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हुए हैं दिल के टुकड़े टुकड़े “हैरत”

 

सलामहैरत

ग़ज़ल

बग़ावत की है जब से रोशनी ने।
सहारा ही दिया है तीरगी ने।।

जगह अब आसमां में ढ़ूंढ़ता है।
ज़मीं को कम ही समझा आदमी ने।।

बदल पाए कभी फितरत न अपनी।
खसारा ही दिया है सादगी ने।।

लिए डर थे जो दिल में दुश्मनी का।
उन्हें चौकाया अपनी दोस्ती ने।।

हवा देते रहे सब रंजिशों को।
सुलह की कोशिशें की बस हमी ने।

शबे फुरकत मेरे आंगन उतर कर।
जलाया है बहुत ही चांदनी ने।।

हुए हैं दिल के टुकड़े टुकड़े “हैरत”।
नज़र जब फैर ली हमसे किसी ने।।

 

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