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प्रधानमंत्री विदेश यात्रा से क्या लेकर लौटे?

प्रधानमंत्री Narendra Modi की पाँच दिन की विदेश यात्रा
Ali Aadil Khan Editor’s Desk

मोदी की 2014 से आज तक 100 से ज़्यादा विदेश यात्राओं के बाद भी देश की आम जनता आज भी राशन और गैस सिलेंडर की लाइनों में खड़ी दिखाई दे रही है

सवाल यह है कि क्या विदेश नीति का चमकदार प्रदर्शन घरेलू समस्याओं पर पर्दा डालने का माध्यम बनता जा रहा है?

प्रधानमंत्री Narendra Modi की पाँच दिन की विदेश यात्रा को सरकार “भारत की वैश्विक ताक़त” का प्रदर्शन बता रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह दौरा वास्तव में भारत के हितों को मज़बूत करने वाला साबित हुआ, या फिर यह कैमरों, मंचों और कूटनीतिक नारों तक सीमित रह गया? आज की इस रिपोर्ट में बात करेंगे—समझौतों की हकीकत, विदेश नीति की चुनौतियाँ, और उन सवालों की जिनका जवाब अभी बाकी है।

प्रधानमंत्री मोदी की यह विदेश यात्रा ऐसे समय में हुई, जब दुनिया कई गंभीर संकटों से गुजर रही है —यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव, डॉलर के विकल्प की बहस, और वैश्विक अर्थव्यवस्था की सुस्ती। खुद भारत को डीज़ल पेट्रोल गैस बिजली, बैंक RESERVES और ग्रीन एनर्जी की SHORTAGE जैसी बड़ी समस्यायों का सामना है.

सरकार दावा कर रही है कि भारत की आवाज़ अब दुनिया में पहले से ज़्यादा मज़बूती से सुनी जा रही है। तस्वीरें भी यही दिखाती हैं—मुस्लिम शहज़ादे से पूरे हाथ फैलाकर गले मिलते हिन्दू सम्राट और यशस्वी प्रधानमंत्री , नोर्वेय और स्वीडन में PM का प्रवासी भारतियों द्वारा भव्य स्वागत, और इन्ही इंडियन डायस्पोरा के ज़रिये रटाये गए मोदी मोदी के नारे, बड़े बड़े मंच, , और लंबी-लंबी घोषणाएँ।

लेकिन विपक्ष और कई विशेषज्ञ पूछ रहे हैं—क्या इन यात्राओं का ठोस आर्थिक और रणनीतिक फायदा आम भारतीय तक पहुँच पायेगा ? क्योंकि मोदी की 2014 से आज तक 100 से ज़्यादा विदेश यात्राओं के बाद भी देश की आम जनता आज भी राशन और गैस सिलेंडर की लाइनों में खड़ी दिखाई दे रही है. अस्पतालों में इलाज के लिए पूरा पूरा दिन मरीज़ों को लेकर घर के लोग तप्ती धुप और भूखे प्यासे बिना दवा और इलाज के मायूस अपने घरों को वापस लौट जा रहे हैं. ग़रीब माँ बाप सरकारी स्कूलों की कमी के चलते प्राइवेट स्कूलों की फीस नहीं भर पा रहे हैं.

बीते कुछ वर्षों में PM मोदी की विदेश यात्राओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन देश के भीतर बेरोज़गारी, महँगाई, सांप्रदायिक नफरत, डर, ख़ौफ़, अविश्वास और उद्योगों की चुनौतियाँ भी लगातार बढ़ रही हैं । सवाल यह है कि क्या विदेश नीति का चमकदार प्रदर्शन घरेलू समस्याओं पर पर्दा डालने का माध्यम बनता जा रहा है?

PM मोदी की पांच दिवसीय इस यात्रा में व्यापार, रक्षा और टेक्नोलॉजी सहयोग पर कई चर्चाएँ हुईं। सरकार इसे “नए भारत की कूटनीतिक सफलता” बता रही है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि भारत अभी भी कई अहम मोर्चों पर संतुलन बनाने में नाकाम है ।

एक तरफ मोदी , रूस और मुस्लिम देशों से रिश्ते बनाए रखना चाहत ेहैं , दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी भी बढ़ाने में दिलचस्पी रखते दिखाई दे रहे हैं । मगर सवाल यह है क्या यह संतुलन संभव है ? और क्या भारत अपनी आज़ाद और पुरानी effective foreign policy को संभाल पा रहा है? , या बड़ी ताक़तों के बीच केवल “मैनेजमेंट” की राजनीति के चक्कर में घर और घाट दोनों खो देने कि स्थिति बन रही है ??

BRICS और डॉलर के विकल्प की चर्चा भी मोदी की यात्रा का हिस्सा रही। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि आज भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा डॉलर पर ही निर्भर है। ऐसे में बड़े-बड़े बयान तो दिए जा रहे हैं, मगर क्या कोई ठोस वैकल्पिक ढांचा तैयार हो पाया है? या फिर यह सिर्फ़ अंदरूनी राजनीतिक वर्चस्व बनाये रखने की कोशिश है?

इसके अलावा एक और सवाल लगातार उठ रहा है, क्या विदेश यात्राएँ अब कूटनीति से ज्यादा “Personal इमेज बिल्डिंग” का माध्यम बनती जा रही हैं? हर दौरे में बड़े आयोजन, प्रवासी भारतीयों के कार्यक्रम और हाई-प्रोफाइल तस्वीरें ज़रूर दिखाई देती हैं. लेकिन आम जनता जानना चाहती है कि इन यात्राओं से रोज़गार, मंहगाई, सांप्रदायिक नफरत, विदेशी निवेश और आम आदमी की ज़िंदगी में कितना बदलाव और सुधार आया?

सरकार समर्थकों का तर्क है कि वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिष्ठा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ी है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि केवल प्रवासी भारतियों के साथ Event कर लेने या विदेशों में जाकर मैडल लेने से देश की आंतरिक चुनौतियाँ और मुश्किलें हल नहीं होतीं। जब तक की बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश न हो …

प्रधानमंत्री मोदी की यह पाँच दिन की विदेश यात्रा निश्चित रूप से सुर्खियों में तो रही और रेहनी भी चाहिए थी । लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना भी उतना ही ज़रूरी है जितना INCOMPLETE उपलब्धियों का प्रचार।

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति वास्तव में दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों यानी Long-term national interests को मज़बूत कर पाएगी ?
क्या इन यात्राओं का आर्थिक लाभ आम नागरिक को मिल पायेगा ? या इससे पहले PM मोदी की 80 देशों की यात्राओं का लाभ नागरिकों को मिल चूका है ?
क्या मोदी सरकार की विदेश नीति एक बड़े राजनीतिक शो से राष्ट्रहित में बदल पाएगी ?
क्या इन सवालों के जवाब भारत की जनता को मिल पाएंगे , या देश की बची खुची और सेक्युलर प्रेस को भी दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस नॉर्वे की पत्रकार Helle Lyng की तरह मायूसी हाथ लगेगी ??

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
और कोई इनकी तरह उम्र भर सफ़र में रहा

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