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सत्य निकेतन का सच, मौत की बिल्डिंग से निकला जिन्न?

सत्य निकेतन का सच

सत्य निकेतन का सच

Ali Aadil Khan Editor’s Desk

सत्य निकेतन की घटना ने दिल्ली में ज़बरदस्त हलचल मचा दी है , पांच मंज़िला PG की इमारत के मलबे से सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं निकले…निकला है बेहिसी, मोह माया और लालच का जनाज़ा …..और निकला है दिल्ली सरकार के सिस्टम के failure का वो सच, जो पहले भी बार बार सामने आता रहा है ।

आठ ज़िंदगियां खत्म हो गईं। कई परिवारों के सपने मलबे में दब गए। इसके बाद सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इमारत किसकी ला पर्वाही से गिरी ?

सवाल यह है कि जिस इमारत में छात्र रह रहे थे, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? BUILDING मालिक की? MCD की? दिल्ली सरकार की? या उस पूरे सिस्टम की, जो हादसा होने के बाद जागता है?

सत्य निकेतन की इस पांच मंज़िला PG इमारत के गिरने के बाद शुरुआती जांच में कई और गंभीर सवाल सामने आए हैं।
MCD की जांच में सामने आया कि इमारत के पास sanctioned building plan नहीं था, basement में unauthorized construction हो रहा था और Fire NOC भी नहीं थी।

यह भी सामने आया कि इमारत को मूल रूप से सीमित मंज़िलों के लिए मंजूरी मिली थी, लेकिन बाद में और मंज़िल बढ़ा दी गईं ।

इतने बड़े और भयानक हादसे के बाद इन्तहाई शर्मनाक बात यह रही कि इस HighTech दौर में cement और सरिया की पूरी की पूरी छत जो छात्रों के ऊपर पड़ी हुई थीं उनको काटने के लिए NDRF छेनी और हथोङे का इस्तेमाल कर रही थी यानी जो काम TECHNOLOGY से 30 मिनट में हो सकता था उसको 3 से 5 घंटे में पूरा किया गया. मलबे में दबे छात्रों को बचाने का समय था लेकिन 50 साल पुराने मेथड से मलबा हटाया जा रहा था जिसमें बहुत समय लगा.

एक पिलर की ईमारत में जब मरम्मत का काम हो रहा था उस वक़्त के लिए स्टूडेंट्स दूसरी जगह शिफ्ट किया जाना था. लोग पूछ रहे हैं सिर्फ एक इमारत के देह जाने पर 27 घंटे का rescue Operation चला.

जैसा हमारा System है इसके चलते अगर खुदा न खुआसता बड़े पैमाने का भूकंप दिल्ली और NCR में आगया और लाखों माकन ढह जाने के बाद सोचो क्या मंज़र होगा. रब अपना करम रखे, सरकारें सब कुछ जनता पर छोड़ देंगी. और इस जुमले को याद भी रखा जाये वैसे रिकॉर्ड में तो रहेगा ही .

हादसे के बाद MCD ने पांच अधिकारियों को suspend किया। इसमें Deputy Commissioner से लेकर engineering और building department के अधिकारी शामिल हैं। लेकिन यहां एक और बेहद अहम सवाल है—क्या suspension ही accountability है? अगर कोई इमारत वर्षों तक नियमों को तोड़कर चलती रही…तो क्या जिम्मेदारी सिर्फ हादसे के बाद suspension तक सीमित रहनी चाहिए?

या फिर लापरवाही की chain कहां से शुरू हुई और कहां तक गई यह भी जांचना ज़रूरी होगा ?

और अब इस पूरे मामले में अदालत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। दिल्ली High Court ने PG और hostel accommodations की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने अपने मौखिक बयान में साफ संकेत दिया कि जिम्मेदारी सिर्फ मकान मालिक तक सीमित नहीं हो सकती। MCD और Delhi University प्रशासन की जवाबदेही तय की जायेगी ।

Court ने दिल्ली में PG और hostels के audit के साथ कई और निर्देश दिये है और यह जांचने को कहा है कि इन इमारतों में permissions, building bye-laws और रहने वाले छात्रों की संख्या जैसे नियमों का पालन हो रहा है या नहीं।

यानी अदालत का सवाल बिल्कुल साफ़ है—अगर हजारों छात्र Private PG में रह रहे हैं, तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ मकान मालिक की कैसे हो सकती है? क्योंकि छात्र कोई सामान तो नहीं हैं…वे दिल्ली के colleges और universities में पढ़ने आए युवा हैं। उनके माता-पिता बड़ी उम्मीदों और भरोसे के साथ उन्हें पढ़ने के लिए भेजते हैं…उन्हें क्या मालूम कि जिस कमरे में उनका बच्चा रहता है—बिल्डिंग में आग लगने या ढह जाने के बाद वही कमरा उसकी चिता या कब्र बन जाएगा।

यहां एक और बड़ा सवाल है—छात्र private PG में जाने को मजबूर क्यों हैं? दिल्ली विश्वविद्यालय और दूसरे Educational institutions में बाहर से आने वाले students की तादाद लगातार बढ़ी है। लेकिन hostel accommodation Limited हैं , कौन जवाब देगा? मकान मालिक ? नहीं !!! कॉलेज Administration इसका ज़िम्मेदार है /

DU के अकेले साउथ कैंपस में 7 COLLEGES में 22,000 STUDENTS में से लगभग आधे छात्र दिल्ली के बाहर के पढ़ते हैं. सिर्फ 2 COLLEGES वेंकटेश्वर और मैत्रयी कॉलेज में हॉस्टल की सहूलत है और उसमें भी सिर्फ 202 BEDS की AVAILIBILITY है . DU में कुल 90 COLLEGES हैं, और इनमें 4 लाख से अधिक रेगुलर छात्र पढ़ते हैं, और सिर्फ 20 COLLEGES में ही HOSTEL की सुविधा है. बाक़ी 70 Colleges के बच्चे कहाँ जाकर रहेंगे. प्रशासन का जवाब हो सकता है Admission न कराएं , अपने शहरों में पढ़ाएं ,,,,,तो इसका जवाब है अगर छोटे शहरों में कॉलेजेस होते या उनमें सुविधाएँ या पढाई का standard होता तो बच्चों को दिल्ली क्यों भेजा जाता. कुल मिलाकर छात्रों के प्रति सभी सरकारों की उदासीनता देखने को मिली है लेकिन हालिया सरकार में छात्रों के साथ issues आये इससे पहले कभी नहीं आये.

कॉलेज में hostels न होने की वजह से छात्र private PG, Rented rooms और छोटे-छोटे accommodations की तरफ जाते हैं। और यहीं से पैदा होता है—सुरक्षा बनाम affordability का सवाल। student को सस्ता कमरा चाहिए,College के पास चाहिए, और मकान मालिक को ज्यादा से ज्यादा किराएदार और किराया चाहिए।

लेकिन इस पूरी Equation में सबसे पीछे चली जाती है छात्र की सुरक्षा। हमाारे युवाओं को आसमान की बुलंदियों से मलबे के नीचे लाने वाली, और पैसा इकठ्ठा करने की वो होड़ जिसमें इंसान और इंसानियत दोनों को दफ़न किया जा रहा है इस सोच को परखना होगा.

और अब यह मामला सत्य निकेतन से निकलकर देश की सर्वोच्च अदालत पहुँच गया, सुप्रीम कोर्ट में PGs, private hostels और student accommodations की safety audit का मुद्दा उठाया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Supreme Court ने संकेत दिया है …. जरूरत पड़ने पर देशभर के लिए safety guidelines बनाई जा सकती हैं। इसके लिए दिल्ली सर्कार ने पहल करदी है , और ३ दिन से दिल्ली में इललीगल इमारतों पर हथोड़ा चल रहा है.

शिक्षा नीति के चलते NCERT की किताबों में हिन्दू देवी देवताओं और हिन्दू सम्राटों की कहानियां जोड़ने से पहले हमारी सरकारों को हिन्दुस्तानी नस्ल और कम से कम हिन्दू युवाओं की आला तालीमों तरबियत और उनकी सामाजिक सुरक्षा के साथ जान माल की हिफाज़त की ज़िम्मेदारी तो लेनी ही चाहिए, और अब्दुल के बच्चे को भले अभी puncture ही बनाने दिया जाए. मगर जो संस्थाएं अब्दुल को पढ़ाना चाहें तब उनके साथ छेड़ छाड़ नहीं की जानी चाहिए.

आज MUNICIPLE CORPORATION से लेकर केंद्र तक BJP की सरकार है। इसलिए प्रशासनिक और राजनीतिक accountability का सवाल भी बीजेपी से पूछा जाएगा। और उसको इन तमाम हालात के लिए ज़िम्मेदारी लेनी होगी आइंदा कांग्रेस की सरकार होगी तो उससे भी इसी शिद्दत के साथ सवाल पूछे जायेंगे . और सवालों का सिलसिला लोकतंत्र का सामान्य नियम है, और मीडिया की ज़िम्मेदारी ।

लेकिन यहां एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए कि राजनीतिक जिम्मेदारी और कानूनी दोष एक ही चीज़ नहीं हैं।
किसी सरकार के कार्यकाल में हादसा होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सरकार या कोई मंत्री कानूनी रूप से दोषी है। क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक की भी बड़ी ज़िम्मेदारी है. जिसको भारत का नागरिक ठीक से नहीं निभा पा रहा है.

सरकार से यह भी पूछा जाएगा नए भारत में TECHNOLOGICAL ADVANCEMENT का ढंढोरा और विश्वगुरु का सपने का छलावा क्यों दिखाया जाता है? बक़ौल प्रधानमंत्री मोदी के “बादलों की आड़ लेकर दुश्मन के रडार (Radar) से पूरी तरह बचना संभव है, थाली और ताली से covid जैसी महामारी को भगाया जा सकता है, गंदे नाले की गैस से चाय बन सकती है,पकोड़े तले जा सकते हैं.

तो ऐसे विकसित नए भारत की सरकार में यह पता लगाना संभव क्यों नहीं हो पाया? बिल्डिंग गिरने से पहले उसकी जांच में पता लगाया जा सके कितनी मज़बूत है? कितने दिन और टिक सकती है? बिल्डिंग में आग की चिंगारी स्पार्क होने से पहले FIRE SAFETY यंत्र उसको बुझा देगा ??

कुल मिलाकर मंत्रियों , मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री और दीगर VVIP और VIPs की सेफ्टी सिक्योरिटी में सरकार पूरी चाक चौबंद है और होनी भी चाहिए मगर इसपर करोड़ों रुपया रोज़ाना उसी जनता का ही खर्च होता है जिस जनता को फ़र्ज़ी आत्मनिर्भर बनाकर छोड़ दिया है मरने के लिए.

और सबसे गंभीर बात यह है कि यह दिल्ली में पहली ऐसी घटना नहीं है। सत्य निकेतन में ही 2022 में Renovation के दौरान एक दूसरी building collapse हुई थी, जिसमें दो मजदूरों की मौत हुई थी। अगर चार साल बाद उसी इलाके में फिर मौत की इमारत गिरती है तो क्या सिर्फ मालिक को गिरफ्तार करके सब चंगा हो जाएगा ??

यानी सवाल सिर्फ एक ईमारत का नहीं बल्कि दिल्ली में हालिया महीनों में होने वाली पिछली दुर्घटनाओं से हमने क्या सीखा? सवाल यह है !! सिर्फ दो चार अफसरों का SUSPENSION , हल्का फुल्का मुआवज़ा, और नेताओं का रटा रटाया ब्यान दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, हालांकि दोषियों के गलों में नेताओं को मालाएं डालते हुए इसी जनता ने देखा है.

भले दिल्ली में illegal इमारतों पर सरकार का हथोड़ा चलना शुरू हो गया है लेकिन आपको नज़र इस बात पर रखनी है कि जिन buildings पर हथोड़ा चल रहा है उनमें काटने सरकार के किसी भी दर्जे में कितना क़रीब है. आप इस बात पर भी नज़र रखिये कि दिल्ली को संवारने के नाम पर कितने और कोनसे परिवारों को उजाड़ा जा रहा है.

Illegal तरीके से पहले रिश्वतें लेकर लोगों को बसाना फिर विकास के नाम पर बस्तियों को उजाड़ना Good Governance नहीं है , बल्कि लोगों को अनाधिकृत तरीके से बसने न देना, लेकिन हर नागरिक के राशन , शिक्षा , स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना सरकार की पहली ज़िम्मेदारी है. हादसा होने से पहले खतरे को पहचान लेना, कुदरती और आसमानी आफतों के आने से पहले रब को मना लेना, यह Good गवर्नेंस कहलाएगा .

सत्य निकेतन के मलबे में सिर्फ आठ लोगों की जिंदगी नहीं दबी…वहां कई सवाल भी दबे हैं क्या स्मार्ट सिटी का झूठा वादा करने वाले SMART PG और HOSTELS का सच्चा वादा करने की हिम्मत जुटा सकते हैं ? और दिल्ली के तमाम PGs का अभी तक safety audit क्यों नहीं हुआ है? अगर हजारों छात्र private accommodation में रह रहे हैं तो उनका safety database क्यों नहीं?

हद तो यह है की अभी तक हादसे वाली बिल्डिंग में कितने छात्र थे इसका सही आंकड़ा सामने नहीं आपाया है. जब दिल्ली में illegal construction हो रहा था …तब Concern Agencies कहाँ थीं ?

आज जो परिवार अपने बच्चों को खो चुके हैं। उनको कोई safety audit वापस तो नहीं ला सकता, और आइंदा भी व्यवस्था में सुधार को सुनिश्चित कर पाना सरकार के लिए चुनौती भरा काम है।

लेकिन अगर इस हादसे के बाद भी व्यवस्था नहीं बदली…तो अगली बार मलबे से सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं निकलेंगे—
फिर किसी मां का बेटा निकलेगा, किसी पिता का सपना निकलेगा और फिर हम कैमरे लेकर पूछेंगे, गलती किसकी थी? हादसे के लिए कौन ज़िम्मेदार है?

इसलिए अब सवाल हादसे के बाद जिम्मेदार तलाशने का नहीं है। सवाल है अगला सत्य निकेतन होने से पहले सिस्टम जागेगा या नहीं? क्योंकि—Good Governance ज़बानी जुमलों का नाम नहीं और हादसे के बाद जिम्मेदार तलाशने का नाम भी नहीं बल्कि हादसा होने से पहले खतरे को पहचानना और उसको दूर करना Good Governance है।

बस चुनाव भी आने ही वाले हैं सांप्रदायिक माहौल बनने लगा है मस्जिदें और मदरसे फिर से गिराए जाने लगे हैं कहीं भावनाएं आहत होंगी कहीं भड़काई जाएंगी और बस आपका मूड फ्रेश और हो सकता है आपमें से कई का मूड खराब भी हो जाए लेकिन उनको इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता!!!! फ़र्क़ पड़ता है तो मरने वालों के परिवारों या प्रभावित परिवारों पर. रब हर तरह के नुकसान और ग़म से पूरी इंसानियत की हिफाज़त फरमाए और सब्र अता करे.

बड़े सलीक़े से अपने लबों को खोलेंगे – जहाँ कोई नहीं बोलता वहीँ बोलेंगे
यक़ीनन उड़ान देगा यह आसमाँ वाला – हम तो सिर्फ अपने परों को खोलेंगे

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