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जामिया में छात्रों की मुकम्मल जीत या लोकतंत्र की…

जामिया में छात्रों की मुकम्मल जीत या लोकतंत्र की

जामिया में छात्रों की मुकम्मल जीत या लोकतंत्र की

Ali Aadil Khan Editor’s Desk

जामिया में छात्रों की मुकम्मल जीत या संसथान में लोकतंत्र की अधूरी बहाली हुई है? दरअसल

इन्साफ,,,, अमन और शान्ति की जननी होता है , अब चाहे देश में हो या संस्थानों में , हालिया मामला जामिया का है जहाँ छात्रसंघ चुनाव को लेकर लगभग २० दिन से छात्र अनशन पर थे .

कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है…….

दोस्तों, दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सिर्फ़ एक विश्वविद्यालय की ख़बर नहीं, बल्कि देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल छोड़ जाती है!

18 दिन का आंदोलन, भूख हड़ताल, छात्रों का धरना और फिर विजय मार्च! सवाल है—आख़िर छात्रों को UNION वापस पाने के लिए 2006 से 2026 तक इतना लंबा संघर्ष क्यों करना पड़ा?

२० बरस बाद अब 2026 में प्रशासन ने छात्रसंघ के CONSTITUTION को 15 मई 2027 तक लागू करने और नए Academic Session में चुनाव कराने की समय-सीमा तय की है। आंदोलन के दौरान छात्रों पर हुई Disciplinary Action वापस लेने का भी आदेश दिया गया है।

इसमें तो कोई शक नहीं के छात्रों ने एक अहम लड़ाई जीती है। लेकिन ध्यान रहे—छात्रसंघ की बहाली का रास्ता खुला है, चुनाव अभी हुए नहीं हैं! जहाँ से असली सवाल शुरू होता है।

जिस देश में विश्वविद्यालयों को लोकतांत्रिक चेतना, स्वतंत्र विचार और सत्ता से सवाल पूछने की प्रयोगशाला होना चाहिए, वहाँ छात्रसंघ जैसे बुनियादी Constitutional Rights लेने के लिए लगभग दो दशक इंतज़ार क्यों करना पड़ा ?

क्या जामिया प्रशासन छात्रों को केवल फीस भरने, परीक्षा देने और डिग्री लेकर निकल जाने वाला विद्यार्थी समझता है? या फिर छात्रों को उनके भविष्य और University के अहम् फैसलों में Jamia Students Union Cabinet के मश्वरे और उनकी भागीदारी भी तय करेगा ?

जामिया और AMU के हालिया आंदोलन से ज़ाहिर हुआ कि वहां के छात्रों को सिर्फ़ डिग्री और अपना प्रतिनिधित्व नहीं बल्कि अपने सम्मान और Minority Character के साथ जामिया की Policies में हिस्सेदारी भी चाहिए।

अब एक और अहम् सवाल—क्या देश की Universities में थोपी गई ख़ास विचारधारा और उनके प्रशासनिक चरित्र को लेकर उभरी चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के वैचारिक प्रभाव और शिक्षण संस्थानों के कथित भगवाकरण को लेकर देश में बहस तेज़ हो गई है। लेकिन जामिया के इस विवाद में RSS के सीधे हस्तक्षेप का कोई प्रमाण सामने रखे बिना किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं होगा।

फिर भी सवाल पूछना ज़रूरी है: क्या किसी विश्वविद्यालय में विचारों की विविधता सुरक्षित है? क्या वहाँ सरकार की आलोचना करने वाले विद्यार्थी भी उतने ही सम्मान और अधिकार के हक़दार हैं, जितने सरकार के समर्थक? और ये सवाल जामिया और AMU के पसेमंज़र में ख़ास अहमियत रखता है .

क्योंकि Educational Institutions और ख़ास तौर से Central Universities , किसी एक विचारधारा की जागीर नहीं होते। वे असहमति, बहस और Independent Thinking की जगह होते हैं।

इसलिए आज जामिया प्रशासन के लिए भी यह एक परीक्षा है क्या Administration तयशुदा वक़्त में Free and Fare चुनाव कराएगा? क्या छात्रों की लोकतांत्रिक भागीदारी स्थाई रहेगी ?

याद रखना चाहिए, छात्रों का आंदोलन ख़त्म हो गया है, लेकिन जामिया प्रशासन की परीक्षा अभी बाक़ी है! जामिया के Students की असली जीत उस दिन होगी, जब वहाँ छात्रसंघ सिर्फ़ काग़ज़ों पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के ज़रिए पुरअमन तरीके से और हक़ीक़त में बहाल होगा।

क्योंकि छात्र किसी विश्वविद्यालय की समस्या नहीं बल्कि वो देश और संस्थानों की बड़ी ताक़त और Asset होते हैं!

आपकी क्या राय है? क्या छात्रसंघ चुनावों की बहाली जामिया के सभी मुद्दों का हल है ?, क्या जामिआ को उसका हक़ मिल गया है, या जामिया फिर किसी बदनज़री और तास्सुब का शिकार हो सकता है?

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