[t4b-ticker]
Home » Editorial & Articles » गठबंधन का इतिहास : लाभ और हानि

गठबंधन का इतिहास : लाभ और हानि

Spread the love
Ali Aadil Khan Editor’s Dsk

आज हमारी गुफ्तगू का मौज़ू गठबन्धन का इतिहास है , कब किसको किसका समर्थन रहा तफ्सील से बताएँगे . इस गुफ्तगू को आप इसलिए गौर से सुनियेगा ताकि आप गठबंधन की कामयाबी और नाकामी को ध्यान में रखकर आगे सही फैसला कर सके .

कांग्रेस भारत की सबसे पुरानी पार्टी है और इसका Establishment ,या गठन 1885 में हुआ था । आजादी के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बनी .भारत में सबसे पहला आम चुनाव 1951 -52 में 489 सीटों पर हुआ , जिसमें से 364 Congress को मिली थीं

केंद्र से लेकर देश के अधिकतर राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। जवाहरलाल नेहरु की मौत के बाद कांग्रेस २ हिस्सों में बंट गयी थी ,आज़ाद भारत में नेहरू का अब तक का सबसे लम्बा प्रधानमंत्री शासन काल रहा वो 16 साल और 286 दिन देश के प्रधान मंत्री रहे .

कांग्रस के विभाजन के बाद कांग्रेस (Organisation यानी  Congress O) बनी जिसका नेतृत्व K . Kamraj ने किया जबकि कांग्रेस (Requisitionists (R)) का नेतृत्व इंद्रा गाँधी ने किया था .

1971 के आम चुनाव में विपक्षी इन्दिरा गांधी का मुकाबला करने के लिए गठबंधन बना था जिसको राष्ट्रीय डेमोक्रेटिक  फ्रंट (ndf) का नाम दिया गया था इसमें  जनसंघ, कांग्रेस(ओ)स्वतंत्र पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) शामिल थीं  .इसे स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास का पहला पूर्ण गठबंधन कहा जा सकता है ,और इसी को गठबंधन की राजनीती का आग़ाज़ भी आप कह सकते हैं  …

लेकिन इंन्दिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस(आर), जो कांग्रेस (आई) बन गया था, इसने विपक्ष को बुरी तरह से पराजित करते हुए 352 सीटें हासिल कीं ,जबकि भारतीय जन संघ को २२, CPI को 23 और CPI (M) को 25 सीटें मिली थीं  .जबकि तमिल नाडु की तमिल मुनित्रा कड़गम को 23 सीटों पर जीत हासिल हुई  थी .

 1975 में इन्दिरा गांधी ने देश को आपातकाल में झोंक दिया ,विश्लेषकों ने इसको इंद्रा गाँधी का अहंकार कहा और सत्ता का नशा भी ,,,,  जिसका भारी नुकसान इंद्रा गाँधी की कांग्रेस (आई ) को हुआ था , खुद इंद्रा गाँधी भी अपनी सीट को नहीं बचा सकीं .संयोग से 2019 में NDA की मोदी सर्कार को भी 352 सीटें मिली हैं और देश में अघोषित आपातकाल चल रहा है ,,,,,,जिसको अधिकतर विपक्ष के नेता और राजनीतिग विश्लेषक मोदी सरकार का अहंकार कहते आ रहे हैं .

1975 में इंद्रागाँधी के आपातकाल का विरोध JP आंदोलन से शुरू हुआ और लगभग 2 वर्ष चला , हज़ारों विपक्षी नेता जेल गए .1977 आते आते  आपातकाल टिक न सका और देश में आम चुनाव हुए.

जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में कांग्रेस(ओ), भारतीय जनसंघ , भारतीय लोक दल सहित पूरा विपक्ष मिलकर चुनाब में उतरा , और विपक्ष की एकता और जनता के आंदोलन के सामने इस बार इन्दिरा गांधी के अहंकार और डिक्टेटरशिप को जनता ने उखाड़ फेका और कांग्रेस(आई) को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा .खुद इंद्रा गाँधी भी अपनी सीट को नहीं बचा सकीं , जैसा की हमने पहले भी आपको बताया . कांग्रेस को 153 सीटें मिलीं और 197  का नुकसान हुआ .

1977 के इन नतीजों के बाद सभी विपक्षी नेताओं ने वैचारिक महा गठबंधन बनाया जिसको जनता पार्टी का नाम दिया गया . जनता पार्टी के पास 520 में से 330 सीटों का बड़ा आंकड़ा मौजूद था पार्टी ने मोरारजी देसाइ को अपना नेता बनाया और वो प्रधानमंत्री बने ।.ये अलग बात है की वो गोमूत्र पीने या पिलाने की बात नहीं करते थे …….

कुछ दिन बाद इस महा गठबंधन में यानी जनता पार्टी के अंदर विवाद शुरू हो गया जिसके कारण इन्दिरा गांधी को रायबरेली से लोकसभा चुनाव में हराने वाले राजनरायण जनता पार्टी से अलग हो गये। अब जिस जनता ने इंद्रा की  जनविरोधी नीतियों के खिलाफ वोट किया था उस गठबंधन में ही फूट होगी, यानी जनता के विशवास को यहाँ भी ठेस पहुंची  .

राजनरायण जिन्होंने रायबरेली से इंद्रा गाँधी को हराया था , गठबंधन से अलग होने के बाद जनता धर्मनिरपेक्ष पार्टी बना ली।…1979 में यानी सिर्फ 2 साल बाद ही संसद में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ जिसमें  जनता पार्टी बहुमत साबित नहीं कर पाई और सरकार गिर गयी .

1980 में फिर आम चुनाव हुए और गठबंधन की राजनीती लगातार नाकाम हुई ,  एक बार फिर से कांग्रेस को जनता ने हुकूमत बनाने का मौक़ा दिया और कांग्रेस ने 1980 के आम चुनाव में भारी जीत हासिल कर 529 संसदीय सीटों वाली पार्लियामेंट में 353 सीटें हासिल कर सरकार बना ली . 1984 में Iron lady कही जाने वाली इंद्रा गाँधी का क़त्ल कर दिया गया ,,,,या करा दिया गया  ,,,

इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद , गाँधी परिवार और कांग्रेस के लिए सहानभूति की लहर ने 1984 के आम चुनाव में जनता ने विपक्ष का सफाया करते हुए कांग्रेस को 401 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत दिया .ऐसे में मोदी जी के लम्बे जीवन की हम दुआ करते हैं ,और उनकी पार्टी को सहानुभूति नहीं बल्कि सेवाभक्ति वोट की कामना करते हैं . और किसी भी सत्ताधारी पार्टी के राणनीति कारों को सद्बुद्धि की भी प्रार्थना करते हैं .

क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन का सिलसिला नहीं रुका और 1989 के आम चुनाव में जनता दल ने 143 सीटें हासिल कीं , जबकि कांग्रेस  को 197. उस वक़्त के जनता दल के नेता वीपी सिंह ने तेलुगू देशम पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और असम गण परिषद जैसे क्षेत्रीय दलों को एक साथ लाकर राष्ट्रीय मोर्चा बनाया…इस गठबंधन को वाम मोर्चा का नाम दिया गया और भारतीय जनता पार्टी से बाहर से समर्थन मिला।…यह राष्ट्रीय मोर्चा कांग्रेस के खिलाफ सरकार बनाने में सफल तो हुआ लेकिन जल्द ही टूट भी गया  , अब गठबंधन की सरकार बीच में ही टूटने का यह तीसरा मौक़ा था , साथ ही जनता का विश्वास भी गठबंधन की राजनीती से टूट रहा था …

1991 में हुए चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला लेकिन कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी उसको 244 सीटें मिली , जबकि BJP को 120 , जनता दल को 69 , CPIM को 35 और CPI को 14 , तेलगु देसम को 13 सीटें मिली थीं  और AIADMK को 11 सीटों पर विजय हासिल हुई थी  ।

चौधरी अजीत सिंह ने अपनी राष्ट्रीय  लोक  दल पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने बाहर से समर्थन दिया , इस तरह एक बार फिर कांग्रेस नेतृत्व वाली Colition Govt . बनी नरसिम्हा राव प्रधान मंत्री बने , उन्ही के नेतृत्व में बाबरी मस्जिद को शहीद किया गया …

1996 में हुए चुनाव में बीजेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 187 सीटें हासिल की मगर बहुमत से दूर रही , लेकिन सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते 14 मई 1996 अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का मौका मिला और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानि  NDA की यह सरकार भी संसद में बहुमत साबित न कर सकी और sirf १३ दिन के बाद 27 May 1996 को गिर गयी .

अपनी नाकामियों के बावजूद गठबंधन की राजनीती का सिलसिला लगातार जारी था ,,,देवगौड़ा के नेतृत्व में जनता दल, समाजवादी पार्टी, द्रमुक पार्टी , टीडीपी, एजेपी, वाम मोर्चा जिसमें पहले ही से 4 दलों को मिलकर बना था , तमिल मनीला कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी ने मिलकर United Front की  सरकार बनाई। और Indian National Congress  ने इसे बाहर से समर्थन दिया।…

इसी बीच कांग्रेस ने सीबीआई जांच का बहाना बनाकर देवगौड़ा की सरकार से समर्थन वापस ले लिया. और देवगौड़ा सरकार गिर गयी  ..

उसके बाद I K Gujral प्रधानमंत्री बने  , लेकिन कांग्रेस ने फिर एक पंगा खड़ा किया और डीएमके को सरकार से बाहर करने की मांग की , जब मांग पूरी नहीं हुई तो उसने संयुक्त मोर्चे की सरकार से भी  समर्थन वापस ले लिया।…

1998 में लोकसभा चुनाव में BJP ने जनता दल (यूनाइटेड), AIADMK , समता पार्टी, बिजू जनता दल, शिरोमणि अकाली दाल ,राष्ट्रवादी तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, पट्टाली मक्कल काची, लोक शक्ति,  मारुमालार्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, हरियाणा विकास पार्टी,  भारतीय राष्ट्रीय लोक दल, मिजो राष्ट्रीय मोर्चा, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, मणिपुर राज्य कांग्रेस पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी को लेकर 16 अन्य दलों को साथ lekar चुनाव मैदान में उतरी .

इस चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की जीत हुई , 15 मार्च 1998 को राष्ट्रपति के आर नारायणन ने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया। 41 पार्टियों के गठबंधन के साथ बीजेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई। 17 अप्रैल 1999 को लोकसभा में विश्वासमत का प्रस्ताव रखा गया , बहस हुई और इसके बाद वोटिंग हुई। वाजपई सरकार एक वोट की वजह से गिर गई।

1999 में हुए 13 वें लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 16 दलों को साथ लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का गठन किया। इस चुनाव में एनडीए ने 299 सीटें जीत कर सरकार बनाई। बाद में एनडीए नेशन कांफ्रेंस, मिजो नेशनल फ्रंट, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट सहित कुछ अन्य दलों के जुड़ने के बाद दलों की सख्या 24 होगई . इस गठबंधन की सरकार ने गठबंधन राजनीती के चलते भारत में पहली बार पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। …

इस तरह गठबंधन की रातनीति को आप समझते चलें और आज के परिपेक्ष में उसको रखें तो मायावती और अखिलेश के बीच गठबंधन आपको याद आएगा , जबकि आज ही मायावती अपने 7 MLAs के बाघी होने से बिलबिला उठीं और उन्होंने SP के मुक़्क़ाबले BJP को समर्थन का ब्यान देदिया . यह पहली बार नहीं है जब मायावती ने BJP का समर्थन किया हो या करने का बयान दिया हो .

यहीं हम बात 2015 बिहार विधान सभा गठबधन की भी बात कर लेते हैं , जिसमें देश ने देखा किस तरह नितीश , लालू का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ आगये और सत्ता भोगते रहे , जनता के जज़्बात से नेता का कोई ताल्लुक़ नहीं होता , नितीश कुमार के इस अमल को  जनता के साथ विश्वास घात कहा गया , और वो सब कुछ कहा गया जो राजनीती में कहा जा सकता है , आज फिर बिहार चुनाव में आप देख रहे हैं की जो पार्टियां केंद्र में BJP के साथ हैं , खुद JDU वही बिहार में अलग अलग चुनाव लड़ रही हैं , तो आजकी राजनीती देश या  जनता की सेवा के लिए नहीं बल्कि सत्ता भोगने के लिए की जा रही है , इसको जनता कब समझेगी खुदा ही समझे ……

2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और राष्ट्रीय जनता दल को साथ लेकर United Progressive Alliance  यानी UPA का गठन किया इस चुनाव में  एनडीए को 181 सीटें मिलीं और विपक्षी दलों यानी UPA को 218 सीटें मिलीं। वाम मोर्चा, और  समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस को समर्थन दिया। हालांकि इन दलों का समर्थन बाहर से था, ये सरकार में शामिल नहीं हुए।…

2008 में वाम मोर्चा ने भारत और अमेरिका के मध्य हो रहे नागरिक परमाणु समझौते का विरोध करते हुए यूपीए से समर्थन वापस ले लिया ।.हालांकि उस समय यूपीए ने विश्वास मत हासिल कर लिया और सरकार बच गई।… गठबंधन सरकार में यहाँ भी भूचाल तो आया , लेकिन सरकार का क़िला बच गया और 5 वर्ष पूरे कर लिए गए ….

2009 के आम चुनाव में यूपीए को 262 सीटें मिली अकेले कांग्रेस ने 206 सीटें जीती थीं। कांग्रेस के नेतृत्व में लगातार दूसरी बार गठबंधन की सरकार ने अपना कार्यकाल शांति से पूरा किया।…जिसको सफल गठबंधन कहा जा सकता है .

2014 के चुनावों में एनडीए ने बीजेपी की अगुवाई में 336 सीटें जीतीं अकेले बीजेपी ने 282 सीटें जीतीं राष्ट्रिय स्तर पर BJP की भगवा राजनीती की यह बड़ी कामयाबी थी , जिसका सपना 100 वर्ष पूर्व देखा गया था । इस चुनाव में कांग्रेस की तारीखी हार हुई और वह 44 सीटों पर सिमट कर रह गई। यूपीए गठबंधन को सिर्फ 59 सीटें ही मिल सकीं । कांग्रेस की सीटें कम होने के कारण उस समय लोकसभा में कोई भी विपक्षी दल नहीं था । आपको बता दें इससे पहले  नेहरू काल में 1950 से लेकर 1977 तक कोई विपक्षी दल नहीं था। और कांग्रेस अकेले राज कर रही थी .

2019 के आम चुनाव में एक बार फिर NDA को 352 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत मिल गया बल्कि अकेले BJP को ही 303 सीटें मिलीं . जिसमें EVM का बड़ा रोल बताया गया और पूरे देश में उसकी चर्चा चली , जबकि 2019 में Anti incombancy और NDA की नीतियों की काफी मिखालफ़त थी .

BJP अपने NDA के सभी घटकों को खुश करने की नीति के साथ लगातार चलने की कोशिश में है , किन्तु उसके बावजूद शिवसेना और शरूमणि  अकाली दल हालिया किसान Bill पर, NDA का साथ छोड़ बाहर आगये हैं , BJP के सांसदों की संख्या इतनी बड़ी है की उसको फिलहाल किसी के जाने से फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है.

कहाँ कितनी पार्टियां

उत्तर प्रदेश43320 करोड़
दिल्ली2721.9 करोड़
तमिलनाडु1407.2 करोड़
बिहार12011 करोड़
आंध्र प्रदेश834.9 करोड़
Please follow and like us:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Scroll To Top
error

Enjoy our portal? Please spread the word :)