Site icon TIMES OF PEDIA

अदालत में इन दो नेताओं ने पेश होने से क्यों किया इंकार

मनीष सिसोदिया ने भी जस्टिस स्वर्णकांता
EDITED BY MUKESH YADAV

मनीष सिसोदिया ने भी जस्टिस स्वर्णकांता की कोर्ट से बनाई दूरी, केजरीवाल की तरह चिट्ठी लिखकर कहा – मैं भी पेश नहीं होऊंगा।

TOP BUREAU:/आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया ने दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत का बहिष्कार करने का फैसला लिया है। यह कदम उन्होंने अरविंद केजरीवाल के फैसले के समर्थन में उठाया है, जिन्होंने एक दिन पहले ही इसी तरह का ऐलान किया था।

मनीष सिसोदिया ने मंगलवार को जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि वह अब उनकी अदालत में पेश नहीं होंगे और न ही उनकी ओर से कोई वकील उपस्थित होगा। अपने पत्र में उन्होंने न्याय मिलने की उम्मीद न होने की बात कही और इसे सत्याग्रह का रास्ता बताया।

इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने भी जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र लिखकर कहा था कि उन्हें अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है, इसलिए वे न तो खुद पेश होंगे और न ही अपने वकील को भेजेंगे। इस तरह, दोनों नेताओं ने एक ही रुख अपनाते हुए अदालत की कार्यवाही से दूरी बनाने का फैसला किया है।

जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत में क्या हुआ था?

20 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई से न्यायमूर्ति को खुद को अलग करने की मांग की थी।

फैसला सुनाते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा था कि बिना याचिका पर विचार किए सुनवाई से अलग हो जाना आसान रास्ता हो सकता था, लेकिन उन्होंने न्यायिक संस्था की गरिमा और संस्थागत शुचिता को ध्यान में रखते हुए मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय देना उचित समझा।

जस्टिस स्वर्णकांता ने यह भी कहा था कि जब उन्होंने अपना फैसला पढ़ना शुरू किया, तो अदालत कक्ष में पूरी तरह सन्नाटा छा गया था। उनके अनुसार, यह सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं था, बल्कि न्यायाधीश और पूरी न्यायिक व्यवस्था की निष्पक्षता की परीक्षा थी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने दोहराया था कि जब तक ठोस सबूतों से विपरीत साबित न हो, किसी न्यायाधीश की निष्पक्षता पर भरोसा किया जाता है। केवल किसी पक्ष की आशंका या व्यक्तिगत धारणा के आधार पर किसी जज को मामले से अलग नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति शर्मा ने यह भी कहा था कि किसी वादी को ऐसी स्थिति बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा प्रभावित हो। उन्होंने स्पष्ट कहा कि झूठ को अदालत में या सोशल मीडिया पर हजार बार दोहराने से वह सच नहीं बन जाता।

अरविंद केजरीवाल के आरोपों पर जवाब देते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा था कि पक्षपात के दावों को साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं, चाहे वह अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी हो या उनके परिवार के सदस्यों की पेशेवर गतिविधियों से जुड़े आरोप।

अब मनीष सिसोदिया और अरविन्द केजरीवाल के इस क़दम को संवैधानिक और क़ानून की कसौटी पर टोला जायेगा कि इन नेताओं का यह क़दम अदालती तौर से कितना सही है ?

Exit mobile version