हूतियों के बाब अल-मंदब पर कब्ज़े के बीच अमेरिका किनारे खड़े होकर देखने को तैयार नजर आ रहा है
ईरान के साथ युद्ध के कारण दबाव में आया वॉशिंगटन शायद शिपिंग को लेकर हूतियों के आश्वासनों पर भरोसा करने के अलावा ज्यादा कुछ करने की स्थिति में नहीं है—बजाय इसके कि वह एक और युद्ध में शामिल हो।
ईरान समर्थित हूती आंदोलन द्वारा कुछ ही दिनों में हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्ज़ा किए जाने के बाद, अमेरिका के अधिकारियों ने सप्ताहांत में ओमान की राजधानी मस्कट स्थित अमेरिकी दूतावास में हूती प्रतिनिधियों से मुलाकात की।
अब रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कई द्वीप और यमन के लाल सागर तट का बड़ा हिस्सा हूतियों के नियंत्रण में है। इससे समूह ने बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है।
बाब अल-मंदब वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक मार्ग है।
बातचीत के दौरान हूतियों ने अमेरिकी अधिकारियों को भरोसा दिलाया कि लाल सागर में अमेरिकी जहाजों को निशाना बनाने का उनका कोई इरादा नहीं है। उनका कहना था कि उनकी पाबंदियां केवल सऊदी अरब से जुड़े जहाजों पर लागू होंगी।
लेकिन इसका मतलब यह भी है कि दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गंभीर व्यवधान का खतरा बना रहेगा। पिछले छह महीनों से होर्मुज़ जलडमरूमध्य में भी समुद्री यातायात प्रतिबंधित है। अगर व्यवधान और बढ़ता है तो दुनिया भर में तेल और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिससे नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक और राजनीतिक चुनौती पैदा हो सकती है।
हूतियों का इतिहास वाणिज्यिक जहाजों पर हमले करने का रहा है। इसके अलावा उनके ईरान के साथ संबंध और अमेरिका के प्रति उनका गहरा वैचारिक विरोध भी है। इसलिए कुछ विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि हूतियों के इन आश्वासनों पर आखिर कितनी दूर तक भरोसा किया जा सकता है।
हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल वॉशिंगटन के पास हूतियों की बात पर भरोसा करने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हो सकते। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर पहले से दबाव है और ईरान के साथ युद्ध को लेकर अमेरिका के भीतर बढ़ते विरोध ने भी यमन में एक और मोर्चा खोलने की क्षमता और इच्छा—दोनों को सीमित किया है।
हस्तक्षेप के लिए बढ़ता दबाव
दक्षिण-पश्चिमी यमन में हूतियों के क्षेत्र पर कब्ज़ा बढ़ने के बीच अमेरिकी प्रकाशन Axios ने रिपोर्ट किया कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पिछले सप्ताह डोनाल्ड ट्रंप को दो बार फोन किया और हूतियों के खिलाफ हवाई हमले शुरू करने का आग्रह किया। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति ने इससे इनकार कर दिया।
इसके बाद अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर तत्काल समन्वय के लिए रियाद पहुंचे और क्राउन प्रिंस के साथ बातचीत की।
इस यात्रा से संकेत मिला कि वॉशिंगटन सऊदी अरब के लिए अपना समर्थन बढ़ाना चाहता है, लेकिन सीधे सैन्य कार्रवाई में शामिल होने से बच रहा है।
ट्रंप ने रियाद को भरोसा दिलाने की भी कोशिश की। उन्होंने क्राउन प्रिंस को अपना “अच्छा दोस्त” बताया और कहा कि “सब कुछ बहुत अच्छी तरह से ठीक हो जाएगा।”
हालांकि, उन्होंने कोई विशिष्ट सैन्य प्रतिबद्धता नहीं जताई। व्हाइट हाउस की ओर से भी यह स्पष्ट गारंटी नहीं दी गई कि अमेरिका सऊदी अरब के ऊर्जा प्रतिष्ठानों या समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा के लिए सैन्य कार्रवाई करेगा।
Axios ने यह भी रिपोर्ट किया कि इजरायल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत, कतर, जॉर्डन और मिस्र के सैन्य प्रमुखों ने अमेरिका द्वारा आयोजित एक निजी बैठक में हिस्सा लिया।
जहां अमेरिका सीधे हस्तक्षेप से बच रहा है, वहीं इजरायल, जिसके जहाजों और क्षेत्र को पहले भी हूतियों ने निशाना बनाया है, ने कथित तौर पर सऊदी अरब की ओर से यमन में हस्तक्षेप करने की पेशकश की है।
हालांकि, लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर साइमन मैबन का कहना है कि इजरायल की भूमिका संभवतः सीमित ही रहेगी।
मैबन ने अल जज़ीरा से कहा कि इजरायल में चुनाव नजदीक होने के कारण एक समय ऐसा आता है, जब जरूरत से ज्यादा सैन्य हस्तक्षेप उल्टा असर डाल सकता है। गाजा, लेबनान, सीरिया और वेस्ट बैंक के अलावा ईरान को लेकर भी पहले से तनाव मौजूद है—ऐसे में यमन शायद इजरायल के लिए एक और बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सऊदी अरब शायद इजरायली सैन्य मदद पर निर्भर दिखाई देने से बचना चाहेगा। खासकर गाजा युद्ध के बीच ऐसा करना अरब और मुस्लिम दुनिया में रियाद की राजनीतिक स्थिति और वैधता को नुकसान पहुंचा सकता है।
अमेरिका से सऊदी अरब की दूरी बढ़ेगी?
वॉशिंगटन की कार्रवाई से हिचकिचाहट सऊदी अरब की अमेरिका के साथ लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा साझेदारी को लेकर चिंताओं को और बढ़ा सकती है।
साइमन मैबन के मुताबिक, यह एक और उदाहरण है कि अमेरिका सुरक्षा गारंटर के रूप में अपनी भूमिका पूरी करने में नाकाम रहा है। उनके अनुसार, ऐसी घटनाएं धीरे-धीरे जमा होती जाएंगी और सऊदी अरब में यह सवाल गंभीर हो सकता है कि क्या वह सुरक्षा के लिए अमेरिका पर भरोसा कर सकता है।
सऊदी अरब ने 2018 और 2019 में अपने तेल प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों के बाद अपनी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाने की कोशिश शुरू की थी। इन हमलों ने अमेरिकी सुरक्षा गारंटी की सीमाओं को उजागर किया था।
इसके बाद पिछले सितंबर में रियाद ने पाकिस्तान के साथ पारस्परिक रक्षा समझौता किया। इसके तहत दोनों में से किसी एक देश पर हमला होने को दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।
पिछले महीने सऊदी अरब ने इस उभरती सुरक्षा व्यवस्था को और विस्तार देते हुए पाकिस्तान और तुर्किये के साथ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता किया। इसके तहत तीनों में से किसी भी देश पर सशस्त्र हमला होने को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
हालांकि, मैबन का कहना है कि मौजूदा संकट से सऊदी अरब और अमेरिका के संबंधों में पूरी तरह से टूट की संभावना कम है, लेकिन इससे रियाद को अन्य देशों के साथ अपने सुरक्षा और रणनीतिक संबंध और मजबूत करने की कोशिश तेज करने का प्रोत्साहन जरूर मिल सकता है।
उन्होंने कहा, “हम पहले ही सुरक्षा साझेदारियों में विविधता की प्रक्रिया देख रहे हैं। सऊदी अरब को अब यह विश्वास होने लगा है कि वह हर समय अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता। यही वजह है कि हमने तुर्किये और पाकिस्तान के साथ समझौते होते देखे हैं।”
अमेरिका इससे दूर क्यों रहना चाहता है?
वॉशिंगटन पहले से ही ईरान के साथ एक महंगे और बड़े सैन्य संसाधनों की मांग करने वाले युद्ध में उलझा हुआ है। ईरान हूतियों का प्रमुख क्षेत्रीय समर्थक है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संघर्ष की शुरुआत यह उम्मीद करते हुए की थी कि यह कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएगा। लेकिन छह महीने से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी युद्ध का कोई स्पष्ट अंत नजर नहीं आया है। तेल की कीमतें बढ़ चुकी हैं और अमेरिकी प्रशासन ने अभी तक युद्ध समाप्त करने की कोई स्पष्ट रणनीति पेश नहीं की है।
ऐसे में यमन में एक और सैन्य मोर्चा खोलना उसी अनुभव को दोहराने का जोखिम पैदा कर सकता है, और वह भी ऐसे समय में जब ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक परिस्थितियां बेहद महत्वपूर्ण हैं।
यमन में एक नया सैन्य अभियान अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और सीनेट के बेहद करीबी मुकाबलों को प्रभावित कर सकता है। खास तौर पर इसलिए क्योंकि ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति चुनाव अभियान में अमेरिका को “हमेशा चलने वाले युद्धों” (Forever Wars) से बाहर निकालने का वादा किया था।
पिछले महीने प्रकाशित Reuters/Ipsos सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 31 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया, जबकि मार्च में यह आंकड़ा 37 प्रतिशत था। वहीं, 83 प्रतिशत लोगों ने माना कि यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रह सकता है।
साइमन मैबन ने कहा, “नवंबर में होने वाले चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हैं। रिपब्लिकन इस पूरे मामले को लेकर चिंतित होंगे। ऐसे युद्ध में एक नया मोर्चा खोलना, जो आगे चलकर एक और ‘फॉरएवर वॉर’ बन सकता है, बेहद अलोकप्रिय साबित हो सकता है।”

