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पुलिस संविधान की रखवाली या सत्ता की?

Ali Aadil Khan Editor’s Desk

पुलिस की वर्दी किसी राजनीतिक दल की पहचान या ख़ौफ़ का निशान नहीं, बल्कि संविधान और क़ानून के प्रति उसकी ज़िम्मेदारी का प्रतीक है।  शांति, न्याय और सुरक्षा का एहसास है ! आज पुलिस संविधान की रखवाली करेगी या सत्ता के इशारों पर चलेगी ? सुप्रीम कोर्ट के 20 साल पुराने फ़ैसले पर एक बार फिर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है !!! इस वीडियो में policing पर उठे कई सवालों का जवाब आपको मिलेगा.

 अगर देश की जनता सरकार की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करती है , तो पुलिस की ज़िम्मेदारी क्या बनती है? प्रदर्शनकारियों को रोकना? उनका दमन करना ? उन्हें हिरासत में लेना? या उनके संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त करना?

हालांकि आंदोलन या प्रदर्शन चाहकर भी शांतिपूर्ण नहीं रह पाते!! कभी कभी उनको हिंसक बना दिया जाता है … हालांकि विपक्षी दल अक्सर, सत्तापक्ष के अच्छे कामों का भी विरोध करता है जो आपने पिछली सरकारों में देखा !

मगर 12 वर्षों में पहली बार सत्तापक्ष के खिलाफ विपक्ष और अवाम सड़कों पर उतरी, इस बार पुलिस की भूमिका लगभग पूरी तरह सत्ता समर्थक दिखाई दी, और देश की जनता ने बड़े पैमाने पर Civilians को पुलिस के रोल में डंडा चलाते हुए भी पहली बार ही देखा .

गुज़िश्ता एक दशक में अदालतों के फैसलों के परिपेक्ष में कहा जासकता है कि “अदालतों की विश्वसनीयता इसी में है कि सत्ता और विपक्ष, दोनों पर समान संवैधानिक क़ानून लागू करते हुए इंसाफ़ हो“।

हालांकि एक जगह खुद गृहमंत्री जी अदालत के फैसले को हिंसा का कारण बताते हुए सुने जा सकते हैं…यहाँ अमितशाह का वीडियो चलेगा …लेकिन आज सवाल तो अमित शाह की पुलिस पर उठ रहे हैं..

 आज पुलिस की भूमिका पर उठाये जा रहे सवाल इसलिए अहम है क्योंकि 20 साल पहले, 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में पुलिस सुधारों को लेकर ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया था।

 इसमें अदालत ने स्पष्ट किया था कि पुलिस की पेशेवर आज़ादी और जवाबदेही, दोनों ज़रूरी हैं। और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा सात महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए थे ।

 पहला, राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, ताकि पुलिस पर ग़ैर ज़रूरी दबाव रोका जा सके और इंसाफ़ करने में कोई बाधा न हो।

 दूसरा, राज्य के पुलिस प्रमुख यानी (Director General of Police) का चुनाव बिना किसी राजनीतिक दबाव के, निष्पक्ष और तय नियमों के अनुसार हो तथा उन्हें बदलने या हटाने का डर न रहे ताकि वे स्वतंत्र रूप से काम कर सकें

 तीसरा, आईजी (IG), डीआईजी (DIG), एसपी (SP) और थाना प्रभारियों जैसे अधिकारियों को  उनके पद पर काम करने के लिए एक निश्चित समय आमतौर पर कम से कम 2 वर्ष दिया जाए , और उससे पहले उनका ट्रांसफर या तबादला नहीं किया जाएगा।।

 सुप्रीम कोर्ट का चौथा निर्देश था , अपराधों की जाँच और क़ानून–व्यवस्था की ज़िम्मेदारियों को अलग करना। यानी • जांच करके अपराधों की तहकीकात करना, सबूत इकट्ठा करना और दोषियों को पकड़ना अलग काम हो जबकि कानून–व्यवस्था (Law and Order) Maintain करना, रैलियों /वीआईपी सुरक्षा और शांति बनाए रखना अलग ज़िम्मेदारी हो .

 पाँचवाँ था , तबादलों और नियुक्तियों में मनमाना हस्तक्षेप रोकने के लिए पुलिस स्थापना बोर्ड बनाया जाए ।

 छठा निर्देश था , पुलिस के ख़िलाफ़ गंभीर शिकायतों की स्वतंत्र जाँच के लिए शिकायत प्राधिकरण यानी Grievance Authority क़ायम की जाए।

 और सातवाँ, केंद्रीय पुलिस संगठनों के Guidence में पारदर्शिता के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग बनाना शामिल था।

 अब बड़ा सवाल यह है कि दो दशक गुज़रने के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा Policing में किये गए सुधारों को लागु कर दिया गया है? , क्या पुलिस अधिकारी, नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए काम करते हैं या सरकारों में बैठे लोगों के लिए? क्या पुलिस को सरकार की सुन्नी चाहिए या संविधान की ?

 दिल्ली में हालिया दिनों में वकीलों , पत्रकारों, छात्रों, किसानों, युवाओं  और Civil Societies के द्वारा किये गए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई, हिरासत और प्रदर्शन स्थलों पर लगी पाबंदियों को लेकर उठे विवादों ने इस सवाल को फिर ज़िंदा कर दिया है।

 संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता देता है। बेशक, सार्वजनिक व्यवस्था के लिए उचित कानूनी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं…….. संवैधानिक तरीके से ही होना चाहिए।

 लोकतंत्र की एक खराबी यह है कि क़ानून हमेशा विपक्ष और आम जनता पर ही लागू होता है और इसका पालन करने की नसीहत भी अवाम को ही दी जाती है?

जबकि सत्ता के साथ रहने वालों के बड़े से बड़े दाग धुलकर साफ़ हो जारहे हैं. हालांकि संविधान ने किसी भी सरकार या उससे जुड़े लोगों को क़ानून से ऊपर रहने का अधिकार नहीं दिया।

और क़ानून का राज तो तभी कहलाएगा, जब उसकी कसौटी सत्ता और जनता, दोनों के लिए एक समान होगी, अन्यथा इसको जंगल राज कहना ही उचित होगा।

 कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव की 2023 की रिपोर्ट में भी Police Complaints Authorities की modus operandi यानी काम करने के ढंग में गंभीर कमियों की तरफ़ इशारा किया गया है।

 आज यहाँ सवाल सिर्फ़ पुलिस सुधारों का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिकों के भरोसे का भी है। और जब नागरिकों का सरकार से भरोसा उठ जाता है तो आंदोलन एक फ़ितरी अमल बन जाता है, जो आज देश और दुनिया में देखने को मिल रहा है.  

 पुलिस की वर्दी किसी राजनीतिक दल की पहचान या ख़ौफ़ का निशान नहीं होना चाहिए, बल्कि पुलिस, संविधान और क़ानून के प्रति उसकी ज़िम्मेदारी का प्रतीक है। सरकारें आती–जाती रहेंगी, लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों के साथ agencies इन्साफ से काम लें, यही सच्चा देशप्रेम होगा।

 लोकतंत्र में मज़बूत पुलिस वयवस्था वह नहीं, जिससे जनता डरती हो ; बल्कि सफल पुलिस वयवस्था वो है, जहाँ पुलिस को देखकर अपराधियों और ज़ालिमों में डर और पीड़ित तथा मज़लूम वर्ग में शांति, न्याय और सुरक्षा का एहसास पैदा हो! जिसके लिए पुलिस को बनाया गया है. लेकिन आज पुलिस वयवस्था इसके पलट है. 

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