सलमान ख़ुरशीद और संदीप मारवाह की शिरकत ने “शाम-ए-बेकल” को बनाया यादगार महफ़िल
बेकल उत्साही फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में उत्साही परिवार ने सजाई अदबी नशिस्त
गीत में हुस्न इ ग़ज़ल, ग़ज़लों में गीतों का मिज़ाज !
मुझको बेकल तेरा अंदाज़ ए सुख़न अच्छा लगा !!
नई दिल्ली : 19 , महादेव रोड दिल्ली में 15 फ़रवरी को अदब और साहित्य की दुनिया में एक ख़ास शाम दर्ज हो गई, जब बेकल उत्साही फाउंडेशन के तत्वावधान में उर्दू–हिंदी साहित्य की एक शानदार महफ़िल सजाई गई।
अदब की इस खूबसूरत शाम को उत्साही परिवार ने बहुत खूब सजाया था, जबकि इस नशिस्त की शमा सलमान खुर्शीद और संदीप मारवाह ने रोशन की। संदीप और खुर्शीद किसी शमा को मिलकर रोशन करें तो इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है की संगोष्ठी का मक़सद सिर्फ नशिस्त ओ बरख़ास्त या दाद ओ तहसीन नहीं था बल्कि सांप्रदायिक एकता की धारा के प्रवाह को तेज़ करना था। साथ ही ऐसे वक़्त में जब हर तरफ़ नफ़रत का ज़हर फैलाया जा रहा हो उसी में देश की सांझा विरासत, मोहब्बत और एकता के माहौल को बनाना था ।
“बेकल उत्साही फाउंडेशन” द्वारा आयोजित यह महज़ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि साझा तहज़ीब, भाईचारे और रचनात्मक अभिव्यक्ति का जीवंत उत्सव था। देश के सभी हिस्सों से आए शायरों, लेखकों और अदबी शख़्सियात ने अपने कलाम और अंदाज़ से मौजूद तमाम शायक़ीन को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत बेकल साहब की याद में श्रद्धांजलि से हुई। उनके साहित्यिक योगदान और सांझा विरासत को आगे बढ़ाने के प्रयासों को याद किया गया। मंच से वक्ताओं ने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और भाषा की खूबसूरती से जोड़ने का माध्यम बनते हैं।
इस मौके पर चेयरपर्सन आरिफ़ा उत्साही ने फाउंडेशन के उद्देश्यों को पेश करते हुए तमाम मेहमानों से बेकल उत्साही साहब के सपनो को साकार करने में फाउंडेशन के साथ जुड़ने की अपील की और सभी सरपरस्तों और दोस्तों से कामयाबी की दुआओं की गुज़ारिश भी की. इस अवसर पर मरहूम बेकल उत्साही साहब के बेटे कुंवर अज़ीज़ (अभिनेता) ने मेहमानों को गुलदस्तों और शाल पहनाकर उनका अभिनन्दन किया.
इस खूबसूरत प्रोग्राम की मेज़बानी बेकल उत्साही साहब की बिटिया डॉo सूफ़िया, उनके शोहर शाहिद ख़ान, बेटे ईज़ान ख़ान ने पूरे ख़ुलूस और अदब के साथ की.
कार्यक्रम में ग़ज़ल, नज़्म, गीत और विचार के रंग देखने को मिले। कभी तालियों की गूंज, तो कभी ख़ामोशी में डूबा हुआ शेर हर लम्हा अपने आप में बेकल उत्साही की याद का एहसास करा रहा था। श्रोताओं ने भी पूरे जोश और दिलचस्पी के साथ कार्यक्रम में हिस्सा लिया, और शायरों कवियों को अपनी मोहब्बतों और दुआओं से नवाज़ा |
उत्साही परिवार का कहना था कि इस तरह की साहित्यिक बैठकों का मक़सद केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में मोहब्बत, क़ौमी एकता और संवाद की परंपरा को मज़बूती से आगे बढ़ाना है ।
धर्म मेरा इस्लाम है भारत जन्मस्थान
वज़ू करूँ अजमेर में और काशी में स्नान
(बेकल उत्साही)
हमारा मानना है कि आज के दौर में जब भाषाई, मज़हबी और सामाजिक दूरी बढ़ती दिखती है, तब उर्दू–हिंदी की ऐसी साझा महफ़िलें उम्मीद की एक रोशन किरण बनकर सामने आती हैं।
15 फ़रवरी की यह शाम साबित कर गई कि अदब और साहित्य की चेतना और एहसास लोगों में अब भी ज़िंदा है और जब शब्द दिल से निकलते हैं, तो सीधे दिलों तक पहुंचते हैं। आज देश ऐसे ही सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रमों को सांझा कोशिशों के साथ करने की ज़रुरत है, ताकि नफ़रतों की खाई को भरा जा सके जिससे अमन और भाईचारा ज़िंदा हो जिसके बाद देश में विकास की राहें खुल सकें।
इस खूबसूरत महफ़िल में पद्मश्री अशोक चक्रधर साहब (सदारत), बुद्धिनाथ मिश्र साहब, जोहर कानपुरी साहब, डॉ इफ़्फ़त ज़रीन साहिबा, अफ़ज़ल मंगलोरी साहब, शबीना अदीब साहिबा, हसन सोनभद्री साहब, राजीव रियाज़ साहब, मीरा नवेली साहिबा, पॉपुलर मेरठी साहब , अरविन्द असर साहब, गार्गी कौशिक साहिबा, ज़रीन सिद्दीक़ी साहिबा, जावेद मुशीरी साहब जैसे शायर और कवी शामिल रहे। जबकि निज़ामत की ज़िम्मेदारी दीक्षित दनकौरी साहब ने बखूबी अंजाम दी ।
कार्यक्रम के क़ाबिले ज़िक्र मेहमान जनार्दन द्विवेदी जी, डॉ मोहसिन वली, नाज़ वली साहिबा, वीरेंद्र सिंह जी, सुनील चौधरी जी, बदरुद्दीन खान , नवेद इकराम ख़ान, अब्दुल मजीद निज़ामी, अख़लाक़ अहमद खान ,प्रधान मोईन खान, मुहम्मद आमिर खान, नवेद अख्तर जी , चंद्रकांता जी, सुनील कुमार ढींगरा जी, सलाहुद्दीन जी, नईम निज़ामी, आनंद शर्मा जी, सौरभ जी, सबीना समद जी, डॉ मुहम्मद आज़ाद ख़ान, रिहान खालिद जी, आलोक अग्रवाल जी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों ने बड़ी तादाद में शिरकत की।
अंत में अली आदिल खान ने तमाम मेहमानो का शुक्रिया अदा किया और इसके बाद सभी मेहमानों ने रात्रि भोज के साथ ग़ज़ल और संगीत का भी लुत्फ़ लिया.
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