असम की बाढ़: क्या सियासत ने इंसानियत को कुचल दिया है ? मगर ज़िंदा रखने वाले लोग अभी मौजूद हैं !
गृहमंत्री अमित शाह ने 14 मार्च 2021 को आसाम के तिनसुकिया ज़िले के मार्घेरिटा में एक जनसभा के दौरान मुख्यमंत्री हिमंत की उपस्थिति में बाढ़ को लेकर बयान दिया था. उस बयान को राज्य की जनता तो भूल गई होगी और आपको भी शायद याद न हो लेकिन हम आपको याद दिलाते हैं.
उन्होंने कहा था “असम की सबसे बड़ी समस्या बाढ़ है. मैं आज इस सभा के माध्यम से असम की जनता को आश्वस्त करने आया हूं कि पांच साल हमें और दे दीजिए, असम को बाढ़ मुक्त बनाने का काम भारतीय जनता पार्टी की सरकार करेगी.”
लेकिन 5 साल बाद 19 जुलाई 2025 को असम में आई बाढ़ ने मौजूदा सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है. मगर जिसको ज़बानी कटघरे में खड़े होने की आदत पड़ गई हो उसको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. प्रधानसेवक कितनी बार जनता से 100 दिन मांग चुके हैं, लेकिन वही ढाक के तीन पात. बल्कि हालात बद से बदतर….
हर साल यही होता है। बाढ़ आती है। लाखों लोग बेघर हो जाते हैं। फिर राहत कैंप बनते हैं, नेताओं के हवाई दौरे होते हैं, मुआवज़े के ऐलान भी किये जाते हैं और कुछ हफ्तों बाद सब कुछ भुला दिया जाता है।
लेकिन क्या हमने सरकार से यह पूछा कि आख़िर हर साल बाढ़ से हमारे लोग, हमारे गाँव हमारी खेतियाँ तबाह क्यों हो जाती हैं ? और यह तबाही के नक़्शे आख़िर कब तक ?
जबकि सवाल करना या जानना ये हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार भी है है और धार्मिक ज़िम्मेदारी भी चुनांचे …वेदान्त दर्शन के मुख्य ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का सबसे पहला और प्रसिद्ध सूत्र है …अथातो ब्रह्म जिज्ञासा जिसका अर्थ है— “अब इसके बाद यानी ..(सांसारिक मोह-माया और कर्मों को समझ लेने के बाद) परम सत्य यानी ब्रह्म को, क़ुदरत को रब को जानने की इच्छा या खोज शुरू होती है।” या होनी चाहिए …. लेकिन अफ़सोस हम सच को जानना ही नहीं चाहते हम सवाल करना ही नहीं चाहते ….
दोस्तों वैसे तो, असम के अलावा भी भारत देश में बाढ़ जगह जगह आती रहती है। ब्रह्मपुत्र, कोसी, गंगा, यमुना, गंडक, तीस्ता और महानदी का स्वभाव, भारी बारिश और जलवायु परिवर्तन इस संकट को और गंभीर बना देते हैं।
लेकिन क्या सिर्फ़ कुदरत को दोष देकर सरकारों की ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है? हालांकि कभी कभी क़ुदरत का यह क़हर भी ज़ालिम हुक्मरान की नहूसत की वजह से ही आता है।
लेकिन सरकारों से सवाल जहाँ जुर्म बन जाए और जनता खामोश तमाशाई हो जाए तो इसकी सज़ा भी जनता को ही भुगतनी पड़ेगी, अब यह जनता…. देश की जनता होती है हिन्दू या मुस्लिम, सिक्ख या ईसाई , बोध या जैन नहीं होती.
आप ही बताएं ,,,आसाम की बाढ़ में नुक़सान हिन्दू या मुसलमान का हुआ या मानवता का ?? लेकिन पंजाब की तरह असम में भी मुसलमान और सिक्ख भी बाढ़ पीड़ित लोगों की मदद करते दिखाई दिए, राजनितिक गलियारों में इसका ज़िक्र भी होना चाहिए.
मगर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा तो मुसलमानों को परेशान करके असम राज्य से ही निकालना चाहते थे !!. मुसलमान रिक्शा वाले को 5 Rs की जगह 4 देने की सलाह देते दिखाई देरहे थे बिस्वा सरमा, शर्म नहीं आई उनको इस तरह का बयान देते हुए.
हालाँकि उन्होंने कांग्रेस से निकाले जाने बाद अपनी सियासत का मूल आधार साम्प्रदायिकता को ही बना लिया था और वो इसमें बज़ाहिर कामयाब भी रहे। ये विषय उनके राजनैतिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता हैं, लेकिन देश के लिए नहीं।
हर साल लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं, ऐसे में हम जनता की तरफ से यह पूछते हैं —क्या असम के मुख्यमंत्री बाढ़ रोकने की दीर्घकालिक यानी LONG TERM योजना, मज़बूत तटबंध, बेहतर जल निकासी, समय पर राहत और पुनर्वास को भी उतनी ही बड़ी राजनीतिक प्राथमिकता पर क्यों नहीं रखते ?
देश की MUNICIPLE CORPORATIONS की कार्यशैली का हाल यह है की नालों और पानी की निकासी की सफाई का काम बरसात में शुरू होता है यानी जब सड़कें और बस्तियां पानी में डूबने लगती हैं तब देश की म्युनिसिपल्टीयों में कुम्भकरण की नींद सोये अधिकारी और नेता जागते हैं.
बार बार इसके नज़ारे आपके सामने आते ही रहते हैं, और इसका कारण है जनता का सरकारों की जवाबदेही के प्रति लापरवाह होजाना. और जब तक जनता सत्ता के नशे में चूर हुक्मरानों को नहीं जगाएगी उनको उनकी ज़िम्मेदारी का एहसास नहीं कराएगी तब तक हालात बदलने वाले नहीं हैं, सरकारें चाहे किसी भी पार्टी की आजायें.
भारतीय राजनीती का तालाब कुछ इतना ही गन्दा है जहाँ सब नंगे दिखाई देते हैं. यदि कोई लिबास पहन भी ले तो उसको रहने नहीं दिया जाता या पाने जैसा बना लिया जाता है.
याद रखिए, बाढ़ या कोई दूसरी आपदा किसी से उसका नाम पूछकर नहीं आती। वह यह नहीं देखती कि कौन हिंदू है, कौन मुसलमान, कौन आदिवासी , कौन असामी या कौन बंगाली। बाढ़ का पानी सबके घरों में घुसता है, खेती सबकी बर्बाद होती है.
और हाँ , आपदा के समय ही राजनीति की परीक्षा होती है, क्या सरकार हर नागरिक तक समान रूप से पहुँच रही है? क्या राहत तेज़, पारदर्शी और प्रभावी है? और सबसे अहम, क्या अगली बार ऐसी तबाही कम करने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं? या फिर जनता को खोखली आत्मनिर्भरता और फ़र्ज़ी देशभक्ति के नाम पर बर्बाद किया जा रहा है.
लोकतंत्र में जनता को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है। लेकिन जनता को इतना डरा दिया गया है कि वो अपनी मूलभूत और बुनियादी सहूलत के अभाव में भी सवाल नहीं पूछ रही है, इसी को तो दमनकारी नीति कहा जाता है.
अगर हर मानसून के बाद के हालात की वही तस्वीरें दोहराई जाएँ—टूटी सड़कें, डूबे घर और स्कूल, बहती फसलें, राहत शिविरों में रहने को मजबूर परिवार—तो यह पूछना बिल्कुल जायज़ है कि 75 वर्षों की योजनाओं और खर्च के बाद भी स्थायी समाधान क्यों नहीं दिख रहा? जनता से बार बार 5 साल मांगे जाते हैं कभी 100 दिन मांगे जाते हैं और वादे पूरे न होने पर प्रधानमंत्री द्वारा चौराहे पर सज़ा दिए जाने की बात कही जाती है.
दरअसल सरकारें बदल जाती हैं, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन नागरिकों की परेशानियां और तकलीफें ज्यों की त्यों रहती हैं , और अगर नफरती और सांप्रदायिक भाषणों से नेताओं और पार्टियों का काम चल जाए सत्ता मिल जाए तो क्योंकर जनहितेषी योजनाओं पर काम किया जाए ?
किसी भी लोकतान्त्रिक देश में सरकार का असली इम्तिहान चुनाव जीतना नहीं, बल्कि संकट के समय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो रहा है.
असम और दुसरे बाढ़ प्रभावित इलाक़ों को केवल राहत पैकेज नहीं, बल्कि एक लॉन्ग टर्म बाढ़ प्रबंधन नीति की ज़रूरत है—ऐसी नीति जिसमें नदी प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, तटबंधों का वैज्ञानिक रखरखाव, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की स्पष्ट योजना हो।
आख़िर में सिर्फ़ एक सवाल छोड़कर जाना चाहता हूँ…
अगर अगले साल फिर वही गाँव डूब गए, फिर वही बच्चे राहत कैंपों में पहुँच गए और फिर वही तस्वीरें टीवी स्क्रीन पर दिखाई दीं…तो क्या हम इसे सिर्फ़ प्राकृतिक आपदा कहेंगे?
या फिर यह भी मानेंगे कि कहीं न कहीं सरकारी नीतियों, प्राथमिकताओं और राजनेताओं को भी आईना देखने की ज़रूरत है? और उनको अपनी ज़िम्मेदारियों के निर्वाहन न किये जाने की वजह से कुर्सी से उतारा जाए.
इस पूरे मामले में आप क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखिए।

