तेल की कीमतों में उछाल, 83 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल
होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ी चिंता, ईरान के प्रस्ताव से अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 83 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड भी करीब 79 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है।
उपलब्ध बाजार आंकड़ों के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स में करीब 99 सेंट यानी 1.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और इसकी कीमत बढ़कर 83.48 डॉलर प्रति बैरल हो गई। वहीं अमेरिकी West Texas Intermediate यानी WTI क्रूड में 85 सेंट यानी करीब 1.1 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई और इसकी कीमत 78.84 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य बना चिंता की बड़ी वजह
तेल की कीमतों में इस तेजी की सबसे बड़ी वजहों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ यानी होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ों की आवाजाही को लेकर बढ़ती चिंता है।
ईरान ने ओमान के साथ समन्वय करते हुए कथित तौर पर ऐसा प्रस्ताव रखा है कि उन देशों के जहाज़ों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने की अनुमति न दी जाए जिन्हें तेहरान “दुश्मन” या “शत्रुतापूर्ण” मानता है। इसके साथ ही नियमों का उल्लंघन करने वाले जहाज़ों पर भारी जुर्माना लगाने की बात भी सामने आई है।
यही खबर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के लिए चिंता का कारण बन गई है।
इतना महत्वपूर्ण क्यों है होर्मुज़?
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। फारस की खाड़ी से निकलने वाला बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद इसी समुद्री रास्ते से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचते हैं।
इसलिए अगर यहां जहाज़ों की आवाजाही बाधित होती है, तो इसका असर सिर्फ ईरान और खाड़ी के देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एशिया, यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में तेल की सप्लाई और कीमतों पर भी पड़ सकता है।
बाजार में ऐसी आशंका पैदा होते ही निवेशक भविष्य में तेल की संभावित कमी को लेकर कीमतें बढ़ाना शुरू कर देते हैं। यही वजह है कि होर्मुज़ को लेकर बढ़ता तनाव अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में तुरंत दिखाई देता है।
भारत समेत कई देशों पर पड़ सकता है असर
तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है तो इसका असर उन देशों पर पड़ सकता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करते हैं।
भारत भी दुनिया के बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर भारत के आयात बिल, रुपये की विनिमय दर और आगे चलकर पेट्रोल-डीज़ल तथा परिवहन लागत पर पड़ सकता है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों का घरेलू ईंधन कीमतों पर असर कई दूसरे कारकों—जैसे टैक्स, रिफाइनिंग लागत, डॉलर-रुपया विनिमय दर और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति—पर भी निर्भर करता है।
चिंता सिर्फ 83 डॉलर की कीमत नहीं
विश्लेषकों के लिए चिंता केवल यह नहीं है कि ब्रेंट क्रूड 83 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया है। असली सवाल यह है कि अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव और बढ़ा तो तेल की कीमतें कहां तक जा सकती हैं?
अगर जहाज़ों की आवाजाही वास्तव में बड़े पैमाने पर प्रभावित होती है या तेल की सप्लाई में रुकावट आती है, तो बाजार में कीमतों में और तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
यानी फिलहाल तेल बाजार में जो तेजी दिखाई दे रही है, वह सिर्फ मांग और आपूर्ति का मामला नहीं है। इसके पीछे भूराजनीतिक तनाव, समुद्री सुरक्षा और मध्य-पूर्व की बदलती रणनीतिक स्थिति भी बड़ी भूमिका निभा रही है।
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव कितना बढ़ता है—क्योंकि वहां की हलचल सीधे दुनिया की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

