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रहबर बनाया जिस को वही लूटने लगा

सलाम हैरत
ग़ज़ल
हालात क्या बताऊँ मैं उजड़े दयार के।
नामो निशां भी मिटने लगे अब मज़ार के।।
मौक़े तो ज़िन्दगी में कई यादगार हैं।
लम्हे न भूल पाया तेरे इन्तिज़ार के।।
रहबर बनाया जिस को वही लूटने लगा।
क़ाबिल बचा न कोई यहाँ ऐतबार के।।
इक जंग सी हुई थी जहां आँख आँख में।
लौटे हैं उस गली से ही हम दिल को हार के।।
दिल ने कहा के अपनी हक़ीकत भी तो जिऊं।
चहरा अभी अभी ही रखा है उतार के।।
हाकिम उतर न पाए कभी वादों पर खरे।
मज़मून ही बदलते रहे इश्तिहार के।।
“हैरत” जगाई उम्र ने कितनी ही ख्वाहिशें।
कोई कमी न आई बहानों में यार के।।
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