
पंजाब, जम्मू, हिमाचल, उत्तराखंड में आपदा का कारण और इसका निदान
क्या जलते मणिपुर की तरह डूबते पंजाब को भी सरकार उसके हाल पर छोड़ देना चाहती है ? क्या डूबते पंजाब से ज़्यादा हारते बिहार की चिंता प्रधनमंत्री को सता रही है?
ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि सत्तापक्ष के विचार विभाग में आपदा में अवसर तलाश करने पर मंथन चल रहा होगा, क्योंकि नए भारत में आपदा में अवसर तलाशे की नई परिभाषा रची गई है.
जिसके बाद एक सियासी ग्रुप को लगातार आपदाओं का इंतज़ार रहता होगा. होना तो यह चाहिए था कि जिस देश का PM अजैविक हो यानी जो दुनिया में माँ के पेट से पैदा न होकर अवतरित हुआ हो तो उसके रहते देश में सब कुछ धन्य और सामान्य रहना चाहिए था.
लेकिन जब प्रकृति के निज़ाम को खुद PM challenge करे तो प्रजा का हश्र क्या होगा आप समझ सकते हैं? जिस तरह Covid 19 आपदा में देश ने देखा सत्तापक्ष और मौकापरस्त लोगों ने अवसर तलाशे और लाशों तक का सौदा किया गया .
माँ की मौत के दिन भी काम पर रहने वाले प्रधानमंत्री, माँ की गाली पर गोल बच्चन करने में मसरूफ हैं .और माँ की गाली पर मंथन करने वाली मीडिया पंजाब में आई त्रासदी पर खामोश है !!! शायद उनको कोई नया टारगेट दिया जाने वाला है , बिहार चुनाव से पहले .
याद रहे 9 सितम्बर को उपराष्ट्रपति का चुनाव है और इन लोगों के लिए कोई भी चुनाव सिर्फ चुनाव नहीं होता बल्कि उसको चैलेंज की तरह लेते हैं . Hedaline Manage करने वाला सत्तापक्ष जल्द कोई नया मुद्दा आपके सामने परोसने वाला है . Headline managemnet क्या है इसको भी ज़रा समझ लेते हैं
एडवर्ड बर्नेज़ (Edward Bernays) , जिन्हें “Father of Public Relations” कहा जाता है , उन्होंने यह सिद्धांत दिया कि जनमत (Public Opinion) को हेडलाइन और प्रतीकों यानी (symbols) से सबसे आसानी से Control किया जा सकता है।
बाद में सामाजिक वैज्ञानिकों और मीडिया थ्योरिस्ट्स ,,,,,जैसे मैक्सवेल मैकॉम्ब्स (Maxwell McCombs) और डोनाल्ड शॉ (Donald Shaw) ने 1972 में Agenda-Setting Theory पेश की। जो यह बताती है कि मीडिया जब किसी मुद्दे को बार-बार और हेडलाइन में दिखाता है, तो जनता उसे ही सबसे सही और बड़ा मुद्दा मान लेती है।भले उसकी प्रासंगिकता यानी relevance न हो.
अब HeadLine Management सीख लेने वाली वर्तमान सरकार यह भूल गई कि लोकतंत्र में जब जनता किसी को क़दमों में लाने का मन बना ले तो फिर कोई तरकीब वरक़ीब नहीं चलती, सब झूठ , गोलबच्चन और Headline management जैसे ड्रामे धाराशाई हो जाता है.
मुसलमानों की तरफ से सहायता की चर्चा का सच
सोशल मीडिया पर पंजाब त्रासदी से मुतास्सिर होने वालों की मदद के लिए अक्सर मुसलमानों की तरफ से सहायता का ज़िक्र किया जारहा है जबकि सच्चाई यह है कि खुद पंजाब के मक़ामी लोग , ईसाई मिशनरीज और सरकारें भी अपना भरपूर सहयोग दे रही हैं.
मगर इस बार मदरसों ने अपना किरदार वाज़ेह तौर से निभाया है .पूरे जोश और सेवा भाव से पंजाब आपदा से प्रभावित लोगों की दिल खोलकर मदद की है, जो अच्छा संकेत है. इसकी वजह यह है कि पंजाब और ख़ास तौर से सिक्ख किसी भी आपदा में हमेशा अगली पंक्ति में दिखाई दिया है . और गुरुद्वारों की लंगर सेवा से देश की बड़ी संख्या में लोग पेट भर रहे हैं.
सिख्खों की इस सेवा का नतीजा है कि आज देश के हर कोने से पंजाब की मदद की आवाज़ लग रही है, जबकि साहिब की नवाज़िशों और किरपा की बारिश कहीं और ही बरस रही है .
अगर भविष्य में किसी सरकारी मुआवज़े का ऐलान होता भी है तो किसानों और आमजन को सरकारी मुआवज़ा लेने के लिए कब तक दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे, इसका अनुमान उनको होगा जो सरकारी योजनाएं हासिल करने के लिए जूतियां घिसते रहे हैं ।
पंजाब सरकार की जानिब से राहत शिविर लगाए जाने का भी दावा हो रहा है लेकिन Reports ये हैं कि कई गाँवों तक अब तक कोई मदद नहीं पहुँची है। कुछ जगहों पर अनाज की बोरियां गिराई गईं तो उससे छत ही टूट गयी.
पंजाब त्रासदी देश की बड़ी प्राकृतिक आपदा है जिसपर केंद्र और राज्य सरकारों का ध्यान केंद्रित रहना चाहिए .आपको याद होगा पंजाब के किसानों ने प्रधानमंत्री को 2024 चुनावी रैली में नहीं जाने दिया था उनका रास्ता रोक लिया गया था काले झंडे दिखाए गए थे.
बस साहब का माथा ठनक गया , अब बदले की भावना में डूबते पंजाब के साथ क्या सुलूक होगा रब ही जाने ???. लेकिन याद रहे पंजाब किसी भी हालात का सामना करने की क्षमता , सामर्थ और हिम्मत रखता है इसकी तारीख़ गवाह है .
जुझारू पंजाब इस त्रासदी से भी उभरेगा, यहाँ की ज़िंदगी फिर पटरी पर आएगी , लेकिन इस मुसीबत में किसका क्या किरदार रहा सब याद रखा जाएगा, और याद भी दिलाया जाएगा .
सरकारी स्तर पर जल त्रासदी, भुस्खलन , सूखाग्रस्त , बाढ़ ग्रस्त , तेज़ हवाओं और भूकंप जैसी आपदाओं से बचने के लिए कोई सरकारी असरदार योजना नहीं है अगर है तो उस पर अमल नहीं.यह विडंबना है इसका निदान जितना जल्द किया जाए उतना जल्द धरती को सुरक्षित रखा जा सकता है .
देश में बढ़ता भ्रष्टाचार इसका मुख्य कारण बना है जिसको ख़त्म करना सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए. लेकिन अगर क़ानून बनाने वाले सदन में ही भ्रष्ट और दागी नेताओं की संख्या लगातार बढ़ रही हो तो क्या कीजे .
नक़ली देशभक्तों की तलाश की जा रही है,, वो Scene से ग़ायब हैं, न सिर्फ पंजाब से बल्कि उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू में भी वो नहीं दिखाई दे रहे हैं ,,,,,जी वही देशभक्त आपने सही समझा !!! प्रधनमंत्री जिनकी लाल क़िले से तारीफ कर रहे थे.
शायद वो हथ्यार चलाने की training में bussy होंगे, क्योंकि उनको देश से घुसपैठियों को बाहर निकालना है और चीन के साथ हाथ मिलाना है .
और यह भी हो सकता है कि बिहार चुनाव की तैयारियों में मसरूफ हों नक़ली देशभक्त, कहाँ कहाँ सांप्रदायिक दंगे भड़काने हैं वोट धुर्वीकरण कैसे करना है, इन्ही सब योजनाओं के बनाने में व्यस्त होंगे .
अब ज़ाहिर है ये कोई मामूली काम नहीं है , पूरा देश संभालना है बड़ा टारगेट है. जिसको पूरा करने के मुक़ाबले पंजाब या जम्मू और हिमाचल जैसी त्रासदी नक़ली देशभक्तों के लिए मामूली घटना मात्र है.
आप देख रहे होंगे हमेशा की तरह नेताओं की मदद का तरीक़ा चुनावी स्टंट ज़्यादा और निस्स्वार्थ भाव से इंसानियत की खिदमत कम होती है।
मौलाना मुहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी ने पूरे पंजाब की मस्जिदों के दरवाज़ों को पंजाब के बाढ़ पीड़ितों के लिए खोल देने का ऐलान कर दिया. और देशभर के मुसलमानों से अपील की है कि इस त्रासदी में पंजाब के लोगों के साथ खड़े हो जाएँ और उनकी आवाज़ पर देश के मुसलमानों ने लब बैक कहा है .
मुसलमान आम तौर से इंसानी मदद का फ़रीज़ा निजी तौर से निभाते हैं, क्योंकि यह मज़हबे इस्लाम की तालीम है, बल्कि हर मज़हब इंसानियत से हमदर्दी की तालीम देता है. मगर इस बार अपने मज़हबी और इंसानी फ़रीज़े को पूरा करने में सही वक़्त पर मदरसों ने बड़ा काम अंजाम दिया. हरियाणा के मेवात और पंजाब के मदरसों के अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान से भी इंसानी मदद के लिए सामग्री से भरे ट्रकों के कारवां निकल पड़े.बुलंदशहर (UP ) के ग्राम चंदयाना से भी एक ट्रक पंजाब बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए रवाना किया गया और पूरे मुल्क के मुसीबतज़दा और परेशान लोगों की आसानी के लिए मस्जिदों में दुआएं भी की गईं.
भविष्य में आपदाओं और कुदरती आफतों के रोकथाम की सरकारी योजनाएं और वादे पुराने सामान की नई पैकिंग की तरह ही साबित होने जा रहे हैं।
पंजाब और देश के कई सूबों में इस बार बाढ़ आने के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय (human-made) कारण रहे। जैसे :
इस साल सामान्य से कई गुना अधिक बारिश हुई, खासकर पहाड़ी इलाकों (हिमाचल, उत्तराखंड , पंजाब और जम्मू-कश्मीर) में। पेड़ों का अत्यधिक मात्रा में कटान और illegal minings इसकी बड़ी वजह बताई जा रही रही है.
सतलुज, ब्यास और रावी जैसी नदियाँ अचानक बढ़े जलस्तर को संभाल नहीं पाईं। पुराने बांध और एम्बैंकमेंट (तटबंध) कमजोर थे, जिनसे पानी टूटकर गाँवों-खेतों में भर गया। पानी नदियों के ज़रिये पंजाब की तरफ़ आया overflow हुआ और मैदानी ज़मीन में फैल गया।
जल प्रबंधन की कमी (Poor Water Management)
वक़्त पर बैराज और बांधों से पानी का निकास सही तरह से नहीं हुआ। कुछ जगहों पर पानी रोकने और छोड़ने में तालमेल नहीं बन पाया। कब और कितना पानी कहाँ छोड़ना है इसका प्रबंधन ठीक नहीं रहा जो इस मुसीबत की वजह बना.
ग़लत शहरीकरण और अवैध निर्माण
नदियों और नालों के किनारे बस्तियाँ और पक्के निर्माण कर दिए गए। पानी का प्राकृतिक रास्ता रुक जाने से पानी का बहाव रिहाइशी इलाक़ों में बढ़ गया और आपदा का रूप ले लिया .
लेकिन पानी के रास्ते में अवैध निर्माण ,अवैध खनन ,अवैध जंगल कटाई किसके संरक्षण में हुआ? आपका जवाब होगा … पुलिस , प्रशासन और सरकार के संरक्षण में हुआ , लिहाज़ा इन सब आपदाओं के लिए सरकार को ज़िम्मेदारी लेनी होगी और पश्चाताप करना होगा, अन्यथा जनता को इसके बाद फिर किसी दूसरी आपदा का इंतज़ार करना होगा .
ड्रेनेज सिस्टम की नाकामी
बताया गया पंजाब के कई ज़िलों में नहरों , नालों और Dranage की सफ़ाई नहीं हुई थी। जिसकी वजह से बारिश और नदियों का पानी उफान मारने लगा उसके बाद खेतों और घरों में भर गया।
और लगभग यही हाल हर सूबे और शहर का है, जहाँ बारिश ४ घंटे लगातार होजाये वहां का सीवरेज और ड्रेनेज की पोल खुल जाती है .
दिल्ली और गुरुग्राम में आज भी Underpaas तालाब बने हुए थे .दिल्ली के कई सरकारी अधिकारी आवास इलाक़ों में आज भी जलभराव देखा जा रहा है .
👉 कुल मिलाकर, यह सिर्फ़ मानव की लापरवाही और प्रशासनिक विफलता के साथ “प्रकृति की मार” भी थी . जिसके लिए सरकारों को जनकल्याण योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्था को ईमानदारी से सुचारु करने के साथ जनता को भी अपने करतूतों पर ध्यान देने अपना introspection करने और रब से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने पर पर देना होगा ।
देशभर में बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत योजनाएँ काग़ज़ों और भाषणों में बड़ी उदार दिखती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनकी हालत डूबती नाव की तरह होती है. प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हर हाल में इंसानों के लिए घातक है जितना जल्द इससे तौबा कर लें उतना ज़्यादा हम धरती को आपदामुक्त और सुरक्षित रख सकते हैं वरना सबको अपनी बारी का इंतज़ार करना है.

