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जब औलाद की नाफ़रमानी से माँ-बाप….

Ali Aadil Khan Editor’s Desk

जब औलाद की नाफ़रमानी से माँ-बाप का दिल टूटे — इस्लाम क्या कहता है?

माँ-बाप… ये दो ऐसे रिश्ते हैं जिनकी क़ीमत अक्सर इंसान को तब समझ आती है, जब उनमें से कोई एक दुनिया से चला जाता है।

जिस माँ ने अपनी नींद कुर्बान करके हमें सुलाया, जिस बाप ने अपनी जरूरतें रोककर हमारी जरूरतें पूरी कीं—अगर उसी औलाद की ज़बान से उन्हें तकलीफ़ पहुँचे, तो यह सिर्फ़ एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि इस्लाम की नज़र में एक गंभीर मामला है।

क़ुरआन ने माँ-बाप का दर्जा कितना ऊँचा रखा?

अल्लाह तआला ने अपनी इबादत के हुक्म के साथ ही वालिदैन के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश दिया:

“और माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक करो। अगर उनमें से एक या दोनों तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें ‘उफ़’ तक न कहो, न उन्हें झिड़को और उनसे सम्मानपूर्वक बात करो।”

— सूरह अल-इसरा 17:23

ग़ौर कीजिए—क़ुरआन ने सिर्फ़ मारने, गाली देने या अपमान करने से नहीं रोका, बल्कि “उफ़” कहने तक से रोक दिया।

यानी माँ-बाप की उम्र बढ़ने के साथ उनकी कमज़ोरी, उनकी ज़रूरतें और उनकी भावनाएँ औलाद के लिए और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

नाफ़रमानी कितनी बड़ी बात है?

रसूलुल्लाह ﷺ ने वालिदैन की नाफ़रमानी को बड़े गुनाहों में शामिल किया।

इसलिए अगर कोई औलाद जान-बूझकर माँ-बाप को अपमानित करे, उनकी बेइज़्ज़ती करे, उनसे बदतमीज़ी करे, उन्हें अकेला छोड़ दे या अपनी ज़बान और व्यवहार से उन्हें लगातार मानसिक तकलीफ़ पहुँचाए, तो उसे अपने रवैये पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण संतुलन भी समझना ज़रूरी है।

क्या माँ-बाप की हर बात मानना फ़र्ज़ है?

नहीं।

इस्लाम अंधी आज्ञाकारिता नहीं सिखाता।

अगर माँ-बाप किसी ऐसे काम का आदेश दें जो अल्लाह की नाफ़रमानी हो, तो उस मामले में उनकी बात नहीं मानी जाएगी। लेकिन असहमति के बावजूद उनके साथ अदब, सम्मान और अच्छे व्यवहार का रिश्ता खत्म नहीं होता।

क़ुरआन सूरह लुक़मान 31:15 में इसी सिद्धांत को स्पष्ट करता है।

यानी औलाद कह सकती है:

“अब्बा/अम्मी, मैं आपकी बात समझता हूँ, लेकिन इस मामले में मैं आपकी बात नहीं मान सकता।”

लेकिन यह नहीं कह सकती:

“आपको कुछ पता नहीं, आप चुप रहें!”

असहमति की भी एक तहज़ीब होती है—और इस्लाम उस तहज़ीब को सिखाता है।

माँ-बाप का दिल दुख जाए तो क्या करें?

अगर आपकी किसी बात से माँ या बाप का दिल दुख गया है, तो अपनी सफ़ाई देने से पहले माफ़ी माँगिए।

कभी-कभी हम सही होने की लड़ाई में उस रिश्ते को खो देते हैं जो हमारे लिए सबसे कीमती था।

एक बार जाकर कह दीजिए:

“अम्मी/अब्बा, अगर मेरी बात से आपका दिल दुखा है तो मुझे माफ़ कर दीजिए।”

हो सकता है आपका अहंकार आपको रोकता हो, लेकिन याद रखिए—माँ-बाप के सामने झुक जाना इंसान को छोटा नहीं करता।

और अगर माँ-बाप नाराज़ होकर बददुआ करें?

यह स्थिति और भी संवेदनशील है।

औलाद को माँ-बाप को नाराज़ करने से बचना चाहिए और यदि गलती हो गई है तो तुरंत सुलह और माफ़ी की कोशिश करनी चाहिए।

साथ ही माँ-बाप को भी औलाद के लिए बददुआ करने के बजाय हिदायत और सुधार की दुआ करनी चाहिए।

क्योंकि माँ-बाप की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ औलाद को पालना नहीं, बल्कि उसे सही रास्ता दिखाना भी है।

सबसे खूबसूरत दुआ

अल्लाह ने खुद हमें माँ-बाप के लिए यह दुआ सिखाई:

رَبِّ ارْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرًا

“ऐ मेरे रब! उन दोनों पर रहम फ़रमा, जैसे उन्होंने बचपन में मुझे पाला।”

— सूरह अल-इसरा 17:24

ज़रा सोचिए…

जिस माँ ने बचपन में हमारे रोने पर हमें सीने से लगाया था, आज अगर उसकी आँखों में आँसू हमारी वजह से हैं, तो हमें अपनी जीत नहीं बल्कि अपने रवैये के बारे में सोचना चाहिए।

जिस बाप ने हमारी छोटी-सी खुशी के लिए अपनी बड़ी-बड़ी इच्छाएँ कुर्बान कर दीं, अगर वही बाप हमारी वजह से रातों को परेशान है, तो हमें रुककर अपने दिल से सवाल करना चाहिए:

क्या मैं सचमुच उस औलाद का हक़ अदा कर रहा हूँ जिसकी मुझे इस्लाम ने ज़िम्मेदारी दी है?

आख़िरी बात

माँ-बाप हमेशा हमारे साथ नहीं रहेंगे।

एक दिन घर वही होगा, कमरे वही होंगे, उनकी चीज़ें भी शायद वहीं होंगी—लेकिन “अम्मी” कहकर जवाब देने वाली आवाज़ नहीं होगी।

तब इंसान के पास पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

इसलिए अगर माँ-बाप ज़िंदा हैं, उनसे बात कीजिए।

अगर नाराज़ हैं, मनाइए।

अगर दिल दुखाया है, माफ़ी माँगिए।

अगर दूर हैं, फोन कीजिए।

और अगर इस दुनिया से जा चुके हैं, तो उनके लिए दुआ, सदक़ा और नेक अमल कीजिए।

क्योंकि इस्लाम में माँ-बाप की ख़िदमत सिर्फ़ एक सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं—यह इबादत का रास्ता है।

और याद रखिए:

जिस घर में माँ-बाप की दुआ होती है, वहाँ औलाद के लिए सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं, बल्कि एक पूरी दुनिया की बरकत मौजूद होती है।

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