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चुनावी शोर के बाद संकट का दौर!

चुनावी शोर के बाद संकट का दौर!
Ali Aadil Khan Editor’s Desk

ईरान युद्ध और वैश्विक तेल संकट की आशंकाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया भाषण ने देश में नई बहस छेड़दी है। सिकंदराबाद में दिए गए अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने लोगों से पेट्रोल-डीज़ल की बचत करने, सोना कम खरीदने, विदेश यात्राएं टालने और खाने के तेल का कम इस्तेमाल करने की अपील की। सरकार इसे वैश्विक संकट के दौर में “राष्ट्रहित” का कदम बता रही है, लेकिन विपक्ष और कई विशेषज्ञ इसे आने वाले आर्थिक दबाव की चेतावनी मान रहे हैं।

चुनाव में लाखों लीटर पेट्रोल फूंकने के बाद अब जनता को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाये जाने का इमकान पहले से जताया जा रहा था. लेकिन जनता थाली ताली बजाने और मोबाइल लाइट जलाकर प्रधनमंत्री के आदेश का पालन करने की आदि है और वो आज भी करेगी. मगर अफ़सोस यह है आपदा को अवसर में बदलने का काम जब राजनीती करती है तो यह जनता को ठगने के सिवा कुछ नज़र नहीं आता.

दरअसल, ईरान युद्ध के कारण होर्मुज़ स्ट्रेट में तनाव लगातार बढ़ रहा है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल सप्लाई इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है और भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक इस रास्ते पर निर्भर है।

गर हालात लंबे समय तक बिगड़ते हैं, तो भारत में पेट्रोल, डीज़ल, गैस, खाद और खाने के तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।ौर ज़ाहिर है असर देश की घरीं जनता पर ही पड़ना है. ऐसे लोगों का मानना है की सरकार की सबसे बड़ी भागीदार पार्टी बीजेपी को पार्टी फण्ड को सही इस्तेमाल करने का समय आरहा है .

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में लोगों से “संयम” बरतने की अपील की, लेकिन आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि अगर हालात इतने गंभीर थे, तो चुनावी रैलियों में इस संकट का जिक्र क्यों नहीं किया गया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार अब आर्थिक चुनौतियों का बोझ जनता पर डाल रही है। राहुल गांधी और प्रियंका चतुर्वेदी जैसे नेताओं ने कहा कि सरकार जनता को त्याग का संदेश देने के बजाय खुद सरकारी खर्च और नेताओं के बड़े-बड़े काफ़िलों पर रोक लगाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह बयान केवल सलाह नहीं, बल्कि आने वाले कठिन आर्थिक दौर का संकेत भी हो सकता है। बढ़ती महंगाई, कमजोर होता रुपया और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकते हैं।

ऐसे में सवाल यही है कि क्या देश वास्तव में बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है, या यह केवल एहतियात की राजनीति है। किसी भी बेजा और नाजाइज़ खर्च से हमेशा और हर हाल में बचने की ज़रुरत है, जिसका वर्णन सभी धार्मिक किताबों में मिलता है.

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