नई दिल्ली, 05 नवंबर । दिल्ली के विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि भाई परमानंद की आत्मकथा केवल सेल्युलर जेल में झेड़ी गई यातनाओं का विवरण मात्र नहीं है, बल्कि यह उस देशभक्ति, त्याग और अदम्य साहस का सशक्त स्मरण कराती है, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को आकार दिया। यह बात विजेंद्र गुप्ता ने गुरुवार को क्रांतिकारी एवं गदर पार्टी के नेता भाई परमानंद (1876–1947) की आत्मकथा ‘मेरी आपबीती: कालापानी की कारावास कहानी’ का नया संस्करण जारी करते हुए कही।
भाई परमानंद की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित यह विमोचन 25 अक्टूबर को ‘मन की बात’ के 139वें एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस पुस्तक का उल्लेख किए जाने के कुछ ही दिनों बाद हुआ। प्रधानमंत्री ने युवाओं से भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को समझने के लिए इस पुस्तक को पढ़ने का आग्रह किया था। इस अवसर पर उपस्थित इतिहासकारों, आर्य समाज के प्रतिनिधियों एवं अन्य गणमान्य अतिथियों को संबोधित करते हुए गुप्ता ने जोर दिया कि ऐसे ऐतिहासिक वृत्तांतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना स्वतंत्रता संग्राम की सामूहिक स्मृतियों को संरक्षित रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
भाई परमानंद के असाधारण जीवन का स्मरण करते हुए विजेंद्र गुप्ता ने गदर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में उनकी भूमिका, आर्य समाज के एक प्रभावशाली नेता के रूप में उनके योगदान तथा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध उनकी मुखर आवाज को रेखांकित किया। वर्ष 1876 में तत्कालीन झेलम जिले (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मे परमानंद को वर्ष 1915 के प्रथम लाहौर षड्यंत्र केस में मृत्युदंड सुनाया गया था, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। उन्हें अंडमान द्वीप समूह स्थित सेल्युलर जेल भेजा गया, जहां उन्होंने लगभग पांच वर्षों तक कारावास की यातनाएं सहीं और राजनीतिक बंदियों के साथ किए जा रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में लंबे समय तक भूख हड़ताल भी की। महात्मा गांधी ने 19 नवंबर 1919 को ‘यंग इंडिया’ में लिखते हुए उनके साथ किए गए व्यवहार की कड़ी निंदा की थी और उनकी रिहाई की मांग की थी। 20 अप्रैल 1920 को रिहाई के बाद परमानंद ने लाहौर के नेशनल कॉलेज में इतिहास पढ़ाया, जहां क्रांतिकारी भगत सिंह और सुखदेव भी उनके विद्यार्थियों में शामिल थे। गुप्ता ने कहा कि परमानंद जैसे क्रांतिकारियों के अनुभव भारत की स्वतंत्रता के पीछे छिपे कष्टों और व्यक्तिगत बलिदानों को समझने का एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।
यह आत्मकथा पिछले कई वर्षों से पाठकों के लिए अनुपलब्ध थी, जिसे दिल्ली स्थित अनन्या प्रकाशन द्वारा पुनः प्रकाशित किया गया है। प्रकाशक अतुल माहेश्वरी ने बताया कि ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री द्वारा इस पुस्तक का उल्लेख किए जाने से इसके पुनर्प्रकाशन की प्रेरणा मिली, जिससे औपनिवेशिक शासन के दौरान कारावास की यातनाओं का यह महत्वपूर्ण वृत्तांत नई पीढ़ी के पाठकों के लिए उपलब्ध हो सका है।
इस पहल की सराहना करते हुए विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को केवल प्रमुख राजनीतिक घटनाओं के माध्यम से ही नहीं, बल्कि उन लोगों की व्यक्तिगत गवाहियों और अनुभवों के माध्यम से भी समझा जाना चाहिए, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए कारावास और उत्पीड़न सहा। उन्होंने युवाओं के बीच ऐसी पुस्तकों के व्यापक प्रसार का आह्वान करते हुए कहा कि कम चर्चित रहे क्रांतिकारियों के योगदान को भारत के इतिहास के अध्ययन और उसकी समझ में प्रमुख स्थान मिलना चाहिए।

