
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो
निदा फ़ाज़ली
न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए, यह कहावत इंग्लैंड के तत्कालीन चीफ जस्टिस लॉर्ड हेवार्ट की है,जो न्यायिक वयवस्था में प्रचलित भी है. मगर वक़्फ़ संशोधन 2025 के सिलसिले में सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम फैसले से क्या साबित होता है?
क्या यह न्याय की देवी का बनाया हुआ संतुलन है या सत्ता के आगे न्यायपालिका का सरेंडर? इस रिपोर्ट को आपके लिए देखना इसलिए जरूरी है ताकि आपको पता चले कि आँखों से पट्टी खुल जाने के बाद न्याय की देवी से किस तरह का बैलेंस बनाने की कोशिश की जा रही है। और यह भी याद रखें , जहाँ सत्ता के लिए भगवन को ऊँगली पकड़कर लाया जाता हो वहां देवी की आँखों से पट्टी खोलकर तराज़ू का पलड़ा कोनसा झुकाना है यह मुश्किल काम नहीं .
वक़्फ़ संशोधन को लेकर जो अंतरिम फैसला आया है, आपको ग़ौर करना है किस ख़ूबसूरती से सत्ताधारी पार्टी और उसकी जननी संस्था के agendas को पूरा करने के लिए न्याय की देवी ने सत्ता से ही रस्ता बनाया है।
दरअसल विपक्ष और विश्लेषकों द्वारा आरोप लगाए जा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम फैसले की हर 3 Lines में से बीच की एक लाइन सत्ता को सूट करने वाली तैयार की है. बस यही अदालती लाइनों का वो खेल है जिसको कम से कम भारत की आम जनता तो नहीं समझ पाएगी.
सत्तापक्ष के काम करने के तरीके को आप हाथ घुमाकर कान पकड़ने की मिसाल से भी समझ सकते हैं! यानी हर वो क़ानून जो सदन से नहीं बन पा रहा उसको Supreme Court के रस्ते से बनाये जाने की क़वाइद जारी है. पिछले १२ वर्षों में संसद से पास होने वाले विधेयकों या बिलों पर नज़र घुमाएं तो पता चलेगा की ज़्यादातर ऐसे हैं जिसमें तुष्टिकरण साफ़ दिखाई देता है .
अब चाहे वो राम मंदिर निर्माण हो , नोटबंदी , तीन तलाक़, धरा 370 , CAA , NRC , Uniform Civil Code , GST लगाना फिर लगाकर हटाना , 3 कृषि क़ानून लाना फिर वापस लेना , वक़्फ़ क़ानून लाना फिर घुमाना ये सब वो क़ानून या क़ानून के नाम पर देश को उलझाना था , जिससे सरकार की नाकामियों को छुपाने की कोशिश कहा गया . इनसे देश का क्या भला हुआ क्या सरकार के ज़िम्मेदार निष्पक्ष प्रेस के साथ बैठकर बात कर सकते हैं .
अब रही मोदी सरकार की उपलब्धियों की बात जो अक्सर किसी भी चुनाव रैलियों में गिनाई जाती हैं और इसकी घोषणाओं पर काफी पैसा खर्च किया जाता है , जैसे ….
जनधन योजना, पीएम गरीब कल्याण योजना, पीएम आवास योजना, हर घर जल योजना, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी और नमामि गंगे योजना को देशवासियों के लिए सौग़ात कहा जाता रहा है । स्वच्छ भारत मिशन और आत्मनिर्भर भारत अभियान , 85 करोड़ गरीबों को फ्री राशन देने को भी सरकार की उपलब्धी बताय गया।
इसके अलावा,वंदे भारत ट्रेन और नए संसद भवन को जनता के लिए सौगात बताया गया। अब इन सब उपलब्धियों का देश की जनता को कितना लाभ मिला ये आपको देश की वर्तमान सामाजिक आर्थिक और राजनितिक हालत देखकर खुद ही अंदाजा लगा लेना चाहिए . हालांकि इन योजनाओं का लाभ किसी न किसी को तो हुआ ही होगा , लेकिन इन योजनाओं के माध्यम से किन लोगों के अच्छे दिन आये कुछ आपको भी पता लगाना होगा.
अंग्रेजी अखबारों में इस वक़्फ़ संशोधन वाले अंतरिम फैसले का अलग अलग तरीके से पोस्टमार्टम किया गया है। उसमें कई सवाल उठाए हैं जो चौंकाने वाले हैं । देखिए किस तरह देश की लगभग 30 करोड़ जनसँख्या वाली क़ौम मुसलमान की आर्थिक सुरक्षा के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने आंखें मूंद ली हैं।
बाबरी मस्जिद से कहीं ज़्यादा अहम् और संवेदनशील वक़्फ़ संशोधन मुद्दे पर उस तरह चर्चा ही नहीं कराई गई जैसी होना चाहिए थीI लेकिन बात वही है अगर तूही न चाहे तो बहाने हज़ार हैंI जिस मुल्क के हुक्मरान के लिए देश और जनता से बढ़कर सत्ता और सिंहासन हो जाए तो देश के लिए इससे बड़ा चिंता का विषय कोई और नहीं हो सकता .
आजकल पडोसी देशों में लगातार पनपता विद्रोह शायद बड़ी चिंता का विषय होगा , पता नहीं !! नेपाल जैसे ग़रीब देश में लाखों करोड़ की सरकारी और निजी संपत्ति स्वाहा कर देने वालों की मंशा को नेपाल की KP Sharma ओली सरकार समझने में नाकाम रही यह भी वर्तमान सत्तापक्ष के लिए चिंता का ही विषय है .
यह अलग बात है भारत में जनता के हर विद्रोह को मैनेज करने के लिए अल्पसंख्यक बलि के बकरे की तरह इस्तेमाल होजाया करता है. लोगों का मानना है की अगर भारत में अल्पसंख्यक न होता तो देश का हर ३ साल में तख्ता पलट हुआ करता.अब इसको देश की ख़ुशक़िस्मती कहें या बदक़िस्मती यह फैसला आपके ऊपर छोड़ते हैं .
बड़ा सवाल ये भी है कि इस वक़्फ़ संशोधन पर अंतरिम फैसले पर जो लोग खुशी जता रहे हैं, ताली बजा रहे हैं , क्या वो सलीक़े से उलझाई गई गुत्थी के नतीजे से वाक़िफ़ हैं ? क्या इन फैसलों के दूरगामी नतीजों से परिचित हैं ? शायद नहीं !! याद रखें देश का आख़री शख्स जितना कमज़ोर होगा उतना ही कमज़ोर मुल्क कहलाया जाएगा .
भारत में जिस मनुवाद को लेकर रोज़ हु हल्ला होता है उसी की क़ौम में लाखों लोग अपने अधिकारों के लिए इसी देश में परेशां नज़र आते हैं बाक़ी नागरिकों का तो ज़िक्र ही क्या है . .
लोग कहते हैं भारत में अल्पसंख्यकों को सामूहिक न्याय मिलना असंभव हो चुका है? ऐसा माना जा सकता है , मगर यहाँ तो आम तौर से ना इंसाफ़ी हो रही है . और यहीं क्या हर जगह एहि हाल है . आप किसी भी मुद्दे पर फैसलों की सूची देखें मिलेगा वही जो पहले से तय किया जा चुका है. जो सत्तापक्ष ने तय कर दिया है, या पूँजीवाद जो चाहता है , कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष I
अब यह जुमला भी पूरी तरह सार्वजनिक होगया है के आप किसी भी जाति धर्म या समुदाय से हो नंबर सबका आएगा और यह अमृत काल वालों की गारंटी है। लेकिन एक गारंटी हमारी भी है कि हम देश की सम्प्रभुता , एकता, अखंडता और राष्ट्रीय विकास के लिए इन्साफ, सद्भाव, इंसानियत और ईमानदारी की बात करते रहेंगे, यह अलग बात है कि कुछ राजनीती के बाज़ीगरों को अम्नो मोहब्बत का खैल पसंद नहीं है, अब यह उनके DNA का प्रॉब्लम है. लेकिन हम देश और देश की करोड़ों जनता के जज़्बात और Sentimants ज़ेहन में रखकर ही Prograame बनाने की कोशिश करते रहेंगे चाहे सरकार किसी भी पार्टी या दल की हो और उनकी मंशा जो कुछ भी हो I
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आप जानते हैं अंतरिम फैसले का भी काफी महत्त्व होता है अगर फैसला पीड़ित के हित में है तो….. । वर्तमान सरकार में वक़्फ़ संशोधन अधिनियम 2025 पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपना अंतरिम फैसला सुनाया है। मगर इस फैसले से किसका भला होने वाला है? जैसा कि आपने देखा कि सुप्रीम कोर्ट ने तो वक़्फ़ संशोधन कानून पर पूरी तरह रोक लगाने से लगभग इंकार कर दिया है।
विपक्ष और याचिकाकर्ताओं को खुश करने के लिए कुछ शर्तों पर हल्की-हल्की रोक लगा दी गई है लेकिन यहां सवाल पैदा होता है कि वक़्फ़ बोर्ड और सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल में हिन्दुओं को जगह क्यों दी गई है?
इसके बाद यह सवाल उठाया जाने लगा है क्या अमरनाथ श्राइन बोर्ड और राम मंदिर ट्रस्ट में मुसलमानों को जगह दी जाएगी? क्या तिरुमला और तिरुपति देवस्थानम बोर्ड में किसी सिक्ख या मुस्लमान को शामिल किया जाएगा ?
हालांकि यह सवाल या तथ्य सही नहीं है मान लीजिये अगर किसी श्राइन बोर्ड या हिन्दू मंदिर ट्रस्ट में वसीम रिज़वी जैसे मुसलमान को जगह मिल जाए तो उसके होने से किसी ट्रस्ट या श्राइन बोर्ड को क्या खतरा है ? कुछ भी नहीं … जो बात संविधान के विरुद्ध है अदालत की चहार दीवारी में भी उसका ज़िक्र तक नहीं होना चाहिए, समझौते का तो सवाल नहीं उठता?