नई दिल्ली, 09 सितंबर । उच्चतम न्यायालय ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध के दायरे में लाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इस मामले को महिलाओं के अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपराधिक कानून से जुड़े बड़े संवैधानिक सवाल के रूप में देखा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि संविधान के अलग-अलग हिस्सों में देखकर नहीं समझा जा सकता है। जब अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की बात होती है, तो उसका असर अनुच्छेद 20 के तहत मिलने वाले कानूनी संरक्षण पर भी पड़ता है। मामले पर अगली सुनवाई अब तीन हफ्ते बाद होगी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि शादी से किसी महिला की व्यक्तिगत आजादी खत्म नहीं हो सकती, लेकिन शादी के अंदर दुष्कर्म के लिए मुकदमा चलाने की इजाजत देने से पहले कोर्ट को भारतीय न्याय संहिता के तहत मौजूदा कानूनी अपवाद पर भी ध्यान देना होगा। कोर्ट ने कहा कि वह दो सवालों पर विचार करेगा। पहला कि क्या वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़ी छूट के बावजूद मुकदमा चलाया जा सकता है और दूसरा कि क्या यह छूट खुद संवैधानिक रूप से वैध है।
बुधवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने इससे जुड़े मामलों में अपना जवाब दाखिल किया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से नोडल वकील इन सभी दस्तावेजों और दलीलों को एकत्र कर एक सेट तैयार करेंगे और आपस में आदान-प्रदान करेंगे।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 11 मई, 2022 को वैवाहिक दुष्कर्म के मामले पर विभाजित फैसला दिया था। जस्टिस राजीव शकधर ने जहां भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद को असंवैधानिक करार दिया था, वहीं जस्टिस सी हरिशंकर ने इसे सही करार दिया है। अब उच्चतम न्यायालय इस मामले पर सुनवाई कर रहा है।

