूरे भारत में 61 लाख करोड़ की चोट किसान को सरकार ने पहुंचाई ….आनंद वर्धन के शो में सभी पत्रकारों ने अपने विचार रखे और अपना समर्थन जताया.
दरसल सियासी संरक्षण में रहकर पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता करना कायरता है. मुल्क और अवाम से बगावत है.चंद कौड़ियों और ऐश की ख़ातिर ग़लत को सही कहना, देश की प्रभुता और अस्मिता एकता और अखंडता, समता और सफलता से खिलवाड़ करना देशद्रोह है.और इसकी सजा वही होनी चाहिए जो एक मुल्क के बाघी की होती है. मगर विनाशकाल है इसलिए चाटुकारों को तरक़्क़ी और आलोचकों को सज़ा दी जा रही है.
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एक विडंबना यह है कि निरंकुश शासक इस बात को समझ रहे हैं कि मतदाताओं में लोकतंत्र को चलाने के लिए ज़रूरी क्षमता नहीं है। नागरिक न केवल उदासीन हैं, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी भी बहुत कम है। अक्सर कहा जाता है, “लोकतंत्र के ख़िलाफ़ सबसे अच्छा तर्क औसत मतदाता के साथ पाँच मिनट की बातचीत है।”
अजीब सी बात है जो वोटर आजतक मतदान शब्द के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज न करा सका हो (जिसका सही शब्द मताधिकार है ) और अपना मत यानी Vote दान में देकर चला आता हो तो उससे आप मज़बूत लोकतंत्र को बचाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं .
आज का वोटर नेताओं के काम से कम और करतूतों ,काव्यशैली और नाटकीय भाषा से ज़्यादा प्रभावित होता है. आजके लोकतान्त्रिक देश की जनता, नेता के गोलबच्चन प्रवचन और झूठ से ज़्यादा प्रभावित होती और जनता की इस हकीकत को हमारा नेता वर्ग भी समझ गया है .
हिटलर के प्रचार प्रमुख (Publicity Head) ,,,जोसेफ गोएबल्स के मुताबिक़ – “बार-बार बोला गया झूठ सच बन जाता है”। और Hitler ने इसी को अपनाया और आजके हिटलर भी इसी को अपना रहे हैं ..
इसी आधार पर लेनिन की यह आंतरिक सोच थी कि जो भी Script को नियंत्रित करता है, वह जनता को नियंत्रित करता है; और जो Media को नियंत्रित करता है, वही तक़दीर का निर्माण करता है। हालांकि यह लेनिन का अपना फ़लसफ़ा हो सकता है जिससे इत्तिफ़ाक़ ज़रूरी नहीं . हकीकत कुछ और भी है ….
इसी आधार पर प्राचीन यूनानियों का भी मत था कि लोकतंत्र एक बेतुका विचार है। इसके अलावा, कोई भी व्यक्ति जो थोड़ा भी समझदार है, यह देख सकता है कि नागरिक अपने नेता चुनने में बहुत समझदार और जागरूक नहीं हैं ।
हमारा मानना है एक कामयाब लोकतंत्र तभी अस्तित्व में रह सकता है जब जनता wel educated, active और हर लिहाज़ से well informed हो। ज़रा सोचिए, देश में कितने लोग सचमुच इस Catagory के हैं ?
जब हम यह प्रोग्राम बना रहे हैं इसी बीच पता चला है की कुछ चुनिंदा पत्रकारों को चुनाव आयोग के दफ्तर बुलाया गया है. जिसके बाद इस बात की उम्मीद है कि ग्राउंड रिपोर्टिंग के Contrast में नए नए Narrative गढ़े जाएँ.यानी Media Management किया जाएगा .
इस बीच सरकार के सहयोगी घटक के नेता चंद्र बाबू नायडू ने चिट्ठी लिखकर Election Commision के कामों पर ऐतराज़ जताया है जिसमें कहा गया है कि ECI की ऑडिट CAG से कराई जाए इसका मतलब साफ़ है की नायडू को ECI और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की कार्यशैली पर भरोसा नहीं है.सरकार पर कितना भरोसा है इसका कोई ज़िक्र उन्होंने नहीं किया है , अलबत्ता फिलहाल नायडू पर भरोसा करना सरकार की मजबूरी है , अगर नायडू विपक्ष में होते तो शायद उनके ख़िलाफ़ भी FIR हो गई होती .
और अगर नायडू की जगह यही काम कोई पत्रकार या विपक्षी दल का कोई नेता करता तो उसको चुनाव जिहादी ,वोट जिहादी और न जाने क्या क्या कह दिया जाता.क्योंकि जो ग्रुप, संस्था, पार्टी या लोग सत्तापक्ष के जनविरोधी कामों ,योजना और नीतियों पर सवाल खड़े करें वो सब जिहादी हैं .. और यह सच है वो जिहादी हैं ……क्योंकि वो देश और जनता के हितों के लिए सरकारी तंत्र के ख़िलाफ़ जद्दो जहद कर रहे हैं यानी कठिन परिश्रम मेहनत और साहस कर रहे हैं ,इसी को जिहाद और जिहादी कहते हैं .और आज अजीत अंजुम उन्ही में से एक हैं. लिहाज़ा हम और हमारी संस्था हर उस जिहादी के साथ है जो देश की अस्मिता, सम्प्रभुता एकता और अखंडता , विकास और न्याय के लिए प्रयत्नशील है.
सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम भी बागी हैं!
इल्ज़ाम चाहे जो लगा लो, हम सच कहने के आदी हैं !
जय हिन्द शुक्रिया
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