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वोट बटोरने की कला ,मदारीपन और संवैधानिक ज़िम्मेदारी

Ali Aadil khan

Ali Aadil Khan Editor's Desk

देश के पांच राज्यों में चुनावी गहमा गहमी ज़ोरों पर है ,हरेक पार्टी व प्रत्याशी अपने ढंग से मतदाताओं को लुभाने की कोशिश में मसरूफ है . कोई अपने सत्ता काल में किये गए कामों का बखान कर रहा है तो कोई ,प्रदेश की बदहाली को गिना रहा है और कोई बन्दर का नाच दिखाने वाले मदारी की तरह डुगडुगी बजाकर जनता को मंत्रमुग्ध करने में विलीन है और वो कौन है जनता सब जानती है।

मगर यहाँ एक सवाल पैदा होता है चुनाव के दौरान पार्टियों या नेताओं को जनता का वोट हासिल करने के लिए इस क़दर जद्दो जिहाद क्यों करनी पड़ती है ?नेता का काम सेवा है और सेवा जग ज़ाहिर होती है खुद बोलती है ,उसमें किसी को कहने की ज़रुरत नहीं या भीक मांगने की ज़रुरत नहीं होती ,अगर किसी की सेवा को जनता recognise नहीं करती तो यह ज़िम्मेदार नागरिक होने के साथ खिलवाड़ है और अगर स्वार्थ के साथ वोट की कीमत लगाई जाती है तो यह सियासी गुनाह है।

अजब नहीं लगता आपको उस वक़्त जब प्रचार के लिए स्टार्स प्रचारकों को उतार जा रहा हो ,तो कहीं सांप्रदायिक और धुर्वीकरण का माहौल बनाकर लोकतंत्र और संविधान की एक आँख को फोड़ा जारहा है ,आपको याद होगा सर सय्यद ने कहा था की भारत के हिन्दू मुसलमान दो आँखों की तरह हैं जिनमें से किसी एक को फोड़ देने से चेहरा बेरौनक और दृष्टि अधूरी होजाती है। यानी कितना विचित्र होगया है हमारा चुनावी माहौल ।सेवा ,सच्चाई , संयम , और ईमानदारी से बहुत परे चला गया है हमारा चुनावी खेल , ऐसे में सबसे मुख्य बात यह है की हमारी सियासी जमातों , नेताओं और वोटर की संवैधानिक ज़िम्मेदारी क्या है ? इस सम्बन्ध में इलेक्शन कमीशन काफी हद तक जनता और राजनेताओं पर लगाम कसने के साथ उनकी संवैधानिक ज़िम्मेदारियों को समझाने के लिए जन चेतना अभियान चला रहा है और प्रशासन को भी सतर्क किया गया है परंतु उसके बाद भी धरातल पर असंवेधानिक और दबंगई का चलन हमको देखने को मिला ।

हालिया दिनों में माननीय सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संवैधानिक पीठ के एक अहम फैसले की मिसाल से काफी कुछ समझ जा सकता है , जिसमें कहा गया है ” प्रत्याशी या उसके समर्थकों के द्वारा धर्म, जाति, समुदाय, भाषा के नाम पर वोट मांगना गैरकानूनी है. चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है. अथवा इस आधार पर वोट मांगना संविधान की भावना के खिलाफ है.” ऐसे में जन प्रतिनिधियों को भी अपने कामकाज धर्मनिरपेक्ष आधार पर ही करना चाहिए।।

इस सबके साथ यूपी चुनाव अपने आप में हमेशा से ही जनता के आकर्षण का केंद्र रहा है ।और इस बार राज्ये में त्रिकोणीय चुनाव के बीच में एक सियासी गठजोड़ को नज़र अंदाज़ नहीं किया जासकता जिसमें पीस पार्टी ,निषाद पार्टी और अपना दल (कृष्णा) शामिल हैं।प्रधान मंत्री जी का हेलीकाप्टर बहराइच में रैली को संबोधित करने हेतु इसलिए नहीं उतर की वहां भीड़ इकठ्ठा नहीं हो पाई थी अगर भीड़ देखकर ही हैलीकॉप्टर उतरता और चढ़ता है तो इस गठबंधन के प्रोग्रामों में अच्छी खासी भीड़ इस बात का सुबूत है कि यह गठबंधन भले ही किंग मेकर न बन सके लेकिन किंग मेकर्स के समीकरण को बदलने कि शक्ति रखता है ।ऐसे में वोट बटोरने की कला , कुछ बड़े नेताओं का मदारीपन और संवैधानिक ज़िम्मेदारियों का आंकलन बहुत ज़रूरी है ।जो हमारे वोटर अच्छी तरह कर सकते हैं ।Editor ‘s desk

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