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जब भी गिरता हूँ थाम लेता है

हैरत फ़र्रुख़ाबादी

जब भी गिरता हूँ थाम लेता है

यूँ भी वो इंतिक़ाम लेता है

क्या शिकायत अदा है ये उस की

बे-नियाज़ी से काम लेता है

ऐसा क्या कुछ पिला दिया तू ने

जो भी है तेरा नाम लेता है

छिड़ ही जाती है दास्ताँ मेरी

जब कोई तेरा नाम लेता है

सब की नज़रें बचा के ऐ ‘हैरत’

कोई तेरा सलाम लेता है

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