कपिल कुमार बर्मन
नागरिक अधिकारों के लिए समर्पित
समानता, न्याय और संवैधानिक प्रतिनिधित्व: एक समावेशी राष्ट्र का मार्ग
कपिल बर्मन : भारतीय संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक विषमताओं को समाप्त कर एक समतामूलक समाज के निर्माण का एक घोषणापत्र है। डॉ. भीमराव आंबेडकर और संविधान सभा के विचारकों ने जब स्वतंत्र भारत की नींव रखी, तो उनका लक्ष्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल करना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करना था जिसके बिना राजनीतिक लोकतंत्र स्थायी नहीं रह सकता। 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि राजनीतिक समानता (एक व्यक्ति, एक वोट) के बावजूद यदि सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रही, तो समानता की यह संरचना लंबे समय तक टिक नहीं पाएगी।
ऐतिहासिक संदर्भ और ‘जन्मजात विशेषाधिकार’ की समाप्ति
भारत की पारंपरिक सामाजिक संरचना में श्रम और अवसरों का विभाजन योग्यता पर नहीं, बल्कि जन्म पर आधारित था। विशेषाधिकार और सामाजिक प्रतिष्ठा कुछ वर्गों के लिए सुरक्षित थे, जबकि एक विशाल आबादी दलित, शोषित और पिछड़े वर्ग – शिक्षा, संपत्ति और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से पूरी तरह बेदखल थी। यह एक प्रकार का अनौपचारिक “जन्मजात आरक्षण” था, जिसने असमानता को संस्थागत रूप दे दिया।
संविधान ने नागरिक की पहचान उसका जन्म नहीं, बल्कि उसका नागरिक होना है। ‘रानी और महतरानी’ दोनों को एक समान वोट का अधिकार देकर लोकतंत्र ने शक्ति का संतुलन आम जनता की ओर मोड़ दिया।
आनुपातिक प्रतिनिधित्व बनाम ‘आरक्षण’ की भ्रांति
अक्सर जिसे केवल ‘आरक्षण’ कहकर खारिज करने या रियायत के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है, संवैधानिक दृष्टि से वह प्रतिनिधित्व का सिद्धांत (Principle of Representation) और सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) है।
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औपचारिक समानता बनाम वास्तविक समानता: यदि दो व्यक्तियों की शुरुआती परिस्थितियाँ अत्यंत भिन्न हों, तो उन्हें केवल एक समान नियम के तहत प्रतिस्पर्धा करने के लिए कहना न्यायसंगत नहीं है। अनुच्छेद 16(4) राज्य को उन पिछड़े वर्गों के पक्ष में पदों के आरक्षण का अधिकार देता है, जिनका राज्य की सेवाओं में “पर्याप्त प्रतिनिधित्व” नहीं है।
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समान अवसर की स्थापना: प्रतिनिधित्व कोई परोपकार या गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है; यह सत्ता, प्रशासन और नीति-निर्माण के स्तर पर ऐतिहासिक रूप से बहिष्कृत समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने का संवैधानिक माध्यम है।
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विविधता में दक्षता: एक समावेशी प्रशासनिक व्यवस्था वही हो सकती है जिसमें समाज के सभी वर्गों के अनुभव और दृष्टिकोण शामिल हों। जब वंचित वर्ग शासन में भागीदार बनता है, तब नीतियाँ अधिक जनोन्मुख और न्यायसंगत बनती हैं।
सामाजिक न्याय, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और राष्ट्र निर्माण
जब कुछ वर्ग प्रतिनिधित्व की इस संवैधानिक व्यवस्था का विरोध करते हैं, तो वे अक्सर मेरिट (योग्यता) की संकीर्ण परिभाषा का सहारा लेते हैं। योग्यता कभी भी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संसाधनों से अलग-थलग नहीं होती। ऐतिहासिक विशेषाधिकारों को योग्यता और ऐतिहासिक वंचना को अयोग्यता मान लेना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांत जैसे वसुधैव कुटुम्बकम् (समस्त विश्व एक परिवार है) समानता और बंधुत्व की मांग करते हैं। जिस प्रकार शबरी के जूठे बेर स्वीकार कर श्रीराम ने मर्यादा और सामाजिक समरसता का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया, उसी प्रकार एक परिपक्व समाज को अपने प्रत्येक घटक को गले लगाना चाहिए। जातिगत श्रेष्ठता का दंभ और पूर्वाग्रह न केवल संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हैं, बल्कि यह राष्ट्र की एकता और अखंडता को भी कमजोर करते हैं।
आगे का मार्ग: बंधुत्व पर आधारित राष्ट्र
भारत को विश्व पटल पर एक सशक्त और आधुनिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के लिए जातिगत पूर्वाग्रहों और द्वेष से परे सोचना अनिवार्य है। वास्तविक ‘समान अवसर’ तब तक संभव नहीं है जब तक कि हर बच्चे को समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और संसाधन उपलब्ध न हों, और जब तक प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर वंचितों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित न हो।
डॉ. आंबेडकर द्वारा संविधान की प्रस्तावना में रेखांकित तीन स्तंभ “स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व” एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। समानता के बिना स्वतंत्रता कुछ लोगों का विशेषाधिकार बन जाती है, और बंधुत्व के बिना समानता केवल कानूनी औपचारिकता बनकर रह जाती है। एक श्रेष्ठ भारत का निर्माण तभी संभव है जब हम संवैधानिक प्रतिनिधित्व को सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय प्रगति के एक अपरिहार्य माध्यम के रूप में स्वीकार करें।

