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उपचुनाव परिणामः अंतर्कलह से दतिया तो बांकीपुर में नब्ज पकड़ने में फेल हुई भाजपा

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नई दिल्ली, 03 अगस्त । देश में सोमवार को बांकीपुर, दतिया और मांजलपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने राष्ट्रीय राजनीति को नए संकेत दिए हैं। बिहार के बांकीपुर में जन सुराज की जीत, मध्य प्रदेश के दतिया में कांग्रेस की सफलता और गुजरात के मांजलपुर में भाजपा की जीत ने तीन अलग-अलग राजनीतिक संदेश दिए हैं।

तीनों राज्यों के उपचुनाव परिणामों ने साफ कर दिया है कि स्थानीय मुद्दे और स्थानीय नेतृत्व अब भी चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। भाजपा को जहां मांजलपुर में राहत मिली, वहीं बांकीपुर और दतिया के नतीजों ने पार्टी के लिए आत्ममंथन की जरूरत बढ़ा दी है। दूसरी ओर कांग्रेस को दतिया से राजनीतिक संजीवनी मिली है, जबकि बांकीपुर में जन सुराज की जीत ने बिहार की राजनीति में तीसरे विकल्प की संभावनाओं को मजबूत किया है।

भाजपा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट और पिछले तीस सालों से भाजपा का गढ़ माने जाने वाली बांकीपुर सीट में शीर्ष नेतृत्व लोगों का मूड भांपने में विफल रही। बांकेपुर से जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर न केवल पहली बार विधायक बनने का रिकॉर्ड बनाया बल्कि पार्टी का बिहार विधानसभा में अपना पहला खाता भी खोल लिया।

राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक भाजपा मुख्यमंत्री सम्राठ चौधरी के प्रति युवाओं की नाराजगी को न केवल समझने में नाकामयाब रही बल्कि एन वक्त तक उम्मीदवार के चयन में भी उलझी रही। घोषित प्रत्याशी अभिषेक कुमार सिन्हा ने निजी कारणों से नामांकन वापस ले लिया, जिसके बाद भाजपा ने नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अंतिम समय में हुए इस बदलाव का भी चुनावी परिणाम पर असर पड़ा। इसके साथ भाजपा को हराने के प्रयास में आरजेडी सहित कई विपक्षी दलों के वोट जन सुराज की ओर स्थानांतरित हुए ।

मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर भी कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को शिकस्त दी। माना जा रहा है कि यहां भाजपा की हार की वजह अंदुरुनी कलह थी। पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा के टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों ने जिस तरह से नाराजगी जताई थी उससे वोटरों में गलत संदेश गया था। हालांकि डैमेज कंट्रोल करते हुए नरोत्तम खुद चुनाव प्रचार में लगे रहे। पार्टी के नेता यहां लोगों अंदर खाने पार्टी में चल रही नाराजगी को ही भांप नही पाई। इन सब के बीच भाजपा के लिए थोड़ी राहत की बात है कि गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट पर पार्टी के सतेंद्रभाई पटेल ने कांग्रेस के भीखाभाई रबाड़ी को 30,630 मतों से हराया।

जंतर मंतर पर हुए जेन जी के प्रदर्शन के बाद हुए चुनाव और उसके नतीजों के बाद भाजपा के सामने कई प्रश्न है जिसके जवाब पार्टी को तलाशने होंगे। आमतौर पर राज्य में सरकार होते हुए उपचुनाव में हार हो ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता है। इस बीच इस हार पर भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित मालवीय ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 2011 में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने वामपंथ को हराने के लिए तृणमूल कांग्रेस के लिए राजनीतिक जगह छोड़ी। नतीजा यह हुआ कि तृणमूल मज़बूत होती गई और कांग्रेस हाशिये पर चली गई।

दिल्ली में भी कांग्रेस ने वही गलती दोहराई। भाजपा को रोकने के नाम पर उसने आम आदमी पार्टी के लिए जगह बनाई और अंततः उसका वोट शेयर लगभग 2 प्रतिशत तक सिमट गया।

बांकीपुर में जो हुआ, वह राजद के लिए चेतावनी है।

उन्होंने कहा कि भाजपा को हराने के प्रयास में यदि उसके वोट जन सुराज पार्टी की ओर स्थानांतरित हुए हैं, तो इतिहास बताता है कि ऐसी रणनीति अक्सर मुख्य प्रतिद्वंद्वी से अधिक उस दल को ही कमजोर कर देती है, जो अपनी राजनीतिक ज़मीन छोड़ता है।

हालाँकि, एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए।

उपचुनाव मूलतः किसी एक विधानसभा क्षेत्र के लिए विधायक चुनने का चुनाव होता है, न कि राज्य की अगली सरकार तय करने का जनादेश।

इसके कई उदाहरण हैं।

2018 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा को समाजवादी पार्टी से हार मिली, जबकि इन दोनों सीटों के पूर्व सांसद योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य क्रमशः मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री थे। इसके बावजूद भाजपा ने 2019 का लोकसभा चुनाव और 2022 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में शानदार ढंग से जीता।

इसी तरह, 2023 के महाराष्ट्र के कसबा पेठ विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को कांग्रेस के रविंद्र धंगेकर से हार का सामना करना पड़ा। लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने न केवल कसबा पेठ सीट वापस जीती, बल्कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने 232 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

इसलिए किसी उपचुनाव के नतीजे को भविष्य के विधानसभा या लोकसभा चुनाव का संकेत मान लेना जल्दबाज़ी होगी।

फिलहाल इतना तय है कि जन सुराज के संस्थापक ने बिहार विधानसभा में अपनी पार्टी का खाता खोल दिया है, ठीक वैसे ही जैसे कभी इंडियन इन्क्लूसिव पार्टी के आई. पी. गुप्ता ने किया था। यह एक बड़े राजनीतिक विस्तार की शुरुआत है या सिर्फ़ एक अपवाद, इसका जवाब बिहार की जनता 2030 के विधानसभा चुनाव में देगी।

भाजपा इस परिणाम से उचित निष्कर्ष निकालेगी, नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ेगी और बिहार की जनता से किए गए अपने हर वादे को पूरा करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करती रहेगी।

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