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जम्मू-कश्मीर: 370 और 35A हटाने के बाद क्या होगा ?

SRINAGAR, INDIA FEBRUARY 12: Security forces near the site of encounter at the Ratnipora area of south Kashmir's Pulwama district, some 30 kilometers south of Srinagar, on February 12, 2019 in Jammu and Kashmir, India. A soldier and a militant were killed while a residential house where the militants were hiding was damaged in the fierce gunfight. (Photo by Waseem Andrabi/ Hindustan Times via Getty Images)

जम्मू-कश्मीर: 370 और 35A हटाने के बाद क्या होगा ?संसद में किस पार्टी का क्या रहा रुझान

Ali Aadil Khan Editor/Top News Group

जैसे ही अनुच्छेद 370 हटाने का प्रस्ताव जब राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने पेश किया तो समर्थन और विरोध में लोग खुलकर सामने आने लगे, कश्मीर कल और आज , AFSPA क्या है और कहाँ लागू था या है ,एक आंकलन 

नई दिल्ली: जम्मू -कश्मीर में धारा 370 से किसको लाभ था और किसको था नुकसान ? 1947 के बाद से ही पूरी रियासत में एक लम्बे दौर तक कश्मीरी पंडितों का लगभग हर क्षेत्र में वर्चस्व था या यूँ कहें पंडितों का क़ब्ज़ा था और वहां का बहुसंख्यक ग़ुलाम था या छोटी मोटी नौकरी कर रहा था , लेकिन कुछ मुस्लिम्स बड़े कारोबारों में भी थे मगर मुसलमानो की मेजोरिटी की गुज़र बसर मज़दूरी या टूरिस्टों पर निर्भर थी, और आज भी है , 370 हटाने के बाद क्या परिवर्तन आएंगे देखना बाक़ी है ।

हमने अपने बचपन से यानी 80 के दशक से आजतक जम्मू के मुसलमानो को मिस्कीन ही देखा ।ख़ास तौर से जम्मू के मुसलमान नार्थ इंडिया में भीक मांगते या शॉल और ड्राई फ्रूट बेचते नज़र आते थे । कारोबार तो छोटा हो बड़ा कहीं भी किया जा सकता है , ड्राई फ्रूट्स बेचने या शॉल्स बेचने के परिपेक्ष में यह बात कह रहा हूँ।
370 का फायदा जिनको पहुँचता दिखा उनमें वहां की सियासी परिवार और अलगाव वादी नेता जो दशकों से कश्मीर की भोली अवाम का आज़ादी दिलाने के नाम पर दोहन करते रहे हैं , और अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ा रहे हैं और कश्मीर में बड़े बड़े होटल bussiness चला रहे हैं ।
इनसे पहले वहां के पंडित कश्मीर के संसाधनों पर क़ाबिज़ थे जिनके खिलाफ अलगाव वादी नेताओं ने अवाम को उभारा उनको बताया तुम यहाँ के असल बाशिंदे हो तुम यहाँ की अक्सरीयत हो और ये पंडित तुम्हारे संसाधनों पर आज़ादी के बाद से मालिक बने हुए है अब ये भूके नंगे अनपढ़ कश्मीरी लगे पंडितों को भगाने में , जबकि कश्मीरियों की तारिख ये है कि इनसे हथ्यार चलाना तो दूर की बात पकड़ना नहीं आता था ।

किसी क़ौम को ग़ुलाम बनाए रखने में तालीम की कमी और रोज़गार की कमी सबसे बड़ा किरदार अदा करती है और कश्मीर की अक्सरियत इसकी ही शिकार रही है , और पूरे देश पर इसी फॉर्मूले को लागू किया गया है और ये सब नेहरू के दौर से ही चल रहा है ।
अब इन अनपढ़ और ग़रीब मुसलमानो को आज़ादी और कुछ पैसे के लालच में २ दशक तक अलगाव वादी नेता इस्तेमाल करते रहे ।ज़ाहिर है कश्मीरी पंडितों को देश की सरकार ऐसे उजड़ता नहीं देख सकती थी और सरकार ने भी अलगाव वादियों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिसकी क़ीमत वहां की उसी अनपढ़ और ग़रीब क़ौम को ही चुकानी पड़ी जो ग़रीबी के अभाव में बिना सोचे इन डायनासोरों की भेंट चढ़ रहे थे ,ज़ाहिर है इंतक़ाम की आग में झुलसना तो सभी को पड़ता है चाहे वो मुजरिम हो या बेगुनाह ।
लेकिन इस बीच कश्मीरी अवाम के साथ वहां की लीडरशिप ने भी धोखा किया और वहां की अवाम पर टूटने वाले पहाढ़ों को अपनी सत्ता की कुर्सी की टांग के नीचे दबाये रखा ।
इस बीच में पडोसी मुल्क भी अपनी ग़ैर फैसला कुन जंग को भोले कश्मीरियों के खून और इज़्ज़त के बदले लड़ता रहा , अगर वाक़ई पाकिस्तान बहैसियत मुस्लिम क़ौम के कश्मीरियों को मदद करना चाहता था तो उसको इनके मज़हबी , सियासी , कारोबारी और समाजी तशख़्ख़ुस (पहचान)  को बचाने के लिए आध्यात्मिकता के साथ और खुलकर मदद करनी चाहिए थी , अच्छा होता की इंसानियत के नाते बिना भेदभाव के सभी ज़रूरतमंदों की भी मदद करता लेकिन ऐसा नहीं हुआ ।
दोनों तरफ कश्मीरियों को बलि का बकरा बनना पड़ा यानी कश्मीर दोनों तरफ सियासी नफे के लिए इस्तेमाल किया गया ।भारतीय और पाकिस्तानी सियासी चाल बाज़ों के लिए कश्मीर सिर्फ एक मुद्दा रहा और अँगरेज़ शातिर सम्राटों के लिए शतरंज की एक गोट ।

 

गुजरात के मुहम्मद पटेल  , देश में अम्न के लिए सब कुछ क़ुर्बान करने को तैयार हैं

अब अगर वास्तव में देश की सत्ताधारी पार्टियां और केंद्रीय सरकार वहां की जनता के जीवन को उनके अपने मज़हबी आज़ादी और पहचान के साथ मदद करने की नीयत से 370 और 35A को हटा रहे हैं तो इस फॉर्मूले को भी कश्मीरी अवाम को आज़मा लेना चाहिए वैसे भी 3 दशकों से कश्मीरी आम आदमी तो आये दिन का कर्फूय , आर्मी के बूटों का रॉब , पत्थर के सामने गोली का रुख देखते ही रहे हैं , और जगह जगह कश्मीरी के नाम पर सताये जाते रहे हैं , हम तो कहते है अगर वास्तव में 370 हटाने से देश का विकास और कश्मीरियों का लाभ होता है तो इस तजर्बे को नार्थ ईस्ट के राज्यों पर भी आज़माया जाए ।

आखिर केंद्र सरकार द्वारा यह उठाया गया यह क़दम है , देश को विशवास करना ही चाहिए और एक बेहतर ,खुशहाल कश्मीर की उम्मीद रखना चाहिए ,और अगर इसके पीछे कोई साज़िश है तो देश की जनता का विश्वास देश के केलोकतंत्र और संसद से उठ जाएगा , जो देश केलिए बहुत खतरनाक होगा उसके बाद पैदा होने वाले हालात के लिए भी यही इतिहास रचने वाले और आज की वाह वाई लूटने वाले ही लोग ज़िम्मेदार होंगे ।क्योंकि विशवास की यह डोर ही तमाम तरह के रिश्तों को जोड़े रहती है अब यदि यह डोर टूटती है तो फिर जनता का सरकारों और संसद तथा लोकतंत्र पर विश्वास जमने में बहुत समय लग सकता है ।

अब इस पूरे प्रकरण में एक ख़ास बात यह है की कश्मीर मुद्दा सिर्फ भारत का मुद्दा नहीं है बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा है और पाकिस्तान हमेशा से इसको अपनी शहे रग यानी अपनी जीवन की कुण्ठ कहता रहा है तो वो इस मुद्दे को आसानी से नहीं भूल सकेगा और हम भी कश्मीर को अटूट अंग कहते रहे हैं । हालाँकि एक सच्चाई यह है की भारत पाक के बीच जब भी जंग हुई है कश्मीर की जनता भारत के लिए लड़ी है और हज़ारों कश्मीरी अपनी क़ुरबानी दे चुके हैं ।संसदीय मामलों के विशेषज्ञों की माने तो धारा 370 और 35A का हटाना असंवैधानिक अमल है जिसकी चर्चा शुरू भी होगई है , तथा प्रदर्शनों का भी रूप ले रही है ।

 

370 हटाने के पीछे हमारे समझ में जो प्रथम दृष्टि में समझ आया है वो यह है की यह सब (हुब्बे हुसैन नहीं बल्कि बुग़ज़ ए माविया370 हटाने के पीछे हमारे समझ में जो प्रथम दृष्टि में समझ आया है वो यह है की यह सब (हुब्बे हुसैन नहीं बल्कि बुग़ज़ इ माविया के तहत किया जा रहा है ) और दूसरे इसके पीछे सत्ता हड़पने तथा पूँजी बनाने का खेल चलेगा , साथ ही वोट धुर्वीकरण भी होगा , और आज जो लोग इस ऐतिहासिक घटना को हर्ष व् उल्लास के साथ मन रहे हैं उनको भी पछताना होगा , इस तरह लिए गए फैसलों पर ख़ुशी नहीं बल्कि विचार विमर्श की ज़रुरत होती है और इसके दूरगामी परिणामों पर जहां चिंतन की आवश्यकता होती है ।

क्या है अफस्पा Armed Force Special Power Act (AFSPA)
६० वर्ष पूर्व भारतीय संसद ने “अफस्पा” यानी आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट 1958 को लागू किया, जो एक फौजी कानून है, जिसे “डिस्टर्ब” क्षेत्रों में लागू किया जाता है, यह कानून सुरक्षा बलों और सेना को विशेष अधिकार देता है।

केंद्र सरकार ने अप्रैल 2018 में मेघालय से पूरी तरह अफस्पा हटा लिया है। अरुणाचल प्रदेश में ये केवल आठ थाना क्षेत्रों में ही लागू रहेगा। असम में इसके क्षेत्र को कम करने की बात की जा रही है। हालांकि नागालैंड में ये लागू रहेगा।

पूर्वोत्तर राज्यों में कब लागू किया गया
अफस्पा को एक सितंबर 1958 को असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड सहित पूरे पूर्वोत्तर भारत में लागू किया गया था। पूर्वोत्तर राज्यों में हिंसा रोकने के लिए इसे लागू किया गया था।

इसके अलावा कौन से राज्य इसकी ज़द में हैं
पंजाब और चंडीगढ़ भी इसके दायरे में आए। हालांकि 1997 में इस कानून को वहां खत्म कर दिया गया। जम्मू और कश्मीर में ये जरूर 1990 से जारी है।

आपको बता दें किसी प्रदेश या केंदशासित राज्य को डिस्टर्बड (Disturbed state ) कब घोषित किया जाता है , धार्मिक, नस्लीय, भाषा, क्षेत्रीय समूहों, जातियों, समुदायों के बीच मतभेद या विवादों के कारण राज्य या केंद्र सरकार एक क्षेत्र को “डिस्टर्ब” घोषित कर सकती है। इसके बाद ही वहां AFSPA लगाया जा सकता है ।

Editor’s Desk

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