कपिल बर्मन
(जागृत भारत)
सत्ता को दिमागी पैदल चाहिए, दिमागी नक्सल नहीं :लाठियों से विचार नहीं मरते
आंसू गैस प्रश्नों को नहीं बुझा सकती और लाठियाँ विचारों को नहीं मार सकतीं
नक्सल तो कभी भी किसी को नहीं चाहियें अब चाहे वो दिमाग़ी पैदल ही क्यों न हों, कम से कम हमको तो नहीं चाहिए. लोकतंत्र में नागरिक का काम केवल चुनाव के दिन वोट डालना नहीं है। एक जीवंत संसदीय लोकतंत्र में नागरिक लगातार सरकार से सवाल करता है, नीतियों की समीक्षा करता है, अपने अधिकारों की मांग करता है और सत्ता से जवाबदेही सुनिश्चित करता है। यही सवाल लोकतंत्र की असली ताकत हैं। लेकिन जब सत्ता सवालों को असहमति नहीं, बल्कि अपराध या राष्ट्रविरोध समझने लगे, तब लोकतंत्र के सामने गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है, सत्ता सवालों से घबराती है
किसान अपनी नीतिगत मांगों और अधिकारों को लेकर आंदोलन करे तो उसे अलगाववादी या खालिस्तानी कह देना, दलित और वंचित समुदाय समानता तथा न्याय की मांग करें तो उन पर राष्ट्रविरोधी होने के आरोप लगाना, और विद्यार्थी शिक्षा, रोजगार तथा परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाएँ तो उन्हें किसी अपमानजनक राजनीतिक विशेषण से संबोधित करना – क्या यही लोकतांत्रिक शासन की भाषा होनी चाहिए?
यहाँ एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है। सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं होती। सत्ता से सवाल करना राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी है।
सवाल करने वाला युवा ही लोकतंत्र की उम्मीद है
आज की Gen-Z और Gen-Alpha पीढ़ी को केवल अनुयायी समझना एक गंभीर भूल होगी। यह वह पीढ़ी है जो इंटरनेट, वैश्विक सूचनाओं और आधुनिक शिक्षा के माध्यम से दुनिया को करीब से देख रही है। वह पूछती है – सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता कैसी है? रोजगार कहाँ हैं? प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता क्यों नहीं है? स्वास्थ्य सुविधाएँ सब तक क्यों नहीं पहुँचतीं? सार्वजनिक धन का उपयोग कहाँ और कैसे हो रहा है? इन सवालों को दबाने के बजाय उनके उत्तर देने चाहिए
यदि कोई विद्यार्थी कल डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, न्यायाधीश या प्रशासक बनने वाला है, तो उसकी आलोचनात्मक सोच को लोकतंत्र की संपत्ति माना जाना चाहिए। देश को दिमागी पैदल नहीं, विवेकशील नागरिक चाहिए।
कल के नागरिकों को आज ही चुप करा देंगे?
भारत का लोकतांत्रिक इतिहास हमें इसके उलट रास्ता दिखाता है। स्वतंत्रता आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन का आंदोलन नहीं था; वह नागरिक अधिकारों, प्रतिनिधित्व और स्वशासन की मांग भी था। महात्मा गांधी ने असहमति और अहिंसक प्रतिरोध को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाया। डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से नागरिक स्वतंत्रता, समानता और संवैधानिक शासन की नींव मजबूत की।
आंबेडकर का लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं था। उनके लिए लोकतंत्र स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित सामाजिक जीवन-पद्धति था। इसलिए लोकतंत्र में असहमति का स्थान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सहमति का।
Gen-Z और Gen-Alpha की नई हुंकार
हाल के युवा आंदोलनों ने यह संकेत दिया है कि नई पीढ़ी केवल जाति और धर्म की राजनीति में अपना भविष्य नहीं देखना चाहती। वह शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, पारदर्शिता और सामाजिक सुरक्षा जैसे वास्तविक मुद्दों पर चर्चा चाहती है।
युवाओं की सड़कों पर मौजूदगी को कमजोरी समझना सत्ता की भूल होगी। शांतिपूर्ण ढंग से सवाल पूछने वाला विद्यार्थी पुलिस की लाठी से डर सकता है, लेकिन उसका सवाल समाप्त नहीं होता। एक छात्र की आवाज दबाने से हजारों दूसरे छात्रों के प्रश्न समाप्त नहीं होते। आंसू गैस प्रश्नों को नहीं बुझा सकती और लाठियाँ विचारों को नहीं मार सकतीं।
सत्ता को विरोधी नहीं, जागरूक नागरिक चाहिए
लोकतंत्र में सरकारें स्थायी नहीं होतीं, लेकिन संविधान स्थायी आधार प्रदान करता है। इसलिए किसी भी सरकार के लिए जरूरी है कि वह आलोचना को दुश्मनी न समझे।देश की जनता को पाँच किलो अनाज, धार्मिक आयोजनों की भीड़ या भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, न्याय और सम्मान चाहिए। विकसित भारत का निर्माण ऐसे नागरिक करेंगे जो तर्क कर सकें, सवाल पूछ सकें और गलत को गलत कहने का साहस रखते हों। इसलिए आज सवाल किसी एक दल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का है .
क्या सत्ता को दिमागी पैदल चाहिए या दिमागी नागरिक?
यदि भारत को वास्तव में विश्वगुरु बनना है, तो उसे अपने युवाओं की बुद्धि से डरना नहीं, बल्कि उस बुद्धि पर भरोसा करना होगा। क्योंकि जिस देश के युवा सवाल करना छोड़ देते हैं, वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल चुनावी रस्म बन जाता है। और जिस देश के युवा सवाल पूछते रहते हैं, वहाँ सत्ता को जवाब देना ही पड़ता है।

