उन्होंने बताया कि प्रो. सिद्दीकी का शोध बदलती मौसमी परिस्थितियों और उनके पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उनके शोध से शुष्क क्षेत्रों में कृषि और जल-पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने की संभावनाओं को समझने में मदद मिलेगी। यह अध्ययन भविष्य की कृषि योजनाओं और पर्यावरण संरक्षण की रणनीतियां तैयार करने में भी उपयोगी हो सकता है।
प्रो. सिद्दीकी सम्मेलन में ‘भारत के पश्चिमी राजस्थान के शुष्क क्षेत्र में मौसमी जल-पारिस्थितिकीय दशाओं और वनस्पति में महत्वपूर्ण बदलाव’ विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे। इसमें भूमि की सतह के तापमान, निर्मित क्षेत्रों के विस्तार और वनस्पति आवरण में हाल के वर्षों में हुए परिवर्तनों का विश्लेषण किया गया है।
शोध में मानसून से पहले और उसके बाद मरुस्थलीय क्षेत्रों में नमी की स्थिति में होने वाले बदलावों का भी अध्ययन किया गया है। इसके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि बदलती मानसूनी परिस्थितियां और नमी का वितरण शुष्क क्षेत्रों के पर्यावरण तथा कृषि को किस प्रकार प्रभावित कर रहे हैं।
पश्चिमी राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता, वनस्पति और भूमि की स्थिति कृषि उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में मौसमी बदलावों और नमी की स्थिति का अध्ययन भविष्य की कृषि योजनाओं को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है। खाद्य और पशुचारे की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए यह शोध शुष्क क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग की संभावनाओं को भी सामने लाता है।
सम्मेलन के दौरान प्रो. सिद्दीकी फोरमाइल क्रीक, पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्रों की गतिविधियों और पाइक्स पीक से कैनन सिटी तक आयोजित क्षेत्रीय अध्ययन यात्रा में भी भाग लेंगे। इन गतिविधियों के माध्यम से उन्हें पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्रों और उनसे जुड़ी भौगोलिक प्रक्रियाओं का प्रत्यक्ष अध्ययन करने का अवसर मिलेगा।
प्रो. सिद्दीकी जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका के जियोआर्कियोलॉजी अनुभाग के सदस्य भी हैं। इससे पहले वह अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के अनाहाइम में आयोजित संस्था की बैठक में भाग ले चुके हैं।
उनका शोध मुख्य रूप से चरम मौसमी घटनाओं, नमी की स्थिति में बदलाव, मरुस्थलीय क्षेत्रों में वनस्पति आवरण के परिवर्तन और बदलती मानसूनी परिस्थितियों के कृषि एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर केंद्रित है। डेनवर में होने वाले सम्मेलन में उनकी भागीदारी से पश्चिमी राजस्थान के शुष्क पर्यावरण से जुड़े शोध को अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।

