नेपाल इस समय एक बेहद भयावह प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। उत्तरी नेपाल के रसुवा ज़िले में भोटेकोशी नदी में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने घरों, बाज़ारों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और संचार व्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचाया है।
27 अगस्त तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मृतकों की संख्या लगभग 157 तक पहुँच गई है और सैकड़ों लोगों के लापता होने का समाचार है। इनमें बड़ी संख्या विदेशी पर्यटकों और भारतीय नागरिकों की भी बताई जा रही है। इनमें कैलाश मानसरोवर के श्रद्धालु भी शामिल हैं। विशेष रूप से ईशा फाउंडेशन के 77 श्रद्धालुओं का पता नहीं चल पा रहा है।
आखिर बाढ़ आई कैसे?
इस आपदा को सामान्य मानसूनी बाढ़ मानना सही नहीं होगा। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार भोटेकोशी नदी में अचानक आई बाढ़ के पीछे हिमालयी क्षेत्र में बर्फीले हिमस्खलन या ग्लेशियर से जुड़ी घटना की भूमिका हो सकती है।
नेपाल के वैज्ञानिकों के शुरुआती आकलन में कहा गया है कि तिब्बत की ओर ल्हेंदे नदी में एक बर्फीले हिमस्खलन से नदी का रास्ता अस्थायी रूप से अवरुद्ध हुआ होगा। इसके बाद पानी जमा हुआ और अचानक बाँध टूटने से भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर आया। हालांकि, यह अभी अंतिम रूप से स्थापित नहीं हुआ है कि ग्लेशियल झील फटने की घटना हुई थी या हिमस्खलन ही मुख्य कारण था, जांच अभी जारी है।
यही वजह है कि कुछ रिपोर्टों में इसे Glacial Lake Outburst Flood यानी ग्लेशियल झील के अचानक फटने की आशंका से भी जोड़ा गया है। लेकिन वैज्ञानिक और प्रशासन वास्तविक ट्रिगर का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं।
हिमालय में बदलता मौसम, ग्लेशियरों की संवेदनशीलता, अचानक होने वाली भारी बारिश और पहाड़ी नदियों का तेज़ बहाव ऐसे खतरों को और गंभीर बना सकते हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक नदी में अचानक बढ़े पानी के रूप में देखना काफी नहीं होगा।
सबसे ज़्यादा नुकसान कहाँ हुआ?
रसुवा ज़िले के तिमुरे, स्याफ्रुबेंसी और रसुवागढ़ी क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। बाढ़ ने चीन-नेपाल सीमा की ओर जाने वाले महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग को भी भारी नुकसान पहुँचाया है।
बेट्रावती से रसुवागढ़ी सीमा तक लगभग 42 किलोमीटर सड़क कई स्थानों पर बाढ़ में बह गई और कई कंक्रीट पुल भी नष्ट हो गए। इससे नेपाल और चीन के बीच व्यापार तथा सीमा क्षेत्र की आवाजाही प्रभावित हुई है।
जलविद्युत क्षेत्र को भी भारी नुकसान पहुँचा है। कई परियोजनाएँ प्रभावित हुई हैं और नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अनुसार लगभग 430 मेगावाट उत्पादन क्षमता से जुड़ी उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण सुविधाओं को नुकसान पहुँचा है। इससे बिजली आपूर्ति पर भी असर पड़ा है।
राहत और बचाव अभियान
आपदा के बाद नेपाल सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के जवानों को बड़े पैमाने पर राहत और बचाव अभियान में लगाया गया है।
नेपाल सेना ने दर्जनों लोगों को सुरक्षित निकाला है और घायलों को अस्पतालों तक पहुँचाया गया है। राहत और बचाव के लिए सैन्य तथा निजी हेलीकॉप्टरों को लगाया गया, लेकिन खराब मौसम और पहाड़ी इलाकों में लगातार बदलती परिस्थितियों के कारण हवाई अभियान में कई बार बाधा आई।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई प्रभावित इलाकों का सड़क और संचार संपर्क टूट गया है। इसलिए राहत सामग्री पहुँचाने और लापता लोगों की तलाश के लिए हेलीकॉप्टरों पर काफी निर्भरता है।
नेपाल सरकार ने बाढ़ पीड़ितों को निःशुल्क चिकित्सा उपचार देने का फैसला किया है। मृतकों के परिवारों को मौजूदा कानून के तहत आर्थिक सहायता देने और सड़कों, बिजली तथा दूरसंचार व्यवस्था को जल्द बहाल करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
भारत ने मदद का बढ़ाया हाथ
भारत ने नेपाल के इस संकट में सहायता का हाथ बढ़ाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बातचीत कर संवेदना व्यक्त की और हर संभव मानवीय सहायता देने की पेशकश की।
इसके बाद भारत ने भारतीय वायुसेना के C-130J विमान के जरिए लगभग 10 टन राहत सामग्री नेपाल भेजी। इसमें अस्थायी आश्रय सामग्री, कंबल, हाइजीन किट, सोलर लैंप और दवाइयाँ शामिल हैं।
भारतीय नागरिकों को लेकर भी चिंता गंभीर है। उपलब्ध नवीनतम रिपोर्टों में 133 भारतीय नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि लापता लोगों की सूची और संख्या लगातार अपडेट हो रही है।
अंतरराष्ट्रीय मदद की भी पहल
नेपाल में आई इस आपदा पर भारत के अलावा चीन, अमेरिका और विश्व बैंक सहित कई पक्षों ने सहायता की पेशकश की है। अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट सोसायटी की ओर से भी तत्काल सहायता की घोषणा की गई है।
आगे की चुनौती क्या है?
इस समय सबसे पहली प्राथमिकता लापता लोगों को ढूँढना, घायलों को चिकित्सा सुविधा देना और प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाना है। इसके बाद नेपाल के सामने सड़कों, पुलों, बिजली, दूरसंचार और जलविद्युत परियोजनाओं को दोबारा खड़ा करने की बड़ी चुनौती होगी।
लेकिन इस आपदा ने एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हिमालयी क्षेत्र में अचानक आने वाली बाढ़ और ग्लेशियर संबंधी आपदाओं के लिए मौजूदा चेतावनी प्रणाली पर्याप्त है?
भोटेकोशी नदी के ऊपरी हिस्से में लगे कुछ स्वचालित बाढ़ निगरानी स्टेशन भी बाढ़ में बह गए हैं। ऐसे में भविष्य के लिए बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम, उपग्रह निगरानी, सीमा-पार सूचना साझा करने और स्थानीय समुदायों को समय रहते चेतावनी देने की आवश्यकता और भी स्पष्ट हो गई है।
नेपाल की यह त्रासदी केवल एक देश की आपदा नहीं है। बल्कि हिमालय भारत, नेपाल, भूटान, तिब्बत, चीन और पूरे दक्षिण एशिया की साझा प्राकृतिक विरासत को संजोने की चुनौती भी है। इसलिए हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर क्षेत्रीय सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान और समय पर सूचना साझा करना बेहद जरूरी है।
आज नेपाल को सबसे अधिक जरूरत इंसानियत, तेज़ राहत और प्रभावी बचाव की है.और इस संकट की सबसे बड़ी सीख यह है कि प्रकृति के बदलते संकेतों को समझकर भविष्य की आपदाओं के लिए पहले से तैयार रहना और क़दरत कि मंशा को समझने के साथ प्रभावी बचाव और उपचार कि तैयारी करना है।