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नफ़रती भाषा ही हिंसा में बदलती है: हर्ष मंदर

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा

NEW DELHI: मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने हाल ही में दिल्ली पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की मांग की है।

हर्ष मंदर का आरोप है कि संवैधानिक पद पर रहते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा देश की मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाली भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए हिमंत बिस्वा सरमा ने एक सार्वजनिक बयान में कहा कि वह हर्ष मंदर के ख़िलाफ़ सौ से ज़्यादा एफ़आईआर दर्ज कराएंगे।

पिछले कुछ वर्षों में भारत में नफ़रती भाषण, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा को लेकर बहस तेज़ हुई है।

इसी बीच, सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑन हेट की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में देशभर में 1,318 नफ़रती भाषणों की घटनाएँ दर्ज की गईं। यह संख्या 2024 की तुलना में 13 प्रतिशत अधिक है और 2023 के मुकाबले लगभग दोगुनी बताई गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, बीते साल औसतन हर दिन चार नफ़रती भाषण दर्ज किए गए। इनका सबसे अधिक असर धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिम और ईसाई समुदायों पर पड़ा।

रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि नफ़रत अब केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह धीरे-धीरे एक संगठित और निरंतर राजनीतिक रणनीति का रूप लेती जा रही है।

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लेकिन सवाल यह है क्या इन नफरती भाषणों से समाज का कोई भला होगा , क्या देश में इससे विकास होगा? क्या बेरोज़गारी , भुखमरी, और मंहगाई दूर होगी? ज़ाहिर है इससे सिर्फ वोट धुर्वीकरण होगा, समाज के टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे, देश कमज़ोर होजायेगा.

लिहाज़ा जो कोई भी नफ़रती भाषण या बयान देता है समझ लेना वो देश का दुश्मन है. लेकिन विडंबना यह है सत्तारूढ़ पार्टी की तो आधारशिला ही नफरत और साम्प्रदायिकता पर रखी है. और सभी सरकारी संस्थानों पर उनका क़ब्ज़ा है, लेकिन एक अच्छी बात यह है की सब अधिकारी या कर्मचारी नफ़रती प्रविर्ती के नहीं हैं.

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