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क्या नेतन्याहू की हार फिलिस्तीनियों के लिए राहत?

इज़राइल चुनाव 2026

क्या नेतन्याहू की हार फिलिस्तीनियों के लिए राहत?

इज़राइल चुनाव 2026: नेतन्याहू की सत्ता पर संकट, अरब पार्टियों के हाथ में अहम भूमिका

यदि अदालत नेतन्याहू को दोषी ठहराती है, तो उन्हें जेल की सज़ा हो सकती है

बहुमत से दूर नेतन्याहू; चुनाव के नतीजों ने इज़राइल की राजनीति में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है।

चुनाव के नतीजे: जीतकर भी बहुमत से दूर नेतन्याहू

इज़राइल के 27 अक्टूबर 2026 के आम चुनाव ने देश की राजनीति को एक दिलचस्प मोड़ पर ला खड़ा किया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उनके नेतृत्व वाला गठबंधन संसद में बहुमत हासिल करने से पीछे रह गया है।

इज़राइल की संसद, जिसे नेसेट कहा जाता है, में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम-से-कम 61 सांसदों का समर्थन ज़रूरी है। उपलब्ध अंतिम मतगणना के मुताबिक, नेतन्याहू के खेमे को 53 सीटें मिलीं, जबकि उन्हें हटाने की कोशिश कर रहे विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिलीं। अरब पार्टियों ने मिलकर 19 सीटें हासिल कीं।

यानी चुनाव में किसी भी खेमे को अपने दम पर सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला। अब असली मुकाबला चुनाव के मैदान से निकलकर सरकार बनाने के लिए होने वाली बातचीत में पहुँच गया है।

नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

नेतन्याहू इज़राइल की राजनीति के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। लेकिन उनके सामने अब कई मुश्किल सवाल हैं।

7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इज़राइल की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे थे। इसके बाद ग़ज़ा में लंबे समय तक चले सैन्य अभियान और उसके विनाशकारी मानवीय प्रभावों ने भी सरकार की नीतियों को अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखा।

नेतन्याहू के विरोधियों ने सुरक्षा संबंधी विफलताओं की जवाबदेही, युद्ध के फैसलों और देश के भविष्य को लेकर सवाल उठाए। इसके साथ ही अति-दक्षिणपंथी सहयोगियों और अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी समुदाय के लिए सैन्य सेवा में छूट जैसे मुद्दे भी चुनावी बहस का हिस्सा रहे।

हालाँकि, लिकुड का सबसे बड़ी पार्टी बनना यह बताता है कि नेतन्याहू की राजनीतिक ताक़त पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। उनके पास अब भी सरकार बनाने की कोशिश करने का अवसर है। मगर उन्हें नए सहयोगियों को साथ लाना होगा या विपक्ष में सेंध लगाने की कोशिश करनी होगी।

अरब पार्टियाँ बनीं चुनाव का अहम पहलू

इस चुनाव का एक बड़ा पहलू अरब पार्टियों का मज़बूत प्रदर्शन है। इज़राइल की संसद में अरब प्रतिनिधित्व अब सरकार बनाने की गणित में महत्वपूर्ण हो सकता है।

विपक्षी नेता गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले खेमे के लिए अरब पार्टियों का समर्थन हासिल करना बहुमत तक पहुँचने का एक संभावित रास्ता है। लेकिन यह आसान नहीं होगा, क्योंकि विपक्ष के कुछ नेता अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने या उनका समर्थन लेने को लेकर राजनीतिक दबाव का सामना कर सकते हैं।

यहाँ एक अहम सवाल उठता है: क्या इज़राइल की राजनीति अरब नागरिकों के वोटों को लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा मानकर स्वीकार करेगी, या उनके समर्थन को लेकर विवाद खड़ा होगा?

अरब नागरिक इज़राइल की आबादी का लगभग पाँचवाँ हिस्सा हैं। उनके प्रतिनिधियों की भूमिका को नज़रअंदाज़ करना देश की लोकतांत्रिक राजनीति की वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करने जैसा होगा।

क्या नेतन्याहू की हार का मतलब फिलिस्तीनियों के लिए राहत है?

यह सवाल सबसे अहम है, लेकिन इसका जवाब सीधे हाँ या नहीं में देना सही नहीं होगा।

नेतन्याहू की सरकार की नीतियों को लेकर फिलिस्तीन, ग़ज़ा और पश्चिमी तट के भविष्य पर गंभीर चिंताएँ बनी हुई हैं। उनके कुछ अति-दक्षिणपंथी सहयोगी पश्चिमी तट पर इज़राइली नियंत्रण बढ़ाने और फिलिस्तीनी राज्य की संभावनाओं का विरोध करने के पक्षधर रहे हैं।

लेकिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति कमज़ोर होने का अर्थ अपने-आप यह नहीं है कि इज़राइल की फिलिस्तीन नीति बदल जाएगी। विपक्ष के भीतर भी सुरक्षा, हमास, ग़ज़ा के भविष्य और फिलिस्तीनी राज्य के सवाल पर एक जैसी राय नहीं है।

इसलिए फिलिस्तीनियों के लिए वास्तविक बदलाव का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि प्रधानमंत्री कौन बनता है। असली कसौटी होगी—क्या सैन्य कार्रवाई और नागरिकों की सुरक्षा के संबंध में नीति बदलती है, क्या मानवीय सहायता का रास्ता खुलता है, और क्या फिलिस्तीनियों के राजनीतिक अधिकारों के लिए कोई ठोस पहल होती है?

अब आगे क्या होगा?

चुनाव के बाद राष्ट्रपति आइज़ैक हर्ज़ोग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से सलाह-मशविरा करेंगे और उस उम्मीदवार को सरकार बनाने का अवसर दे सकते हैं जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे बेहतर संभावना हो।

आगे तीन संभावनाएँ दिखाई देती हैं:

  1. नेतन्याहू फिर सरकार बनाने में सफल हों: इसके लिए उन्हें अतिरिक्त समर्थन या विपक्षी सांसदों का साथ जुटाना पड़ सकता है।
  2. विपक्ष अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश करे: संख्या के लिहाज़ से यह रास्ता संभव है, लेकिन राजनीतिक मतभेद बड़ी बाधा बन सकते हैं।
  3. राष्ट्रीय एकता की सरकार या फिर नए चुनाव: यदि कोई भी पक्ष बहुमत नहीं जुटा पाता, तो व्यापक गठबंधन की कोशिश हो सकती है। और अगर सरकार बनाने की प्रक्रिया विफल रहती है, तो दोबारा चुनाव की नौबत भी आ सकती है।

इज़राइल में भ्रष्टाचार का मुक़दमा

नेतन्याहू पर रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात से जुड़े आरोप हैं। उनका मुक़दमा 2020 में शुरू हुआ था। नेतन्याहू सभी आरोपों से इनकार करते हैं। यदि अदालत उन्हें दोषी ठहराती है, तो उन्हें जेल की सज़ा हो सकती है। रिश्वतखोरी के आरोप में अधिकतम 10 साल तक की सज़ा का प्रावधान है।

ग़ज़ा के मामले में अंतरराष्ट्रीय गिरफ़्तारी वारंट

ध्यान रहे  21 नवंबर 2024 को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने नेतन्याहू के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किया था। यह वारंट ग़ज़ा में कथित युद्ध अपराधों और मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों से संबंधित है। यह आरोप हैं, अंतिम दोषसिद्धि नहीं। प्रधानमंत्री पद से हटना दोषसिद्धि नहीं है। मुक़दमे का फैसला अदालत ही करेगी।

असली परीक्षा चुनाव के बाद शुरू हुई है

इज़राइल के इस चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सबसे बड़ी पार्टी बनना और स्थिर सरकार बना लेना दो अलग-अलग बातें हैं। नेतन्याहू अब भी राजनीतिक मुकाबले में बने हुए हैं, लेकिन उनके सामने बहुमत जुटाने की कठिन चुनौती है। दूसरी ओर, विपक्ष को भी यह साबित करना होगा कि वह केवल नेतन्याहू का विरोध करने के बजाय एक साझा सरकार बनाने में सक्षम है।

अरब पार्टियों की बढ़ी हुई भूमिका इस चुनाव को एक और अहम सवाल से जोड़ती है—क्या इज़राइल की राजनीति अपने सभी नागरिकों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को स्वीकार करने की दिशा में आगे बढ़ेगी?

और जहाँ तक फिलिस्तीन का सवाल है, वहाँ उम्मीद का फैसला केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि ज़मीन पर होने वाले बदलावों से होगा।

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