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लोकतंत्र का अपहरण: जब सत्ता सवाल से और….

लोकतंत्र का अपहरण

कपिल बर्मन (जाग्रत भारत)

लोकतंत्र का अपहरण: जब सत्ता सवाल से और नागरिक कर्तव्यों से डरने लगे

यदि हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखना चाहते हैंतो हमें महान पुरुषों के चरणों में अपनी स्वतंत्रता को समर्पित नहीं करना चाहिएऔर न ही उन्हें ऐसी शक्तियां सौंपनी चाहिए जो उन्हें हमारी संस्थाओं को पलटने के योग्य बना दें।”

संविधान सभा में दिया गया बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर का यह अंतिम चेतावनी भरा भाषण आज केवल इतिहास की किताबों का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान भारत की सड़कों पर चीखता हुआ एक कड़वा सच बन गया है। जब लद्दाख की वादियों से चलकर आए पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक को देश की राजधानी के जंतर-मंतर से जबरन हटा दिया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति को हटाना नहीं है। यह संवैधानिक अधिकारों को सफेद चादर में लपेटकर किया गया लोकतंत्र का खुला अपहरण है।

सत्ता का अहंकार और नागरिकों की खामोशी

लोकतंत्र और राजतंत्र में केवल एक बुनियादी फर्क होता है—सवाल करने की आजादी। राजतंत्र में राजा के फैसले ईश्वरीय आदेश होते हैं, जहाँ प्रजा सिर्फ सिर झुकाती है। इसके विपरीत, लोकतंत्र में जनता ‘प्रजा’ नहीं बल्कि देश की ‘मालिक’ होती है। यहाँ सत्ता से सवाल करने से ही उसकी जवाबदेही तय होती है। सवाल ही वह लगाम है जो सत्ता को निरंकुश और तानाशाह होने से रोकती है।

परंतु आज परिदृश्य बदल चुका है। आज जब जनता के जायज सवाल सत्ता को असहज करने लगते हैं, तो उन्हें जबरन खामोश करने का दौर शुरू हो जाता है। दुखद यह है कि इस दमन पर जनता की खामोशी और भय उसे गूंगा-बहरा बना रहा है। जब देश की सर्वोच्च संस्थाओं से सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के प्रति कठोर टिप्पणियां आती हैं, और सत्ता में बैठे लोग शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों को ‘विकास की रफ्तार धीमी करने वाला’ घोषित कर देते हैं, तब नागरिक के भीतर का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। हमें सोचना होगा कि क्या भय के साये में जीने वाला नागरिक खुद को वास्तव में आज़ाद कह सकता है? क्या ऐसी स्थिति में भारत की संप्रभुता अक्षुण्ण रह पाएगी?

नायक पूजा का खतरा और खोती आजादी

जब समाज में सवाल खो जाते हैं, तो वहाँ ‘नायक पूजा’ (Hero Worship) का बोलबाला हो जाता है। बाबा साहब ने आगाह किया था कि राजनीति में भक्ति या नायक पूजा तानाशाही का सीधा रास्ता है। आज वही हो रहा है। नागरिक राजनीतिक दलों के दलदल में इस कदर धंस चुके हैं कि वे राष्ट्र हित से ऊपर दलीय निष्ठा को रखने लगे हैं। सत्ता अपने ही देश के पर्यावरण, संस्कृति और नागरिकों के अधिकारों को उजड़ते हुए मूकदर्शक बनकर देख रही है, और जनता धर्म, जाति और संप्रदाय के कृत्रिम झगड़ों में उलझी हुई है। सोनम वांगचुक का आमरण अनशन और उसके प्रति सत्ता की बेपरवाही हमारी सामूहिक चेतना और आज़ादी पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है।

अधिकार और कर्तव्य: एक ही सिक्के के दो पहलू

हमें यह समझना होगा कि हमारे अधिकार आसमान से नहीं टपकते; वे हमारे संवैधानिक कर्तव्यों की कोख से जन्म लेते हैं। एक जागरूक नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य यह है कि उसकी निष्ठा किसी नेता या राजनीतिक दल के प्रति न होकर, भारत के संविधान के प्रति हो। जब तक देश का नागरिक जाति-धर्म और दलीय दलदल से बाहर निकलकर सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए एकजुट नहीं होगा, तब तक सत्ता की जवाबदेही तय नहीं की जा सकती।

आह्वान: सड़क पर उतरने और चेतने का समय

अब समय आ गया है कि देश का नागरिक अपनी सुखद नींद से जागे। यदि हमें अपनी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता को बचाना है, तो हमें अन्याय, अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज़ बनना होगा। यह लड़ाई किसी दल को हराने या जिताने की नहीं है, यह लड़ाई संविधान को जीवित रखने की है।

सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रतिरोध दर्ज कराना और सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछना ही वह संजीवनी है, जो लोकतंत्र को जिंदा रखेगी। आइए, राजनीतिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ें, अपने संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करें और एक ऐसा भारत बनाएं जहाँ नागरिक ‘प्रजा’ नहीं, बल्कि देश का भाग्यविधाता हो। क्योंकि जब तक जनता के पास सवाल पूछने का साहस है, तब तक देश में लोकतंत्र की सांसें चलती रहेंगी।

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